Saturday, 2 July, 2022
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भविष्य में रोजगार पाने वालों से लेकर कमतर रोजगार वालों तक, यही करेंगे भारत के अगले जनांदोलन का नेतृत्व

हमारे पास पहली बार एक ऐसा समूह है जो कि रोजगार को लेकर पूरे देश में जनांदोलन का नेतृत्व कर सकता है.

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परिपाटी तो यही मानने की रही है कि भारत में बेरोजगारी को आधार बनाकर कोई सियासी लामबंदी नहीं हो सकती. आप मंहगाई, भ्रष्टाचार जैसे आमफहम मुद्दों को आधार बनाकर जन-आंदोलन छेड़ सकते हैं या फिर जाति-आधारित आरक्षण और कृषि कानून सरीखे तबकाती मुद्दे पर जनान्दोलन चला सकते हैं लेकिन आप ऐसा ही आंदोलन बढ़ती बेरोजगारी को आधार बनाकर खड़ा नहीं कर सकते, भले ही बेरोजगारी का आंकड़ा कितना भी आकाश छूता क्यों न हो. बेरोजगारी के मुद्दे पर जन-आंदोलन न खड़ा कर पाने को लेकर संशयवादियों में प्रचलित ऐसे ही तर्क महेश व्यास ने अपने हाल के एक लेख में उठाये हैं.

लेकिन मैं इन तर्कों से सहमत नहीं.

मेरा मानना है कि भारत में अभी हम जिस किस्म और जिस दर्जे की बेरोजगारी देख रहे हैं वह एक जन-आंदोलन को जन्म दे सकती है. दरअसल, बेरोजगारी के मुद्दे पर देश भर में एक बड़ा आंदोलन जैसे फूट पड़ने को तैयार बैठा है. यह आंदोलन जंगल की आग की तरह फैलेगा. हां, हमें अभी इतना भर नहीं पता कि जंगल की आग को भड़काने वाली चिनगारी कहां और कब सुलगेगी.

संशयवादियों की चूक

बेरोजगारी की समस्या के भीतर जन-आंदोलन बन पाने की कूबत होने को लेकर शंका करनेवालों के प्रति इमानदारी बरतते हुए कहें तो दरअसल यही कहना ठीक होगा कि एक मुद्दे के रुप में बेरोजगारी के महत्व को वे कम करके नहीं आंकते. वस्तुतः महेश व्यास के संस्थान, सेंटर फॉर द मॉनिटॉरिंग ऑफ इंडियन इकॉनॉमी ने बेरोजगारी के सिलसिलेवार बेहतरीन आंकड़े पेश किये हैं. बेरोजगारों की बढ़ती तादाद के बाबत देश को चेताने के मोर्चे पर महेश व्यास अग्रणी रहे हैं. लेकिन, संशयवादियों का मुख्य तर्क है कि बेरोजगारों की तादाद फिलहाल हद दर्जे तक क्यों न बढ़ गई हो फिर भी उसने देश की आबादी के बड़े छोटे से हिस्से को प्रभावित किया है. दूसरी बात यह कि जो बेरोजगारी की मुश्किल को झेल रहे हैं वे मानकर चलते हैं कि यह उनकी निजी नाकामी का नतीजा है, इसमें व्यवस्था का कोई दोष नहीं जो इसके समाधान के लिए कोई राजनीतिक तरीका आजमाया जाये. इस सिलसिले की तीसरी और आखिरी बात यह कि बेरोजगारी की दशा में पड़े लोग अपने को बड़ा अशक्त महसूस करते हैं और उनमें बिखराव भी बहुत ज्यादा होता है सो वे किसी धरना-प्रदर्शन के लिए एकजुट नहीं हो सकते. इसमें कोई शक नहीं कि ये प्रचलित तर्क दमदार हैं और उनमें बड़ी बुद्धिमत्ता की बात कही गई है.

लेकिन हाल के वक्त में भारतीय अर्थव्यवस्था कोरोनाकाल को झेलती हुई जिन राहों से गुजरी है, उसका तकाजा है कि हम बेरोजगारी को आंदोलन का मुद्दा न मानने के इन तर्कों पर पुनर्विचार करें. यहां हम बस एक मुख्य मुद्दे यानि बेरोजगारों की तादाद पर विचार करें. सोचें कि बेरोजगारी के मसले पर राजनीतिक लामबंदी के लिए किस तादाद में लोग मौजूद हैं.

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बेरोजगारों की बड़ी आबादी

पहली बात तो यह कि किसी आधिकारिक या गैर-आधिकारिक आकलन में जो तादाद बतायी जा रही है, बेरोजगारों की संख्या उससे कहीं ज्यादा है. सीएमआइई के आकलन के मुताबिक इस साल के अगस्त माह में बेरोजगारी की दर 8.3 प्रतिशत थी. इसका मतलब हुआ बेरोजगारों की संख्या का 3.5 करोड़ होना जो कि एक बड़ी तादाद है लेकिन यह देश की वोट देने योग्य उम्र को पहुंचती आबादी से 4 प्रतिशत कम है. सरकारी आंकड़ों में भी कोरोना-काल से पहले के दौर की बेरोजगारी दर 7.8 प्रतिशत बतायी गई है जो भारत में आम तौर पर प्रचलित बेरोजगारी दर से दोगुनी से ज्यादा है.

