जब तक जनगणना का मामला संविधान के तहत केंद्र की लिस्ट में है, तब तक राज्य सरकारें जनगणना नहीं करा सकतीं. राज्य सरकारें सिर्फ सर्वे करा सकती हैं, जिनको कोई कानूनी संरक्षण प्राप्त नहीं होगा.
समेकित युद्धक समूहों ने सेना को अपना आकार संतुलिन रखने में मदद की है और उसे अधिक कुशल बनाया है लेकिन अब सुधारों को लागू करके अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने का समय आ गया है.
नरेन्द्र मोदी सरकार ने जाति आधारित जनगणना नहीं कराने को एक नीतिगत निर्णय बताते हुए अपनी ओर से ऐसे किसी विचार पर विराम लगा दिया है. लेकिन कई राजनीतिक दल इसे आगामी विधानसभा चुनाव में एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना रहे हैं.
अपनी आज़ादी के 75वें वर्ष में भारत को शायद खुद पर एक एहसान करना चाहिए और मरने के करीब पहुंच चुके इस समूह में फिर से जान फूंकने के लिए कुछ नए मौलिक तरीके अपनाने चाहिए.
उत्तर प्रदेश में फील्ड वर्क करते हुए मैंने अनुसूचित जाति के कई लोगों से जो बात की उससे यही तथ्य उभरा कि दलितों को सत्ता में हिस्सेदारी देने के मामले में भाजपा के दावे खोखले ही हैं.
सरकारें हमेशा से ही मुक्तिधाम, घाट और नदी तट के सौंदर्यीकरण पर पैसा खर्च कर रही हैं लेकिन यह सब तो इंसानी जरूरतें हैं इसमें नदी की जरूरत कहां है? उसकी जरूरत सिर्फ पानी है, उसके हक का पानी, जो हम देना नहीं चाहते.
एक पक्ष सोचता है कि आज भारत अपनी हैसियत से ज्यादा आगे बढ़कर कदम उठा रहा है, जबकि दूसरा पक्ष सोचता है कि मोदी ने भारत की हैसियत कमजोर कर दी है और भारत अपनी हैसियत से कम कदम उठा रहा है. सच यह है कि दोनों ही गलत हैं.