नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी की फाइल फोटो.
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भले ही ये कितना भी नामुमकिन लगता हो, लेकिन कांग्रेस पार्टी आज उसी अवांछनीय स्थिति में है, जिसमें उसकी कहीं ज़्यादा ताक़तवर विरोधी भारतीय जनता पार्टी है. ये भी अब अपने सहयोगियों के लिए उतनी ही ‘अछूत’ बन रही हैं, जितनी नरेंद्र मोदी और अमित शाह की बीजेपी. लेकिन इनके कारण अलग-अलग हैं. कांग्रेस से सहयोगियों का मोहभंग, इसके अपने दम पर चुनाव जीतने की अक्षमता के चलते हुआ है. बीजेपी के साथ इसका बिल्कुल उलट है- सहयोगी इससे दूर इसलिए जा रहे हैं, क्योंकि शक्तिशाली चुनावी प्रदर्शन का नतीजा ये हुआ है कि पार्टी ज़्यादा अहंकारी हो गई है और उनके साथ अक्सर बुल्डोज़र वाला रवैया अपनाने लगी है.

इस रुझान को समझने के लिए बिहार सबसे उपयुक्त ज़मीन है. ऐसा लगता है कि बीजेपी सूबे में अपने सहयोगी, नीतीश कुमार की ज़मीन को खा गई है, जहां उसने जनता दल (युनाइटेड) की 43 सीटों के मुकाबले 74 सीटें जीतकर उससे कहीं बेहतर प्रदर्शन किया है. मोदी-शाह के अंतर्गत एक महत्वाकांक्षी बीजेपी से हाथ मिलाने का- चाहे वो जेडी(यू) हो, शिवसेना हो, या असम गण परिषद (एजीपी) हो- बुनियादी तौर पर मतलब है, अपने-अपने राज्य में अपना वजूद ख़त्म हो जाने का ख़तरा मोल लेना.

लेकिन, कांग्रेस के लिए बिहार एक बिल्कुल अलग कहानी रहा है. फिर से उठ खड़े हुए तेजस्वी यादव को, डूबती कांग्रेस ने नीचे खींच लिया, जो 70 सीटों पर चुनाव लड़ने के बाद सिर्फ 19 सीटें जीत पाई.

बिहार सिर्फ एक मिसाल है जो दिखाता है कि दो बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां अपने छोटे व क्षेत्रीय सहयोगियों को क्या दे रही हैं. एक उन्हें तात्कालिक नुक़सान पहुंचा रही है, जबकि दूसरी उन्हें लंबे समय के लिए काट रही है, भले ही आज ये उन्हें सत्ता में ले आए.


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कांग्रेस- एक दायित्व

कांग्रेस के लिए बिहार कहीं से भी असामान्यता नहीं है. 2017 में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को पूरी तरह दफन करने से लेकर, तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके), और महाराष्ट्र में नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी जैसे सहयोगियों के लिए इसके संदिग्ध योगदान तक, कांग्रेस का अब तक का ट्रैक रिकॉर्ड गड्ड-मड्ड ही रहा है. इसका स्ट्राइक रेट अक्सर कम ही रहता है, और अगर गठबंधन अच्छा प्रदर्शन करता है- जैसा कि बिहार और महाराष्ट्र में हुआ, तो वो काफी हद तक क्षेत्रीय सहयोगी की वजह से होता है.

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बिहार में मुंहकी खाने और यूपी उप-चुनावों में कांग्रेस की हार तथा 2017 की भारी भूल से सबक़ सीखने के बाद, समाजवादी पार्टी चीफ अखिलेश यादव ने तुरंत कह दिया कि 2022 का विधान सभा चुनाव वो अकेले लड़ेंगे.

संभावना ये है कि अखिलेश ऐसे अकेले नेता नहीं होंगे. कांग्रेस को कोई क्यों छूना चाहेगा, जब चुनावों में इसकी क्षमता को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं? कांग्रेस अब कांग्रेस होने के नाते चुनाव नहीं जीतती, वो अगर अच्छा करती है तो जनाधार वाले मज़बूत क्षेत्रीय नेताओं की वजह से करती है या फिर सहयोगियो की वजह से.

पिछले कुछ चुनाव देखिए जिनमें पार्टी ने अच्छा किया है- पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़, वहां अच्छे से पैर जमाए राज्य के नेताओं के कंधों पर सवार होकर जीते गए, उसमें भी अक्सर एक से ज़्यादा के मेल से. पार्टी ने हरियाणा में अच्छा किया तो हुड्डा की बदौलत. महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी के साथ आने से उसे मौक़ा मिल गया.

आज कांग्रेस की जीत भी कितनी कमज़ोर होती है, इसकी मिसाल मध्य प्रदेश से अच्छी और क्या हो सकती है. एक मज़बूत नेता छोड़ देता है और पार्टी ढह जाती है. राष्ट्रीय स्तर पर इसका गिरता प्रदर्शन साफ दर्शाता है कि ये ग्रैण्ड ओल्ड पार्टी अब अपने नाम पर वोट बटोरने की अपनी पुरानी क्षमता खो चुकी है.

