scorecardresearch
Friday, 30 January, 2026
होममत-विमत

मत-विमत

आधार, मनरेगा, डीबीटी, ग्रामीण आवास– कांग्रेस की विरासत को मोदी ने कैसे हड़पा

कांग्रेस ने कल्याणकारी तंत्र की सामग्री तैयार कर रखी थी. प्रधानमंत्री ने बस अपनी रेसिपी के अनुसार उनको परस्पर मिलाने और मोदी 'तड़का' लगाकर अपना बताते हुए बेचने का काम किया.

भारत में पहले 3 हफ्ते का लॉकडाउन जरूरी था, अब इसे आगे बढ़ा कर लाखों लोगों को भूखा नहीं रख सकते

भारत जैसे देश के लिए पहले तीन हफ्ते का लॉकडाउन जरूरी था, लेकिन ज्यादा इसको आगे खींचने की जरुरत नहीं है. अर्थव्यवस्था को खोलना होगा लोगों को भूखा नहीं रखा जा सकता है.

कोविड का जवाब ऑनलाइन लर्निंग नहीं है, एक बच्चे को पालने में पूरा गांव जुटता है एक स्क्रीन काफ़ी नहीं

गहन विचार और सावधानी से की गई जांच, एक ऐसी सीखी हुई कला है, जो इंसानी मेल-मिलाप, और निर्देशित पूछताछ से तप कर निकलती है, निष्क्रिय कंप्यूटर निर्देशों से नहीं.

क्या मोदी सरकार भारत के शहरों की भीड़ कम करना चाहती है, इसके आर्थिक पैकेज से तो यही लगता है

ऐसा लगता है कि सरकार शहरों की भीड़ कम करने की कोशिश कर रही है, क्योंकि शहरी क्षेत्रों के कल्याण और बेरोज़गारी सहायता के लिए कोई कार्यक्रम घोषित नहीं किए गए.

मोदी की भाजपा वाले भारत में सब ‘चंगा’ है, कोरोना संकट मानो देश में हो ही ना

नौ मिनट के एक नये वीडियो में भाजपा ने मोदी सरकार के छह साल की एक ऐसी खुशनुमा तस्वीर पेश की है कि आपको यह अंदाजा ही नहीं लग पाएगा कि भारत संकट के दौर से गुजर रहा है.

कोविड संकट और आर्थिक पैकेज दोनों ने दिखा दिया है कि मोदी सरकार का दिल गरीबों के लिए नहींं धड़कता

कुछ घाव इतने गहरे होते हैं कि वो भूले नहीं जाते, और कोरोनावायरस महामारी वही घाव साबित हो सकता है, जो मोदी सरकार के प्रति ग़रीबों का मूड बदल देगा.

तानाशाह या डेमोक्रेट्स, किसने कोरोना को बेहतर तरीके से संभाला है और मोदी का भारत कहां है

स्कॉलर रिचर्ड हास कहते हैं कि कोरोनावायरस के इस काल में तानाशाही या लोकतंत्र नहीं, विपत्ति के समय पूरी बात इस पर निर्भर करती है कि आपका नेता और उसका नेतृत्व कैसा है.

ये भ्रम है कि श्रम कानून न होने भर से निवेश बरसेगा और खुशहाली आएगी

यह कहना गलत है कि श्रम कानूनों को हटा देने पर हमारे यहां विदेशी कंपनियों की लाइन लग जाएगी. श्रम कानूनों का सरलीकरण जरूरी है, लेकिन ये निवेश के रास्ते की अकेली समस्या नहीं है.

संकट काल में ही हुए हैं भारत में बड़े सुधार, मोदी को भी करना पड़ा बड़ी आपदा का इंतजार

एक बार फिर भारत ने संकट के समय में मुश्किल-से-मुश्किल सुधारों को आसानी के साथ लागू कर पाने की अपनी परंपरा कायम रखी है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केविड संकट का सामना करते हुए कृषि और रक्षा जैसे सुधार से अछूते क्षेत्रों में साहसिक सुधार किए हैं.

मोदी को आफत लाने की राजनीतिक कीमत नहीं चुकानी पड़ेगी, क्योंकि उनकी हैसियत ईरान के अली खमेनई वाली है

आत्मनिर्भर भारत संबोधन में मोदी द्वारा प्रवासी मज़दूरों के संकट का ज़िक्र तक नहीं किए जाने से बहुतों को हैरत हुई है. फिर भी, उनके खिलाफ गुस्सा नहीं दिख रहा.

मत-विमत

गुज़ारा करने के लिए कर्ज़ा: भारतीय परिवार ज़्यादा बचत करते हैं, फिर भी क्यों हैं कर्ज़ में?

आरबीआई के आंकड़े बताते हैं कि छह साल में पर्सनल लोन तीन गुना हो गए हैं और कर्ज़ चुकाने में चूक बढ़ी है; सोशल मीडिया से बनी लाइफस्टाइल को बनाए रखने के लिए मिडिल क्लास कर्ज़ ले रहा है, जबकि असली मज़दूरी आधी रह गई है.

वीडियो

राजनीति

देश

कांग्रेस और द्रमुक के बीच सीट बंटवारे पर जल्द बातचीत शुरू होगी : टीएनसीसी प्रमुख

चेन्नई, 30 जनवरी (भाषा) कांग्रेस-द्रमुक संबंधों में किसी भी तरह की दरार को खारिज करते हुए तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी के प्रमुख के. सेल्वापेरुंथगई...

लास्ट लाफ

सुप्रीम कोर्ट का सही फैसला और बिलकिस बानो की जीत

दिप्रिंट के संपादकों द्वारा चुने गए दिन के सर्वश्रेष्ठ कार्टून.