Thursday, 26 May, 2022
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मोदी भारत के सुधारवादी प्रधानमंत्रियों की लिस्ट में क्यों नहीं हैं

बड़े-बड़े इरादे रखने के बावजूद आर्थिक सुधारों के मोर्चे पर मोदी इसलिए पिछड़ते दिख रहे हैं क्योंकि उनके नौकरशाहों में सुधारों को आगे बढ़ाने का जज्बा नहीं है बल्कि वे तो इस लॉकडाउन के बहाने निरंकुश सत्ता का मज़ा लेने में मगन हैं.

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तीन सवाल हैं- पहला यह कि क्या नरेंद्र मोदी एक आर्थिक सुधारक हैं? दूसरा, भारत में आर्थिक सुधारकों की पीवी नरसिम्हा राव, डॉ. मनमोहन सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी की लिस्ट में मोदी की जगह कहां है? और तीसरा- आर्थिक सुधारों को लागू करने में मोदी कितने सफल रहे हैं?

अगर पहले सवाल का जवाब हां है, तो सवाल उठता है कि मोदी जब प्रधानमंत्री के रूप में सातवां साल शुरू कर रहे हैं तो इस मोर्चे पर उनकी उपलब्धियां क्या हैं?

यूपीए-2 ने 2010 में जब अपनी मौत खुद मरने की ओर कदम बढ़ा लिया था. उसके बाद 10 वर्षों में घोषणाएं तो बहुत की गईं और हम जैसे लोग उनका स्वागत भी करते रहे. मगर आर्थिक सुधारों का अकाल ही पड़ा रहा. उनकी घोषणाओं की सूची बहुत लंबी है, जिनमें रेलवे से लेकर कृषि, बैंकिंग, मैनुफैक्चरिंग, श्रम कानून, बिजली, नागरिक उड्डयन, नये सेक्टरों में एफडीआइ, कोयला, खनन, टैक्सेशन आदि तमाम क्षेत्र शामिल हैं. लेकिन पहली क्लास के बच्चे की तरह इन सबके नीचे एक लकीर खींचकर सबका जोड़ निकाला जाए तो लकीर के नीचे शून्य लिखा नज़र आएगा.

सो, हम खुद-ब-खुद तीसरे सवाल पर पहुंच जाते हैं. क्या मोदी में अपने विचारों खासकर बड़े आर्थिक सुधार के विचारों को लागू करने की क्षमता है? इसका जवाब ना में देने के लिए आपको सनकी या शहरी अथवा ग्रामीण नक्सल होना पड़ेगा. बस नोटबंदी और चार घंटे के नोटिस पर पूरे देश को लॉकडाउन करने के फैसलों को याद कर लीजिए, वही काफी है.

तो फिर उन्हें आर्थिक सुधार के अपने विचारों को लागू करने में दिक्कत क्यों हो रही है? बात केवल कोरोनावायरस की नहीं है. यह वायरस तो तीन महीने पहले आया, भारतीय अर्थव्यवस्था में तो करीब दो साल से तेज गिरावट जारी है. बेशक ‘द डे आफ्टर’ या ‘महाविपत्ति के बाद’ वाला मामला भी है और कोरोना ने आर्थिक संकट को और ज्यादा गंभीर बना दिया है. लेकिन ‘द डे बिफोर’, ‘महाविपत्ति के पहले’ भी संकट काफी गहरा चुका था. हम मोदी के बड़े सुधार ‘भूमि अधिग्रहण बिल’ से शुरुआत कर सकते हैं.

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मान लिया कि इसके लिए आप राजनीति या राहुल गांधी को दोषी ठहरा सकते हैं. लेकिन मेरी याददश्त और ‘दिप्रिंट’ की सीनियर एसोसिएट एडिटर रेम्या नायर की मदद से एक सिलसिला यह सामने आता है. प्रत्यक्ष करों की व्यवस्था में सुधार के लिए ‘सीबीडीटी’ के तत्कालीन सदस्य अखिलेश रंजन के नेतृत्व में एक कमिटी बनाई गई. जिसने 2019 में अपनी रिपोर्ट दी. इसे अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है. इसकी फाइल उस दायरे में भेज दी गई जिसे जॉर्ज फर्नांडीस ने रक्षा सौदों के बारे में ‘नौकरशाही अंतरिक्ष कक्षा’ कहा था, जिसमें फाइल उस कक्षा में लक्ष्यहीन चक्कर खाती रहती है.

