भारत की सबसे पुरानी पार्टी को अटकलों और प्रयोगों को विराम देकर एक ऐसे बड़े मुद्दे को चुनना होगा जो उसकी तकदीर बना दे और भारत की सबसे शक्तिशाली पार्टी को परास्त कर सके.
लगता है, मोदी और शाह राज्यों में भाजपा में पीढ़ीगत बदलाव लाने का मन बना चुके हैं. आज भले यह एक जुआ लग रहा है, लेकिन पार्टी का जो इतिहास रहा है उसके भरोसे वे निश्चिंत होंगे कि कोई विद्रोह नहीं होगा.
3 जनवरी 1977 को 42वां संविधान संशोधन लागू होते ही एक स्टेट के रूप में भारत गणराज्य की विचारधारा 'समाजवादी' हो गयी. समाजवादी राज्य बनना हमारे लोकतांत्रिक गणराज्य का आधिकारिक उद्देश्य बन गया.
अफसोस की बात तो यह है कि केवल पाकिस्तान ही है जिसे अपने पड़ोसी देश में तालिबानी बोलबाले के दुष्परिणाम भुगतने होंगे. उम्मीद है कि इस्लामाबाद इस पर अपनी आंखें नहीं मुंदेगा.
मुस्लिम बुद्धिजीवी वर्ग खुद को अवसरवादी साबित करेगा यदि वह आरएसएस प्रमुख की इस टिप्पणी में निहित धारणाओं से नहीं जुड़ता है कि मुसलमानों का डीएनए हिंदुओं के समान है.
आज जो दहशत व्याप्त है उसमें बढ़ती विषमता आग में घी वाला काम कर रही है. इसने अमीर, गरीब, मध्य आय वाले देशों के समाजों की स्थिरता को खतरे में डाल दिया है.
भारत तालिबान को सिर्फ इसलिए राजनीतिक दुश्मन न मान बैठे कि वह इस्लामी है या पाकिस्तान का दोस्त है. भाजपा अगर अपने देश में ध्रुवीकरण की राजनीति से बाज आए तो वह मोदी सरकार उसे अपना दोस्त बना सकती है.