Thursday, 7 July, 2022
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JNU के आतंकवाद विरोधी कोर्स को ‘सांप्रदायिक’ नज़र से न देखें, भारतीय इंजीनियरों को इसकी जरूरत

कोर्स में छात्रों को इस आवश्कता के बारे भी शिक्षित करने का प्रयास किया जाएगा कि विज्ञान और टेक्नॉलजी को किस तरह इस्तेमाल किया जाए कि किसी अनहोनी की सूरत में भारत के पास, उससे निपटने के लिए पर्याप्त जवाब हों.

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ऐसा लगता है कि एक अलिखित नियम है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के बेहद ज्ञानी परिसर के भीतर जो कुछ भी होता है, उसका विवाद की अग्नि परीक्षा से गुज़रना आवश्यक है. जेएनयू शिक्षा परिषद ‘काउंटर टेररिज़्म, असममित संघर्षों और प्रमुख शक्तियों के बीच सहयोग के लिए रणनीतियां’ नाम से एक नया कोर्स शुरू करने जा रही है. इसे इंजीनियरिंग के छात्रों को एक विषय के रूप में पढ़ाया जाना है, जिसका उद्देश्य उन चुनौतियों को गहराई से समझना है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा को आतंकवाद से मिल रही हैं.

कोर्स में छात्रों को इस आवश्यकता के बारे भी शिक्षित करने का प्रयास किया जाएगा कि विज्ञान और टेक्नॉलजी को किस तरह इस्तेमाल किया जाए कि किसी अनहोनी की सूरत में भारत के पास, उससे निपटने के लिए पर्याप्त जवाब हों. ये जेएनयू कोर्स वास्तव में छात्रों को एप्लिकेशन एरिया के विशाल और नए ज्ञान क्षेत्रों की उपलब्धता से अवगत कराएगा.

बढ़ती प्रवृत्ति

बहुत से उच्च शिक्षा संस्थानों में ये प्रवृत्ति है, कि छात्रों को विज्ञान, टेक्नॉलजी, इंजीनियरिंग, और मेडिकल (स्टेम) धाराओं की समग्र शिक्षा उपलब्ध कराई जाती है और उन्हें मानविकी से जुड़े विषयों से रूबरू कराया जाता है, जैसे प्रवासी अध्ययन, विस्थापित लोगों से जुड़े मुद्दे, उभरते हिंसात्मक क्षेत्र, संघर्ष की स्थितियां, और बहुत से ऐसे विषय जिनका सीधे तौर पर, विज्ञान और प्रौद्योगिकी पाठ्यक्रम से कोई रिश्ता नहीं होता.

अमेरिका में मैसाचुसेट्स प्रौद्योगिकी संस्थान(एमआईटी) एक साझा कार्यक्रम चलाता है, जिसमें मानविकी और विज्ञान के विषय होते हैं, ताकि छात्र को ज्ञान की एक व्यापक धारा से रूबरू कराया जा सके. जब छात्र गंभीरता के साथ विज्ञान और प्रौद्योगिकी पाठ्यक्रम को पढ़ता है, तो वो हर किसी के दैनिक जीवन से सरोकार रखने वाले, वैश्विक मामलात की समझ और वाक़फियत से होने वाले फायदों से वंचित नहीं रहता.

सुरक्षा और रणनीतिक विशेषज्ञों के बीच, इस बात को लेकर आम सहमति है, कि न सिर्फ भारत के पड़ोस बल्कि दुनिया के अन्य हिस्सों में भी, भू-राजनीति के डाइनामिक्स पर आतंकवाद का प्रभाव बढ़ रहा है. अफगानिस्तान में अमेरिका का फिर से प्रवेश, 9/11 आतंकी हमलों के बाद हुआ था. उसके बाद ‘आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई’ के दो महत्वपूर्ण तत्व थे- आतंकवाद का धार्मिक सांचा, और दोनों पक्षों की ओर से टेक्नॉलजी का इस्तेमाल, जो कभी कभी काफी उन्नत होती थी.

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इसकी अपेक्षा अफ्रीका के बोको हराम जैसे आतंकी संगठन, उन्नत तकनीक के इस्तेमाल के लिए नहीं जाने जाते, और आतंकी गतिविधियों से निपटने के लिए, वहां की सरकारें टेक्नॉलजी को अपनाने में और भी धीमी हैं.

आतंकवाद से मुक़ाबले में सूचना एकत्र करने, ख़ुफिया जानकारी जुटाने, और उपयुक्त तकनीकी समाधानों का विश्लेषण, तथा अच्छे तरीक़े से उनका इस्तेमाल करने के लिए, उन्नत तकनीक के प्रयोग की ज़रूरत होती है. जिस इंजीनियर को ऐसा काम दिया जाता है, उससे अपेक्षा की जाती है कि उसे आतंकी संगठनों के उद्देश्यों, और उनके द्वारा अपने भयावह एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए, अपनाए जाने वाले तौर-तरीक़ों की, बुनियादी जानकारी ज़रूर होगी.

इससे किसी को बहस नहीं है, कि यूनिवर्सिटी स्तर के इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम में, ऐसे विवादास्पद विषय शामिल होने चाहिएं, जिनका छात्र के पेशे से कोई सीधा संबंध नहीं है. लेकिन ख़तरे की विभिन्न परंपरागत और ग़ैर-परंपरागत धारणाएं, जिनका मौजूदा संदर्भ में हम सामना कर रहे हैं, उनसे थोड़ी बहुत वाक़फियत छात्र के आउटपुट के मूल्य को ही बढ़ाएगी.


