Monday, 27 June, 2022
होममत-विमतमोदी की राजनीति देश में तिहरे संकट से निपटने में नाकाम है, अब लोकनीति की जरूरत है

मोदी की राजनीति देश में तिहरे संकट से निपटने में नाकाम है, अब लोकनीति की जरूरत है

ऐसे ही निर्णायक मौके पर नेतृत्व की परीक्षा होती है. आज, देश सचमुच जानना चाहता है कि हमारी सरहदों पर क्या हो रहा है, कोरोनावायरस के फैलाव के रोकथाम के मद्देनजर क्या कुछ किया जा रहा है.

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देश एक साथ तीन बड़े राष्ट्रीय संकट झेल रहा है, इतिहास में ऐसा विरले ही देखने को मिलता है. ऐसे में मंगलवार को प्रधानमंत्री ने देश को संबोधित किया. देशवासी जान रहे थे, प्रधानमंत्री जान रहे थे, सबके आगे एकदम ही जाहिर था कि कोरोनावायरस इस देश से टलने का नाम नहीं ले रहा, आजादी के बाद से आज तक का सबसे बड़ा स्वास्थ्य-संकट मुंह बाए खड़ा है. लॉकडाउन से पटकनी खाई अर्थव्यवस्था सर उठा नहीं पा रही और 40 साल के बाद एक बड़ी मंदी के सिर चढ़ने का अंदेशा है. चीन ने जिन हिस्सों को कब्जा लिया है, वहां से टस से मस नहीं हो रहा और देश की सुरक्षा के सामने 1962 के बाद से अब तक की सबसे बड़ी चुनौती आन खड़ी हुई है.

ऐसे ही निर्णायक मौके पर नेतृत्व की परीक्षा होती है. आज, देश सचमुच जानना चाहता है कि हमारी सरहदों पर क्या हो रहा है, कोरोनावायरस के फैलाव के रोकथाम के मद्देनजर क्या कुछ किया जा रहा है. कोरोनावायरस से लड़ने और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए आज स्पष्ट दिशा-निर्देशों की जरूरत है, देश इस तरफ टकटकी बांधकर देख रहा है. चुनौती के तीनों ही मोर्चों पर देश को आज आश्वासन की सख्त जरूरत है.


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दूर से तमाशा देखने की राजनीति

लेकिन देश ने जो आस बांध रखी है, प्रधानमंत्री ने उसकी तरफ एक नजर डालना भी उचित नहीं समझा. ‘दूरी बनाये रखें’ के मंत्र को उन्होंने नए तरीके से इस्तेमाल किया. उन्होंने अपने संबोधन में देश के सामने आन खड़े तीनों ही चुनौतियों से सियासी दूरी बनाये रखने की तरकीब अपनायी. संकटों से सियासी दूरी बनाने के लिए तीन तरीके अपनाये जायेंगे.

स्वास्थ्य-संकट से निपटने के नाम पर उससे कन्नी काट ली जायेगी, जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ते हुए सारा दोष राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों के मत्थे मढ़ा जायेगा. आर्थिक संकट से उबारने का काम बाजार की ताकतों के भरोसे छोड़ दिया जायेगा, केंद्र सरकार अपनी तरफ से कुछ करने के नाम पर ऊंट के मुंह में जीरा रखने जैसे कुछ करतब करती रहेगी. और, सरहद पर उठ खड़ी चुनौती पर बड़ी निष्ठुर किस्म की चुप्पी से काम चलाया जायेगा. लोग इस चुप्पी से उकता न जायें इसके लिए बीच-बीच में टीवी सुलभ नौटंकी रची जायेगी.

जो बात दिन के उजाले की तरह साफ होती जा रही है, वही बात प्रधानमंत्री के भाषण से भी झलकी. अगले कुछ महीने बड़ी कठिनाई के होंगे, ऐसी कठिनाई देश ने आजादी के बाद से अब तक झेली नहीं है. समाधान की कौन कहे, यहां तो सरकार से ये तक नहीं हो रहा कि वो समस्या के वजूद को ही स्वीकारे. गजब कहिए कि इसके बावजूद सरकार को सियासी मैदान में कोई चुनौती नहीं मिल रही. सभी सरकारी और स्वायत्त संस्था इस निज़ाम के अगूंठे तले हैं.

