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Sunday, 12 April, 2026
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पाकिस्तान की राजनीति और इस्लाम के बारे में खादिम हुसैन रिज़वी की लोकप्रियता और अचानक हुई मौत से क्या संकेत मिलता है

पाकिस्तान की कट्टरपंथी इस्लामी सियासत का चेहरा माने जाने वाले मौलाना खादिम हुसैन रिज़वी की अचानक मौत के बावजूद मजहबी कट्टरपंथ के प्रति लोगों का व्यापक आकर्षण खत्म नहीं होने वाला है. 

यूपी कांग्रेस में भगदड़, ‘धरना गुरू’ बनकर रह गए हैं प्रदेश अध्यक्ष अजय लल्लू

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने सक्रियता दिखाकर पार्टी में जान फूंकने की कवायद की थी, वह लाभ अब खत्म होता नजर आ रहा है.

अलागिरी से लेकर दिनाकरन तक, तमिलनाडु की चुनावी बिसात में भाजपा के लिए स्थिति साफ होती जा रही है

कैलेंडर में दिख रही चुनाव की तारीखें वास्तव में कहीं अधिक करीब हैं – राजनेता इस चेतावनी को अच्छी तरह समझते हैं. तमिलनाडु में...

ड्रोन ने अजरबैजान को जंग जिताई, भारत को सैन्य आधुनिकीकरण पर होशियारी से खर्च करना चाहिए

भारत ने हमेशा सैन्य ताकत पर ध्यान केंद्रित किया है. आर्मेनिया-अजरबैजान के संघर्ष से पता चलता है कि यह एक अच्छी रणनीतिक योजना क्यों नहीं है.

असदुद्दीन ओवैसी के उदय का हिंदुत्व की राजनीति को एक जमाने से इंतजार था

मुस्लिम एकजुट और एकमुश्त एक जगह वोट करें, ये विचार वैसा ही गर्हित है जैसा कि हिन्दुओं को एक वोटबैंक में तब्दील करने की कोशिश.

RCEP में शामिल न होकर मोदी ने सही फैसला किया था क्योंकि इससे दक्षिण पूर्व एशिया के देशों को ज्यादा फायदा नहीं होने वाला

अमेरिका विकल्प के रूप में नहीं उपलब्ध हो रहा इसलिए चीन के नेतृत्व वाली व्यापार व्यवस्था में शामिल होने का फैसला हताशा में आत्मघाती कदम उठा लेने जैसा ही होगा.

एकनाथ रानडे- RSS का ऐसा प्रचारक जिसने विवेकानंद शिला स्मारक के लिए सभी विचारधाराओं को एक कर दिया

विवेकानंद शिला स्मारक के निर्माता और विवेकानंद केंद्र कन्याकुमारी के संस्थापक एकनाथ रानडे जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे, उन्होंने स्वामी विवेकानंद के स्मारक के लिए सब विचारधाराओं को भारतीयता के रंग में रंग दिया.

भारतीय उदारवादियों के पास RSS के अपने ब्रांड हिंदुत्व संवैधानिकता से मुकाबले की कोई रणनीति नहीं

हिंदुत्व के उदारवादी विरोधियों को अभी तक हिंदुत्व संवैधानिकता के राजनीतिक प्रभाव का एहसास नहीं हुआ है. वे अब तक भारतीय संविधान को एक स्व-व्याख्यात्मक राजनीतिक पाठ मानते हैं.

समस्या दिवाली पर पटाखे फोड़ने की नहीं, बल्कि इसे एक राष्ट्रीय और नैतिक मुद्दा बनाने की है

लागू नहीं किए जा सकने वाले आदेश, पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध और एक मॉडल के रूप में दिल्ली का इस्तेमाल, ये उपाय न तो दिवाली के समय, न उससे पहले और न उसके बाद कारगर साबित होते हैं.

मोदी की BJP और राहुल की कांग्रेस में एक समानता है- दोनों अपने सहयोगियों को विमुख कर रहीं

कांग्रेस अपने सहयोगी को तात्कालिक नुक़सान पहुंचा रही है, जबकि उन्हें लंबे समय के लिए काट रही है.

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दुनिया तेजी से बदल रही है—भारत को खुद को सुधारना, मजबूत करना और आर्थिक ताकत बढ़ानी चाहिए

आज निरंतर बदलती विश्व व्यवस्था भारत के लिए एक मौका उपलब्ध करा रही है जिसका लाभ उठाने के लिए उसे खुद को अनुशासित रखना होगा ताकि पाकिस्तान जब अपने लिए मौका देख रहा है तब हम हड़बड़ी में कोई प्रतिक्रिया न कर बैठें.

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ज्योतिबा फुले की द्विशताब्दी: दो साल का राष्ट्रव्यापी समारोह शुरू हुआ

नयी दिल्ली, 11 अप्रैल (भाषा) सरकार ने शनिवार को समाज सुधारक महात्मा ज्योतिबा फुले की 200वीं जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित होने वाले...

लास्ट लाफ

सुप्रीम कोर्ट का सही फैसला और बिलकिस बानो की जीत

दिप्रिंट के संपादकों द्वारा चुने गए दिन के सर्वश्रेष्ठ कार्टून.