लेकिन इस संख्या को पक्की तादाद मानकर ना चलें क्योंकि इसमें उन्हीं लोगों की गिनती की गई है जो काम करना चाह रहे हैं, काम खोजने के उद्यम कर रहे हैं लेकिन उन्हें नौकरी नहीं मिल रही. अगर आप बेरोजगारी दर की गिनती का कहीं ज्यादा सीधा-सरल रास्ता और आम समझ वाली परिभाषा अपनायें (सीएमआइई ने इसे ग्रेटर अनएप्लायमेंट रेट यानि वृहत्तर बेरोजगारी दर का नाम दिया है) और बेरोजगारों की श्रेणी में उन लोगों को रखें जो काम करना चाहते हैं लेकिन नौकरी नहीं मिल रही तो फिर ऐसे लोगों की तादाद सीएमआइई के आंकड़ों के अनुसार इस साल के अगस्त माह में 13.8 प्रतिशत यानि 6.1 करोड़ थी. हम ऐसे लोगों में उनकी गिनती भी कर सकते हैं जो काम करने के आयु-वर्ग में हैं, काम करने के लायक हैं लेकिन ये नहीं कहते कि वे नौकरी करना चाहते हैं क्योंकि उन्हें नौकरी पाने के हालत नजर नहीं आ रहे. अगर वैश्विक मानकों को सामने रखकर देखें तो हमारे देश की आबादी में कामगार लोगों की संख्या 63 करोड़ होनी चाहिए लेकिन अभी देश में कामगार आबादी की तादाद 39 करोड़ ही है. जाहिर है, फिर आंकड़े में अन्तर 24 करोड़ लोगों का है जिसे वास्तव में बेरोजगारों की छिपी संख्या माना जा सकता है. लेकिन इस बड़ी तादाद को राजनीति के दायरे में क्यों लाना. अभी हम अपने मौजूदा आकलन यानि 6.1 करोड़ लोगों की तादाद को ही ठीक मानकर चलें जो बेरोजगार हैं और ये कहते भी हैं कि हां, हम बेरोजगार हैं. हम इन्हें सुभीते के लिए `औपचारिक रुप से बेरोजगार` का मानकर चलें.

बेरोजगारी की कहानी में कुछ और भी है..

इसके अतिरिक्त बेरोजगारों में चार और श्रेणियां हैं, उन्हें भी इस गिनती में शामिल करना चाहिए. इसमें कुछ `भावी बेरोजगार`हैं यानि वैसे नौजवान जो अभी कॉलेज या युनिवर्सिटी में समय काट रहे हैं. उच्च शिक्षा पर केंद्रित नवीनतम अखिल भारतीय सर्वेक्षण के तथ्यों से पता चलता है कि लगभग 2 करोड़ छात्र (कुल 3.7 करोड़ में से) उच्च शिक्षा के ऐसे पाठ्यक्रमों में पढ़ाई कर रहे हैं कि उनके लिए आगे के सालों में नौकरी मिल पाने की संभावना बड़ी क्षीण है. अगर आप इस भोली मान्यता को ही स्वीकार करके चलें कि जिसने बी.ई/बी.टेक/एमबीए/बी.एड या फिर एम.ए/ एम.एससी/ एम.कॉम के नियमित पाठ्यक्रम में दाखिला लिया है, उन सबको अन्ततः नौकरी मिल ही जायेगी तो भी आपके पास 2.1 करोड़ ऐसे छात्रों का आंकड़ा बचता है जो बीए/ बी.कॉम/ बी.एससी की डिग्री या कोई डिप्लोमा लेकर या फिर दूरस्थ शिक्षा (डिस्टेंस लर्निंग) के माध्यम से कोई ऊंची डिग्री लेकर अपनी पढ़ाई पूरी मान लेंगे. तो, यह तादाद अभी बेरोजगार तो नहीं लेकिन इन लोगों को पता है कि वे आगे को बेरोजगारों की ही श्रेणी में शामिल होने जा रहे हैं.