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सत्ताधीश मीडिया को अपनी उंगलियों पर नचाने, सियासी बहस के अजेंडे को तय करने और इन के जरिये जनमानस पर कब्ज़ा रखने में सक्षम है. सियासी शोशेबाजी और आत्मप्रचार के ढोल-मजीरे पीटने में उसकी कोई सानी नहीं. राजनीति के मैदान में मुख्य विपक्षी दल अपनी अप्रासंगिकता से उबर नहीं पा रहे हैं. तो, यों समझिए कि देश के सामने अभी एक सियासी शून्य पैदा हो गया है. यही वक्त लोकनीति का है, एक नई किस्म की राजनीति का है.

सियासी शून्य

महामारी को लेकर चलती सियासत पर गौर कीजिए. कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा अभी भयावह ऊंचाई पर जा चढ़ा है. वो दिन हवा हुए जब ये कहकर काम चलाया जा रहा था कि वायरस के चेन को ब्रेक कर देना है या कोरोना संक्रमितों के ग्राफ को समतल कर दिया है. दरबारी विशेषज्ञ भी अब ऐसे हास्यास्पद दावे नहीं कर रहे. अब वे ये बताने-दिखाने में लगे हैं कोरोना संक्रमितों की संख्या कितने दिनों के अंतराल से दोगुनी हो रही है या फिर उनकी तरफ से फिजूल की ये समझाइश चल रही है कि संक्रमितों के आंकड़े बेशक बढ़ रहे हैं मगर ये भी तो देखिए कि देश में कितने रोगी कोरोना से संक्रमित होने के बाद ठीक हो रहे हैं. इस सिलसिले का एक तर्क ये भी है कि कोरोना हुआ तो क्या हुआ, भारत में कोरोना कोई अमेरिका जितना भयावह थोड़े ही है, यहां रोग से मरने वालों की तादात बड़ी कम है.

अब आप बात की पूंछ पकड़कर उसे चाहें जितना घुमाएं लेकिन ये तथ्य बना रहेगा कि अब हम कोरोना संक्रमित मरीजों के मामले में विश्व के शीर्ष देशों में शामिल हो चुके हैं. अगर पर्याप्त संख्या में टेस्ट किये होते तो शायद अब तक शीर्ष पर पहुंच चुके होते. ये तथ्य बरकरार रहेगा कि हमने लॉकडाउन की अवधि का इस आपात स्थिति से निपटने के लिए समुचित इंतजाम करने में इस्तेमाल नहीं किया और अब हमारा स्वास्थ्य-सुविधाओं का ढांचा महामारी के पसारे के आगे एकदम चरमरा चुका है. मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों में स्वास्थ्य-सुविधाओं का ढांचा लाचार नजर आ रहा है तो बाकी जगहों की कौन कहे.

एक तरफ ये विकराल संकट है तो दूसरी तरफ इससे एकदम ही हाथ झाड़कर खड़ी होने वाली केंद्र की सरकार है. दिल्ली में महामारी की चुनौती से जूझने के नाम पर बेशक केंद्र सरकार कुछ हाथ-पैर हिलाते नजर आ रही है लेकिन जहां तक बाकी जगहों का सवाल है, सरकार ने किसी किस्म के एहतियाती कदम उठाने, कोई योजना तैयार करने या फिर महामारी के रोकथाम से जुड़ी सूचनाओं को साझा करने की जैसी जिम्मेदारी से भी मुंह मोड़ लिया है.

लेकिन, इन तमाम चीजों के बावजूद विपक्ष सरकार को मुंह की खिलाने में नाकाम रहा है क्योंकि जिन राज्यों में विपक्षी दलों का शासन है, वहां उनके पास दिखाने के लिए कुछ खास नहीं है. इस मामले में एक अपवाद बस केरल है. बड़ी बात छोड़ दीजिये, हम तो ‘टेस्ट, ट्रेस, आइसोलेट’ जैसे न्यूनतम सूत्र पर सहमति का दबाव नहीं बना सके. सभी कोरोना संक्रमितों का समभाव से नि:शुल्क उपचार हो इस मामूली सी मांग पर भी एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन नहीं खड़ा हो पा रहा.

