कांग्रेस ने कल्याणकारी तंत्र की सामग्री तैयार कर रखी थी. प्रधानमंत्री ने बस अपनी रेसिपी के अनुसार उनको परस्पर मिलाने और मोदी 'तड़का' लगाकर अपना बताते हुए बेचने का काम किया.
भारत जैसे देश के लिए पहले तीन हफ्ते का लॉकडाउन जरूरी था, लेकिन ज्यादा इसको आगे खींचने की जरुरत नहीं है. अर्थव्यवस्था को खोलना होगा लोगों को भूखा नहीं रखा जा सकता है.
गहन विचार और सावधानी से की गई जांच, एक ऐसी सीखी हुई कला है, जो इंसानी मेल-मिलाप, और निर्देशित पूछताछ से तप कर निकलती है, निष्क्रिय कंप्यूटर निर्देशों से नहीं.
ऐसा लगता है कि सरकार शहरों की भीड़ कम करने की कोशिश कर रही है, क्योंकि शहरी क्षेत्रों के कल्याण और बेरोज़गारी सहायता के लिए कोई कार्यक्रम घोषित नहीं किए गए.
नौ मिनट के एक नये वीडियो में भाजपा ने मोदी सरकार के छह साल की एक ऐसी खुशनुमा तस्वीर पेश की है कि आपको यह अंदाजा ही नहीं लग पाएगा कि भारत संकट के दौर से गुजर रहा है.
स्कॉलर रिचर्ड हास कहते हैं कि कोरोनावायरस के इस काल में तानाशाही या लोकतंत्र नहीं, विपत्ति के समय पूरी बात इस पर निर्भर करती है कि आपका नेता और उसका नेतृत्व कैसा है.
यह कहना गलत है कि श्रम कानूनों को हटा देने पर हमारे यहां विदेशी कंपनियों की लाइन लग जाएगी. श्रम कानूनों का सरलीकरण जरूरी है, लेकिन ये निवेश के रास्ते की अकेली समस्या नहीं है.
एक बार फिर भारत ने संकट के समय में मुश्किल-से-मुश्किल सुधारों को आसानी के साथ लागू कर पाने की अपनी परंपरा कायम रखी है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केविड संकट का सामना करते हुए कृषि और रक्षा जैसे सुधार से अछूते क्षेत्रों में साहसिक सुधार किए हैं.
आत्मनिर्भर भारत संबोधन में मोदी द्वारा प्रवासी मज़दूरों के संकट का ज़िक्र तक नहीं किए जाने से बहुतों को हैरत हुई है. फिर भी, उनके खिलाफ गुस्सा नहीं दिख रहा.
आरबीआई के आंकड़े बताते हैं कि छह साल में पर्सनल लोन तीन गुना हो गए हैं और कर्ज़ चुकाने में चूक बढ़ी है; सोशल मीडिया से बनी लाइफस्टाइल को बनाए रखने के लिए मिडिल क्लास कर्ज़ ले रहा है, जबकि असली मज़दूरी आधी रह गई है.