नोटबंदी के बाद प्रधानमंत्री ने गरीब कल्याण योजना घोषित की, जो टैक्स माफी जैसी योजना ही थी जिसका मकसद पी चिदंबरम की 1997 की ‘वीडीआइएस’ (आय की स्वैच्छिक घोषणा स्कीम) योजना की तरह बड़ी उगाही कर लेना था.


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लेकिन उपलब्धि शून्य ही रही. टैक्स की दर इतनी तीखी और दंडात्मक थी कि इसे माफी नहीं कहा जा सकता. तय किए गए नियम इतने जटिल थे कि इनके तहत कुछ खुलासा करना आपको गैर-कानूनी घोषित करने जैसा ही होता.

मोदी सरकार के आर्थिक फैसलों के साथ एक खास तरीका जुड़ा नज़र आता है. फैसले पर अगली कार्रवाई, योजना के डिज़ाइन और कार्यान्वयन में काफी समय लगता है और जब तक यह सब पूरा होता है. इसमें इतना नौकरशाही घालमेल हो चुका होता है कि जो हासिल होता है वह कटोरे में परोसी गई जली हुई दाल जैसा लगता है. मसलन, (पीएसयू) यानी सरकारी बैंकों में सुधार का क्या हाल है? जिस बैंक होल्डिंग कंपनी का वादा किया गया था वह कहां है? सरकारी बैंकों के प्रमुखों का कार्यकाल बढ़ाने, उनके बोर्डों की जवाबदेही तय करने का क्या हुआ? तमाम अच्छे विचार जॉर्ज की उस सर्वभक्षी ‘अंतरिक्ष कक्षा’ में चक्कर खाते रह जाते हैं.

बिजली क्षेत्र में सुधारों के दो-दो प्रयास तो हादसे ही साबित हो चुके हैं. अब तीसरा प्रयास किया जा रहा है, देखिए इसका क्या हश्र होता है.

यही हाल कोयला सेक्टर का है. पिछले छह वर्षों में कोयला और खनन क्षेत्रों में सुधारों और उन्हें निजी क्षेत्र को बेचने की घोषणाएं इतनी बार की जा चुकी हैं कि गूगल भी उलझन में है और सही स्थिति जानने की कोशिश कर रहा है. एक बार फिर ताज़ा घोषणा की गई है, कोरोना महामारी के कारण पेश किए गए आर्थिक पैकेज के साथ.

छह साल में एक भी पीएसयू- एअर इंडिया तक को बेच पाने (सिवा ‘कैच-22’ उपन्यास के दिलचस्प पात्र माइलो माइंडरबाइंडर की तरह खुद को ही) में मोदी सरकार की असमर्थता एक सर्वशक्तिमान प्रधानमंत्री की छवि के साथ न्याय नहीं करती. इस साल तो जाहिर है कि गंभीर चुनौती से सामना है. लेकिन उनके पहले कार्यकाल में उनकी टीमों ने मिलकर जो ‘सेल डॉकुमेंट’ तैयार किया वह इतना जटिल था कि उसे समझना शायद भगवान शिव जैसे ज्ञानी के लिए ही संभव था और किसी कंपनी को खरीदने वाले में भगवान हनुमान वाली हिम्मत और ताकत चाहिए थी ताकि वह जिंदगी भर सीबीआई , ‘सीबीडीटी’, सीवीसी और कोर्टों तथा जेल से निबट सके.‘ इन चार संस्थाओं में इन छह वर्षों में सुधार तो दूर रहा, ये और ताकतवर ही हो गईं.