अब जरा आर्थिक मोर्चे पर कायम चुनौती पर नजर डालें. कहा जा रहा था कि उठना-गिरना तो लगा ही रहता है, अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर औंधे मुंह गिरे हैं तो सिर तानकर खड़े भी हो लेंगे. लेकिन, ये तर्क खुद ही पलटी मार गया है. अब बिल्कुल जाहिर हो चला है कि 21 लाख करोड़ का पैकेज सिर्फ शोशेबाजी थी.

हम इस वित्त-वर्ष में जीडीपी के मामले में नकारात्मक वृद्धि की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं. उद्योग-धंधे में गतिविधियां जोर नहीं पकड़ रहीं क्योंकि मांग में तेजी नहीं आ रही. कर्जे की उपलब्धि खूब है लेकिन बैंक कर्ज देने में संकोच कर रहे हैं और उद्यमी उधारी लेने में हिचकिचा रहे हैं. शुक्र मनाइए मजदूरी मे गिरावट और मनरेगा के महाविस्तार का कि बेरोजगारी का आंकड़ा कुछ नीचे खिसका है. लेकिन ये लंबे समय तक जारी नहीं रह सकता. अब जगह-जगह से भुखमरी और कुपोषण की खबरें आने लगी हैं.

लेकिन, प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में स्पष्ट कर दिया है कि सरकार अपनी मुठ्ठी कस कर बंद रखेगी. अगले पांच माह के लिए मुफ्त और अतिरिक्त राशन दिया जायेगा, यह जरूरी घोषणा जिस अंदाज़ में की गयी उससे स्पष्ट हो गया कि सरकार इसके अलावा और कुछ राहत जून महीने के बाद नहीं बढ़ाएगी.

आज के बाद विधवा, विकलांग और बुजुर्गों को अनुकंपा राशि नहीं मिलने जा रही, जन-धन खाते में नकदी का हस्तांतरण नहीं होने जा रहा, नि:शुल्क गैस सिलेंडर नहीं मिलने जा रहा और अप्रवासी मजदूरों को खास इंतजाम के तौर पर दिया जाने वाला राशन भी अब नहीं दिया जायेगा.

प्रधानमंत्री के भाषण का एक संकेत ये भी था कि सरकार अब राहत के किसी और उपाय के बारे में विचार नहीं करेगी: किसानों को मुआवजा न मिलेगा, जरूरतमंद परिवारों को सहायता-राशि न मिलेगी, रेहड़ी-पटरी और ठेले पर अपना रोजगार चलाने वालों को कोई एकमुश्त सहायता नहीं मिलने जा रही, डीजल और पेट्रोल पर लगाये जाने वाले झपट्टामार टैक्स को भी वापस नहीं लिया जायेगा. ये सब तो हो रहा है, वावजूद इसके विपक्ष इनमें से किसी भी बात को लेकर उपजे आक्रोश को अपनी तरफ करने में नाकाम रहा है. इसकी खास वजह ये है कि विपक्ष कोई सुसंगत वैकल्पिक नीति सामने लाने में नाकाम रहा है.

और, इस सिलसिले में आखिर को एक बड़ी तस्वीर पर नजर दौड़ाइए. उपग्रह से हासिल नवीनतम तस्वीरें, विश्वसनीय रिपोर्टों और खुद सरकारी अधिकारियों के बयान के बाद सामने खड़ी सच्चाई से इनकार करने की कोई सूरत नहीं बचती. चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा के भारत वाले हिस्से में एक बड़ा भू-भाग कब्जा लिया है और वहां से टलने का नाम नहीं ले रहा. राष्ट्र को विश्वास में लेने की जगह प्रधानमंत्री ने सर्वदलीय बैठक में सफेद झूठ (‘कोई नहीं घुसा’) से काम चलाया.

