वर्तमान में हमारा देश एक ऐसे दौर से गुज़र रहा है जिसमें वरिष्ठ अनुभवी लोगों का अपना नज़रिया है जो कि लंबे अनुभव पे टिका है, वहीं दूसरी ओर युवा पीढ़ी है जो कि अपना लक्ष्य प्राप्त करने की जल्दी में है. इस परिदृश्य में स्वाभाविक है कि टकराव होने की संभावना होती है.
असम और बिहार में ढुलमुल राजनीति, लचर नीति , नीति-निर्माताओं का बाढ़ को लेकर उपाय सोचते वक्त हमेशा दिमागी पंगुता का शिकार हो जाना, लोगों का अपने मजबूरियों के घेरे से बाहर निकलकर बाढ़ की विपदा को संघर्ष के एक मुद्दे के रुप में ना देख पाना ही है.
आने वाले कई वर्षों तक भारतीय राजनीति बीजेपी के आसपास और उसके पक्ष और विपक्ष में घूमती रहेगी. हो सकता है कि इस बीच में बीजेपी कोई चुनाव हार भी जाए लेकिन विमर्श के केंद्र में बीजेपी ही रहेगी.
कोरोनावायरस संकट के दौरान जर्मनी में फंसी भारतीय की आपबीती जो कह रही है कि मैं जिस उत्पीड़न से गुज़री, मैं नहीं चाहती कि कोई उस संकट से गुजरे. यह समय है वंदे मातरम मिशन का खुलासा करने का.
गरीब कल्याण अन्न योजना गरीबों से कहीं ज्यादा प्रधानमंत्री को राहत पहुंचायेगी. उदरपूर्ति के साथ उनके रोजगारों के टूटने-छूटने से उत्पन्न असंतोष एवं अत्यन्त कष्टप्रद पलायन से जन्मे आक्रोश को कुछ हद तक ठंडा कर देगी.
हाल की एक स्टडी में पता चला है कि बीड़ी उद्योग में लगे लोगों की संख्या में जिसमें महिलाएं अधिक हैं, राष्ट्रीय स्तर पर इज़ाफा हुआ है लेकिन दक्षिणी सूबों में इसमें गिरावट दर्ज की गई है.
सत्ता को लेकर भाजपा की लालसा खतरनाक लेकिन प्रेरणादायी भी है. यही वजह है कि इसके आलोचक भी राजस्थान संकट के मामले में खुद को बेवकूफ बनाने के लिए कांग्रेस की आलोचना करने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते.
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण चुनाव जीतने की संभावना बढ़ाने के लिए किया गया लगता है, लेकिन एक बड़ा कानूनी सवाल है: क्या इससे उन पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है?