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पिछले कुछ सालों में, राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरा कई स्रोतों से और कई रूपों में आ रहा है. आतंकवाद की पारंपरिक कार्यप्रणाली में सबसे उन्नत तकनीकों का प्रयोग होता है, जो अलग अलग देशों और महाद्वीपों में स्थित होती हैं, और वहीं से संचालित होती हैं. आतंकवाद को अंजाम देने वाले तत्व टेक्नॉलजी के इस्तेमाल में, कभी कभी अपने लक्ष्यों, आम लोगों, या सरकारों से बहुत आगे होते हैं. ऐसी स्थिति में ज़रूरत ये होती है, कि राष्ट्रों के बीच बेहतर समझ, सहयोग, और समन्वय हो, और वो मिलकर कोई साझा समाधान निकालें.

ये ‘शिक्षा का सांप्रदायिकीकरण’ नहीं है

पाठ्यक्रम के उन हिस्सों तथा तथा जेएनयू में कोर्स पढ़ाने वालों के अनुसार, अध्याय में आतंकवाद के विभिन्न रूपों तथा आतंकी संगठनों की जड़ों को खोजने की कोशिश की गई है, जिनमें जिहादी आतंकवाद भी शामिल है, जो तालिबान और उससे जुड़े दूसरे संगठनों के रूप में प्रकट होता है. प्रोफेसर अरविंद कुमार ने, जिनका राष्ट्रीय उन्नत अध्ययन संस्थान (एनआईएएस) के साथ एक लंबा अनुभव रहा है, कोर्स की सामग्री तैयार की है जो विदेशों में बहुत से विश्वविद्यालयों के, इसी तरह के कोर्सेज़ पर आधारित है.

बहुत सी विकसित और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं, आतंकी तत्वों द्वारा पैदा किए गए आर्थिक व्यवधानों की समस्या से दोचार हैं, जो धार्मिक कट्टरवाद में डूबे हैं और अपनी नापाक हरकतों के लिए धार्मिक सिद्धांतों के ग़लत अर्थ पेश करते हैं. संयोग से, ये भी देखा जाता है कि भाड़े के ऐसे बहुत से संगठनों को, राजनीतिक प्रतिष्ठानों, दुष्ट सेनाओं, और धर्म-शासित राजनीतिक व्यवस्थाओं की सरपरस्ती भी मिल जाती है.

शिक्षा मंत्रालय तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) जैसे अन्य शैक्षणिक निकायों को, जेएनयू से संकेत लेकर एक ऐसी विश्वस्त प्रक्रिया विकसित करनी चाहिए, जिसमें स्टेम कोर्सेज़ को लिबरल आर्ट्स, साहित्य, और मानविकी के क्रेडिट्स के साथ जोड़ा जा सके, जिससे कि छात्र ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद, वास्तविक दुनिया का सामना करने के लिए, बहुमुखी ज्ञान से लैस हो जाएं.

वर्तमान शिक्षा प्रणाली में, स्टेम शिक्षा और विशुद्ध विज्ञान कोर्सेज़ के अंदर कोई ऐसी सामग्री नहीं है, जिसका दर्शन, इतिहास, या आध्यात्म विज्ञान के साथ कोई संबंध हो. पिछले कुछ सालों में हमारा समाज एक ऐसी चूहा दौड़ में पड़ गया है, जिसमें एक ओर इंजीनियर्स तथा डॉक्टर्स पैदा किए जा रहे हैं, और दूसरी ओर कला और मानविकी के छात्र, और ये दोनों एक दूसरे को अजनबी समझते हैं. शिक्षा का कोर्स तय करने के लिए, नौकरी के बाज़ार और आयवर्ग के आधार पर ही अंतिम फैसला होने लगा है.

भारत में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान जैसे इंजीनियरिंग संस्थानों में, कंप्यूटर साइंस पढ़ने वाले छात्र को मानविकी और सामाजिक विज्ञान कोर्सेज़ में केवल 4.5 प्रतिशत क्रेडिट्स की दरकार होती है. इसकी अपेक्षा किसी विदेशी यूनिवर्सिटी में इसी तरह के कोर्स के लिए, 20 प्रतिशत क्रेडिट प्वॉइंट्स चाहिए होते हैं. और इसमें कोई शक नहीं कि वो बेहतर सुसज्जित नागरिक तैयार करते हैं, जिनका वैश्विक नज़रिया कहीं अधिक व्यापक होता है, भले ही हम एक मज़बूत शैक्षणिक की डींग हांकते हों. ‘शिक्षा का सांप्रदायिकीकरण’ कहकर इसे नीचे दिखाने की बजाय, जेएनयू प्रयोग को समझना चाहिए, उसका विश्लेषण करना चाहिए, ज़रूरत हो तो उसे संपादित करना चाहिए, तथा उसे भारत के दूसरे विश्वविद्यालयों में भी दोहराया जाना चाहिए

(शेषाद्री चारी ‘ऑर्गनाइज़र’ के पूर्व संपादक हैं. व्यक्त विचार निजी हैं.)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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