फिर, ‘मन की बात’ में मनमाने की बात (मुंहतोड़ जवाब) का दौर शुरू हुआ और राष्ट्र के नाम संदेश में तो प्रधानमंत्री ने आक्रांता चीन के सवाल में एकदम ही चुप्पी साध ली. तो, अब लगता यही है कि चीन पर कुछ भी सुनने के लिए हमें उस घड़ी तक इंतजार करना पड़ेगा जब प्रधानमंत्री के टीवी पर दिखाए जाने लायक कोई उपलब्धि न हो! लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर विपक्ष अपनी साख यों गंवा चुका है कि अब कांग्रेस के वाजिब सवालों को दरकिनार कर दिया जाता है चूंकि कांग्रेस चीन के मुद्दे पर राष्ट्रीय क्षति से ज्यादा सत्ताधारी दल की परेशानी में दिलचस्पी लेती नजर आती है.


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राजनीति से लोकनीति

अभी का वक्त विपक्ष की मुख्यधारा की राजनीति से इतर नई दिशा में सोचने और नई पहल करने का है. गवर्नेंस के मोर्चे पर सरकार फेल है लेकिन शासन की संस्थाओं पर उसकी मजबूत पकड़ कायम है जबकि विपक्ष कोई कारगर विकल्प दे पाने में नाकाम है. ये तमाम चीजें एक साथ मिलकर लोकतंत्र की हत्या की परिस्थिति का निर्माण करती हैं. दुनिया के कई मुल्कों में ये दिखा है कि अधिनायकवादी शासक प्राकृतिक आपदा, आर्थिक संकट तथा राष्ट्रीय सुरक्षा के संकट के मौके का इस्तेमाल नागरिक अधिकारों का गला घोंटने और लोकतांत्रिक रीति-नीति को खत्म करने में करते हैं. हमारे देश में संवैधानिक लोकतंत्र के नाम पर जो कुछ बचा-खुचा है, उसके सामने यही खतरा आसन्न है.

समस्या के समाधान का रास्ता मुख्यधारा के राजनीतिक दलों के दायरे के बाहर से निकालना होगा. इस सत्ता का विरोध करने वालों को अब चुनावी मैदान से बाहर की जुगत सोचनी होगी. देश के सामने तिहरा संकट है और इससे निपटने के लिए एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन से कम पर बात नहीं बनने वाली.

जहां तक सेहत के मोर्चे का सवाल है, आज देश को ऐसे स्वयंसेवकों की टोली की जरूरत है जो गांव-गांव, बस्ती-बस्ती जाये और जाकर वहां की बसाहट के बीच सर्वेक्षण के काम में मदद करे, कोरोना के प्रसार को चिन्हित करने में सहायता दे, साथ ही, लोगों को स्वास्थ्य-सुविधाएं हासिल करने में मदद पहुंचाये.

आर्थिक मोर्चे पर जरूरी है कि शोधकर्ताओं की टोलियां बनें जो लोगों की आर्थिक दशा का पता लगाने में सहायता करें, साथ ही, मनरेगा के तहत मिलने वाले काम और पीडीएस के मार्फत मिलने वाले राशन के निगरानी के काम में मददगार हों. जहां तक राष्ट्र की सरहदों की सुरक्षा का सवाल है, हमें ऐसे देशभक्त लोगों की दरकरार है जो बगैर युद्धोन्माद फैलाये लोगों तक जमीनी सच्चाइयों का बयान पहुंचायें. हमें अलग से ‘लोकतंत्र बचाओ’ सरीखा आंदोलन चलाने की जरूरत नहीं बल्कि इस तिहरे संकट से देश को उबारने के लिए अगर जन-आंदोलन चलता है तो वही लोकतंत्र को बचाने का भी काम करेगा.

जयप्रकाश नारायण ने इस तर्ज की राजनीति को लोकनीति का नाम दिया था. लोकनीति सत्ता की राजनीती से परहेज नहीं रखेगी, लेकिन चुनावी राजनीती को संघर्ष और निर्माण के बुनियादी काम में समाहित कर लेगी. आज हम इतिहास के निर्णायक मोड़ पर खड़े हैं. अगले कुछ महीने में देश का दूरगामी भविष्य तय होगा. आज इस अभूतपूर्व संकट का सामना करने और भारतीय गणतंत्र को बचाने के लिए एक राष्ट्रव्यापी लोकनीति अभियान की जरूरत है.

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(योगेंद्र यादव राजनीतिक दल, स्वराज इंडिया के अध्यक्ष हैं. यह लेख उनका निजी विचार है)

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