इसलिए, हमारे पहले दो सवालों का जवाब तीसरे सवाल में ही है. इन दोनों मोर्चों पर मोदी कमजोर दिखते हैं. अभी वे हमारे प्रमुख सुधारवादी नेताओं के आसपास भी नहीं नज़र आते क्योंकि वे अपने ही विचारों को लागू करने में विफल रहे हैं. इसलिए उन्हें विचारों के लिए ए प्लस , क्रियान्वयन के लिए सी माइनस और रैंकिंग के लिए बी माइनस दिया जा सकता है. इसके लिए बैंकरप्सी कोड, कुछ पीएसयू बैंकों के विलय और जीएसटी से संबंधित उनके फैसलों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है.

अब जरा 1991 को याद कीजिए. सुधारों के लिए राजनीतिक दिशा राव की अल्पसंख्यक सरकार ने तय की थी, लेकिन उस सरकार के साथ बेहतरीन नौकरशाहों की टीम जुड़ी थी. यह 2009 तक जारी रहा लेकिन इसके बाद कांग्रेस की अंदर की राजनीति ने सुधारों के विचार तक की हत्या कर दी. उन ‘शेर्पाओं’ की सूची देखिए जिन्होंने सुधारों को स्वरूप प्रदान किया.

उनमें तीन श्रेणियां थीं. ‘नौकरशाह-अर्थशास्त्री’ श्रेणी में एनके सिंह, वाइवी रेड्डी, डी सुब्बाराव, केपी गीताकृष्णन (सभी आइएएस), ‘अर्थशास्त्री-नौकरशाह’ श्रेणी में मोंटेक सिंह अहलुवालिया, बिमल जालान, विजय केलकर, राकेश मोहन थे, तो कुछ पक्के ‘नौकरशाह-नौकरशाह’ वाली श्रेणी में थे जो जानते थे कि काम कैसे करवाया जाता है. जरा एएन वर्मा (राव के पीएमओ में प्रिंसिपल सेक्रेटरी), नरेश चंद्रा को याद कीजिए, जो उन दो दशकों में हर तरह की ज़िम्मेदारी संभालते रहे या सुधारों से संबंधित हर अहम कमिटी (रक्षा समेत) के मुखिया रहे और आबिद हुसेन को भी और यह सच कड़वा लग सकता है, मगर उन लोगों के निर्देश में लिखे जाने वाले मेमो में कभी भी अस्पष्टता या विरोधाभास के कारण संशोधन की जरूरत नहीं पड़ती थी, कई-कई मेमो जारी करने की जरूरत नहीं पड़ती थी जैसा कि आज लॉकडाउन काल में हो रहा है.


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वे लोग तीन तरह से अलग थे. एक तो यह कि जो करियर मुखी नौकरशाह थे वे ‘माई-बाप’ वाली सरकार में अपनी चलाते रहे. जब सत्तातंत्र बेहद हावी था. उसका मज़ा उठा लेने के बाद वे खुशी-खुशी किनारे हट गए. ‘सरकार कम, शासन ज्यादा’ वाली भावना का मूलतः यही सार है.

दूसरे, अपना अधिकांश जीवन सुधारों से पहले के वर्षों में बिताने के कारण वे देख चुके थे कि लाइसेन्स-कोटा राज ने किस तरह के अभावों और तकलीफ़ों को जन्म दिया. मोंटेक और एनके सिंह बताते हैं कि सेक्रेटरी के पद पर होने के बावजूद किस तरह उन्हें न्यूयॉर्क के एक होटल में शर्मसार होना पड़ा था जब उन्हें इसलिए वहां ठहरने नहीं दिया गया था क्योंकि भारतीय क्रेडिट कार्ड वहां मान्य नहीं थे या जेनेवा के एक होटल में एक वार्ता में भाग लेने गए इन लोगों को यह एहसास हुआ कि लोग लिफ्ट में पेट्रोल की गंध से पहचान लेते थे कि उसमें कोई भारतीय शख्स चढ़ा था, क्योंकि भारत ने आधुनिक ड्राइक्लीनिंग मशीन आयात करने से माना कर रखा था. इस तरह की यादों ने सुधारों को गति दी.

