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Friday, 30 January, 2026
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लॉकडाउन से अनलॉक तक- नरेंद्र मोदी हर कदम पर फेल हुए

मोदी का लॉकडाउन- जो देश में दुनिया के सबसे सख़्त शटडाउंस में से एक था, फिर भी, हमारा देश कोरोनावायरस के मामले जो अब 3 लाख के पार हो गए हैं.

कोरोनोवायरस ने मोदी-शाह की भाजपा को पोस्ट-ट्रुथ से प्री-ट्रुथ में बदलने में कैसे मदद की

भाजपा नेताओं के पास कोविड संकट, अर्थव्यवस्था, बेरोजगार मजदूरों पर कोई तथ्य नहीं है. वे जो भी कहते हैं वही तथ्य बन जाता है.

काश, अमित शाह युधिष्ठिर की तरह जवाब देते और यक्ष की भूमिका विपक्ष के लिए ही रहने देते

सोचिये जरा कि विपक्ष के काम में इतने रोड़े अटकाने के बाद गृहमंत्री पूछ रहे हैं कि उसने क्या किया! जैसे उन्हें कुछ भी याद न हो.

कोल्सटन और कोलंबस की प्रतिमाएं हो ना हो लेकिन सार्वजनिक स्थानों पर आंबेडकर की याद में प्रतिमाएं होनी चाहिए

ज़रूरी नहीं कि अतीत के नायकों की तमाम कांस्य प्रतिमाएं, अन्याय का ही प्रतीक हों. कभी-कभी गुलामों के भी स्मारक होते हैं. आंबेडकर मेमोरियल के मामले में, उन्हें और अधिक सराहना मिल सकती थी, अगर वो इतने ज़ाहिरी तौर पर जीवितों के साथ न जोड़े गए होते.

फुले और आंबेडकर ने भारत में जातिगत भेदभाव देखा था इसलिए वे काले लोगों के साथ हो रहे नस्लीय भेदभाव को समझते थे

नस्ली और जातीय भेदभाव के बीच समानता को पहली बार उजागर करने का श्रेय ज्योतिराव फुले को जाता है. उन्होंने करीब 150 वर्ष पहले अमेरिका के कालों और भारत के दलितों की स्थिति की परस्पर तुलना की थी.

कोरोना काल क्या शास्त्रीय संगीत की तबीयत को भी बिगाडे़गा

कोरोना के प्रभाव से उत्पन्न ‘डिजिटल वायरस’ कहीं धीरे-धीरे भारतीय शास्त्रीय संगीत जैसी कला की तबीयत को बिगाड़ने का काम तो नहीं कर रहा?

जॉर्ज फ्लायड के बहाने भारत में हिंसक प्रदर्शन को इजाजत नहीं मिलनी चाहिए, ‘भीड़तंत्र का न्याय’ किसी भी राष्ट्र के हित में नहीं

अमेरिका में पुलिस हिरासत में जार्ज फ्लॉयड की हत्या निश्चित ही निंदनीय है और इसकी दुनिया भर में भर्त्सना हो रही है लेकिन इस पर आक्रोश व्यक्त कर रही जनता द्वारा हिंसा, आगजनी और लूटपाट बेहद चिंताजनक है.

अर्थव्यवस्था एवं विचारधारा की वजहों से भंग हो रहा युवाओं का मोह मोदी से

जिस युवा जोश की लहर पर नरेंद्र मोदी 2014 से ही सवार थे, वो कमज़ोर पड़ती जा रही है. मोदी सरकार के छह वर्षों...

मोदी के 3 पी, 5 टी जैसे शब्दों की बाज़ीगरी, गंभीर विचारों और उपायों की जगह नहीं ले सकते

असली अर्थनीति ऐसे प्रश्नो पर फैसला करने में निहित है कि पैसा सीधे लोगों के खाते में डाला जाए या उसे आर्थिक वृद्धि के लिए निवेश किया जाए, और इस तरह के फैसले तुकबंदियां करके टाले नहीं जा सकते.

एक वायरस ने सबको बांट दिया है- ऐसा क्यों लग रहा कि महामारी पर भारत में कोई कंट्रोल में नहीं

कोरोना महामारी पर सारी बहस वैचारिक खेमों के हिसाब से बंटी दिखाई देती है, भाजपा के बड़े नेता अपने संकीर्ण राजनीतिक हित साधने के लिए इस विभाजन का फायदा उठा रहे हैं, और कुल मिलाकर यही लग रहा है की हालात किसी के काबू में नहीं है.

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अजित पवार की मौत ने भारतीय राजनीति में एक और ‘क्या होता अगर’ वाली बहस छोड़ दी है

दीन दयाल उपाध्याय की हत्या और माधवराव सिंधिया के प्लेन क्रैश से लेकर गांधी परिवार की हत्याओं तक, राजनीति में जो कुछ भी होता है, उसका हिसाब-किताब से कम और किस्मत से ज़्यादा लेना-देना होता है.

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लापता स्वरूपों का मामला: एसजीपीसी ने एसआईटी को रिकॉर्ड मुहैया कराया

चंडीगढ़, 29 जनवरी (भाषा) शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) ने बृहस्पतिवार को कहा कि उसने पंजाब पुलिस के एक विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा...

लास्ट लाफ

सुप्रीम कोर्ट का सही फैसला और बिलकिस बानो की जीत

दिप्रिंट के संपादकों द्वारा चुने गए दिन के सर्वश्रेष्ठ कार्टून.