ये कहना अटकलबाज़ी ज़्यादा होगी कि क्या कांग्रेस के सहयोगियों का प्रदर्शन बेहतर होता, अगर उन्होंने इससे हाथ न मिलाया होता. लेकिन अब काफी आंकड़े सामने आ चुके हैं, जो दिखाते हैं कि किस तरह कांग्रेस, अपने से ज़्यादा ताक़तवर सहयोगियों की पीठ पर सवार रहती है और अक्सर उन्हें ले डूबती है. दिप्रिंट की फ़ातिमा ख़ान ने कुछ आंकड़ों का विश्लेषण किया है, जो इस उदाहरण को दर्शाता है.

बुनियादी तौर पर, कांग्रेस ने अपने या अपने केंद्रीय नेतृत्व की लोकप्रियता के दम पर चुनाव जीतने की क्षमता खो दी है, जिसे राजनैतिक पतन कहना एक प्रियोक्ति ही होगी. तो फिर सहयोगी इसके साथ जुड़ाव क्यों महसूस करेंगे? जिन राज्यों में ये अच्छा करती है, वो इसके क्षेत्रीय नेताओं की वजह से हैं जो वैसे भी सहयोगियों को जगह नहीं देंगे. अन्य राज्यों में, नफे बनाम नुक़सान के चार्ट में, ये पार्टी नुक़सान में ही इज़ाफा करती है.

बीजेपी से समरूपता

आज कांग्रेस और बीजेपी के बीच कुछ भी समान नहीं है, क्योंकि कांग्रेस का राजनीतिक ग्राफ लगातार गिर रहा है, जबकि बीजेपी के सितारे बुलंद हैं.

लेकिन सहयोगियों की एक विमुखता है, जो इन दोनों को एक साथ बांधती हुई दिखती है. अपने क्षेत्रीय सहयोगियों को किनारे करते हुए, राज्य में प्रमुख पार्टी बनकर बीजेपी उन्हें तक़रीबन ख़त्म कर देती है. महाराष्ट्र में शिवसेना, बिहार में जेडी(यू) और असम में एजीपी, सबका यही हश्र हुआ है. महाराष्ट्र में शिवसेना, जो एक क्षेत्रीय ताक़त हुआ करती थी, उस स्थिति में आ गई जहां बीजेपी ‘बड़ा भाई’ बनकर उससे ज़्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने लगी थी.

बीजेपी के साथ मिलना एक दोधारी तलवार जैसा है. नरेंद्र मोदी और अमित शाह के अंतर्गत, बीजेपी किसी सहयोगी को सत्ता तक ले जाने की ताक़त रखती है, लेकिन इस जोड़ी के अंतर्गत ये अपने सहयोगियों को तबाह करने, उनके महत्व को घटाने और उनके साथ ग़लत व्यवहार करने की भी सामर्थ्य रखती है.

22 साल के साथ के बाद, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से शिरोमणि अकाली दल का बाहर होना- चूंकि उसने तीन कृषि क़ानूनों पर ऐतराज़ किया था- ऐसे उदाहरणों की एक लंबी सूची में सबसे ताज़ा मिसाल है कि सहयोगी दल किस तरह बीजेपी के हाथों ठगा हुआ महसूस करते हैं.

अपनी चुनावी कामयाबी और ताक़तवर राष्ट्रीय मौजूदगी के नशे में चूर, मोदी और शाह की नज़र में, चुनावी या सियासी रूप से सहयोगियों की कोई औक़ात नहीं है. इन्होंने नीतीश कुमार के कमज़ोर प्रदर्शन के बाद भी, उन्हें सीएम की कुर्सी भले दे दी हो, लेकिन उनकी मदद से हाथ खींचने में कितना समय लगेगा?

तमिलनाडु में बीजेपी अपनी पुरानी तरकीब आज़माते हुए वेल यात्रा के ज़रिए हिंदू वोटों को बांटने का प्रयास कर रही है, भले ही ऐसा उसकी सहयोगी एआईएडीएमके की क़ीमत पर हो. लेकिन एआईएडीएमके ने उसके इस क़दम को पसंद नहीं किया है और अपने सहयोगी की कोशिशों का विरोध किया है.

देर-सवेर से, क्षेत्रीय पार्टियां बीजेपी से दूसरी बनाकर रखना चाहेंगी, ताकि उनका सियासी वजूद बना रहे. ठीक वैसे ही, जैसे अपना चुनावी वजूद बनाए रखने के लिए, वो कांग्रेस को भी दूर रखना चाहेंगी. चुनावों में बेहद ख़राब प्रदर्शन कांग्रेस की स्थिति को और भी ख़राब बना देता है, लेकिन दोनों राष्ट्रीय दलों को काफी आत्म-मंथन करने की ज़रूरत है कि उनके सहयोगी उनसे दूर क्यों छिटक रहे हैं, और इससे उन्हें आगे चलकर कितना नुक़सान पहुंच सकता है.


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(यहां प्रस्तुत विचार निजी हैं)

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