तीसरे, इस आइएएस ग्रुप को आजीवन अर्थशास्त्री-नौकरशाह से जोड़ने पर बौद्धिक पलड़ा भारी हुआ. इसके अलावा, इनमें से हरेक को आर्थिक मंत्रालय में लंबे समय तक रहने दिया गया. एनके सिंह का करियर इसकी मिसाल है, जिन्होंने वाणिज्य मंत्रालय में संयुक्त सचिव से शुरुआत की थी और आज वे 15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष हैं. आज केवल रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ही अर्थशास्त्र-नौकरशाह हैं. सिविल सर्विस का मौजूदा नेतृत्व 1985-87 बैच के अधिकतर सचिवों के हाथ में है. ये सब सुधारों के दौर वाले हैं, जिन्हें ‘कलर टीवी युग’ (1982 से शुरू) के अधिकारी कहा जा सकता है. इन्हें पता नहीं है कि सुधारों से पहले हम किन चीजों से वंचित रहे और ये यह भी नहीं जानते कि उनके पूर्ववर्तियों ने कितने अधिकार छोड़ दिए. इन्हें आइएएस कोटा के तहत भी एक प्रीमियर पद्मिनी के लिए इंतज़ार नहीं करना पड़ा है. इनमें सुधारों के लिए जज्बा नहीं है, ये इस लॉकडाउन काल में पुरानी सत्ता का मज़ा लेना सीख रहे हैं.

जरा एक सिविल सरवेंट की ताकत का अंदाजा लगाइए, जो यह फरमान जारी करता है- ऐ 138 करोड़ मतिमंद बच्चो! तुम्हें रात 9 बजे से सुबह 5 बजे तक कर्फ़्यू में रहना है, क्या तुम्हारी मम्मी ने यह नहीं बताया कि अंधेरे में बाहर निकलना खतरनाक है? और यह भी सुन लो, अगर तुम ग्रीन जोन में हो तो टूटीफ्रूटी आइसक्रीम खा सकते हो, अगर ऑरेंज जोन में हो तो स्ट्राबेरी, और रेड जोन में हो तो वनीला आइसक्रीम ही खा सकते हो और वह भी तुम्हें तुम्हारे घर पहुंचा दिया जाएगा. शुक्र मानो! जान है तो जहान है! सुधारों के बारे में पूछते हो? क्या तुम चाहते हो कि मैं अपने अधिकार छोड़ दूं ? अभी तो मैंने साफ़सुथरा मेमो लिखना भी नहीं सीखा है.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें )

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3 टिप्पणी

  1. The print tumhare us behuda article me koi sachai nahi tumko bhi pata hai ki pm ki scheme kya hai Haan yeh bol na ki tera kahin par is sarkar ki bajah se personal nuksaan ya benefit nahi ho pata hai joh tumhare sarkar virodhi facts ko har article me dikhata hai abe tum chahe kuch bhi pm ke sath experts ias pcs international consulting experts top foreigners experts by russia uk USA toh boh decesion soch samjh ke hi lenge khair ab inse kuch nahi hota sabke pas apna dimag hai

  2. बहोत सुंदर लेख..यथार्थवादी लेख..हर एक बुध्दीजीवी लोगो तक आपकी बात पहुंचनी जरूरी है।कि भारत मे क्या हो रहा वरना बेचारी भोली भाली जनता तो यही समझती है कि और बीस इन्हे मिल जाये तो भारत फिर से सोने कि चिडिया बन जायेगी।…ये जनता के आंखो मे धूल फेकने जैसा है।

  3. Good Afternoon Gupta Sir,
    Aarthik Sudhaar means yhi h naa k Sarkar apna niyantran km kre.

    Beshak, Modi Ji Aarthik Sudhaarak ni,
    But Sir, kindly Explain :
    Ab jab Modi disinvestment ko badhaawa de rahi h,
    To Aarthik Sudhaarako me ni shaamil kese ni hue….?

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