बेरोजगारों की तीसरी श्रेणी में ऐसे लोग शामिल हैं जिन्हें आभासी बेरोजगार कहा जा सकता है. वे अपने बारे में सोचते हैं कि हम अभी बेरोजगार नहीं हैं लेकिन दरअसल वे बेरोजगार होते हैं. अगर आप उनसे पूछें तो वे यही बतायेंगे कि हम तो नौकरी के लिए प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं लेकिन इनमें से मात्र 10 प्रतिशत को उस सरकारी नौकरी के मिलने की संभावना होती है जिसके लिए वे प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी कर रहे होते हैं. इस श्रेणी के लोगों की संख्या ठीक-ठीक बता पाना मुश्किल है लेकिन अनुमान लगाने के लिए जरा इन आंकड़ों पर गौर करें: उत्तरप्रदेश में चपरासी के 368 पदों के लिए 23 लाख अभ्यर्थियों ने आवेदन किये हैं; जब रेलवे ने ग्रुप डी के 90 लाख पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन निकाला तो 2.5 करोड़ लोगों ने आवेदन डाले. जाहिर है, बहुत संकोच से काम लें तो भी इस श्रेणी के बेरोजगारों की संख्या 2 करोड़ के आसपास तो होगी ही.

बेरोजगारों की चौथी श्रेणी में ऐसे लोगों को रखिए जो नौकरी में तो हैं लेकिन उसे कायदे की नौकरी नहीं कहा जा सकता यानि जिनकी तनख्वाह बहुत कम है और नौकरी भी असुरक्षित यानि अनुबंध आधारित है और जो ठीक इसी कारण एक पक्की और अच्छे वेतन की नौकरी की तलाश में लगे हैं. भारत की कामगार आबादी में ऐसे लोगों की तादाद बहुत ज्यादा है लेकिन यहां हम सिर्फ उन्हीं लोगों पर ध्यान टिकायें जो देश की अर्थव्यवस्था के नियोजित क्षेत्र में औने-पौने तनख्वाह पर अनुबंध आधारित नौकरी कर रहे हैं क्योंकि इन लोगों को लामबंद किया जा सकता है. औपचारिक नौकरी की सर्वाधिक समावेशी परिभाषा (नियमित वेतन, और नौकरी का स्थायी या अस्थायी होना) को स्वीकार करके चलें तो स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 नाम की रिपोर्ट के मुताबिक गैर-खेतिहर कामगारों में 40 प्रतिशत तादाद ऐसे लोगों की है जिनकी नौकरी को `अच्छी नौकरी` नहीं माना जा सकता. यह संख्या 3.5 करोड़ की बैठती है.

और, आखिरी श्रेणी अर्ध-बेरोजगारों की है. इसमें कामगारों की एक बड़ी तादाद शामिल है जो नौकरी के होने और ना होने के स्थिति के बीच डोलते रहती है. इस बड़ी तादाद के एक छोटे से तबके पर हम अपना ध्यान टिकायें यानि ऐसे लोगों पर जिनकी अभी-अभी छंटनी हुई है या फिर जो अर्थव्यवस्था के नियोजित क्षेत्र की नौकरी के छूटने पर अब अनियोजित क्षेत्र में नौकरी कर रहे हैं या फिर खेती-बाड़ी के काम में लग गये हैं. महेश व्यास का आकलन है कि ऐसे लोगों की तादाद 50 लाख के बराबर होगी. साल 2019-20 और अगस्त 2021 यानि कोविड काल के ऐन पहले से लेकर अभी के वक्त के बीच 1.1 करोड़ कामगारों (88 करोड़ वेतनभोगी तथा 20 लाख स्वरोजगार वाले) ने अपनी जीविका का मौजूदा स्रोत गंवाया है. इनमें लगभग आधे लोग बेरोजगार हो गये हैं जबकि 54 लाख तादाद ऐसे कामगारों की है जो अब औने-पौने दामों वाली नौकरी कर रहे हैं.

आप पांच श्रेणियों में विभक्त लोगों की तादाद को आपस में जोड़ दें जो कच्ची-पक्की कैसी भी नौकरी की तलाश में लगे हैं और आपको नजर आयेगा कि ऐसे लोगों की तादाद 14.2 करोड़ पर पहुंचती है. ये लोग बेरोजगार हैं और इन्हें राजनीतिक रुप से लामबंद करने की संभावना बनती है. अगर आप प्रति परिवार ऐसे लोगों की तादाद सिर्फ एक मानकर चलें तो भी कम से कम देश के कुल परिवारों के 50 प्रतिशत के बारे में कहा जा सकता है वहां बेरोजगारी का असर है. अगर यह मानकर चलें कि बहुत से परिवारों में एक से ज्यादा लोग बेरोजगार होंगे तो भी देश के एक तिहाई परिवारों के बारे में माना जा सकता है कि वहां लोग बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं. अगर इस तादाद को बड़ी तादाद नहीं माना जा सकता तो फिर मुझे नहीं पता कि किस तादाद को बड़ा माना जायेगा.

भारत में जब से बेरोजगारी की गिनती शुरु हुई है, नजर आया है कि बेरोजगारी बड़े पैमाने पर मौजूद है और इसका ज्यादातर रुप अर्ध-बेरोजगारी का रहा है. लेकिन इस मसले को नहीं उठाया जा सका क्योंकि राजनीतिक मोर्चे पर इसे अहमियत नहीं दी गई. अन्य देशों के विपरीत भारत में बेरोजगारी को लेकर ना कोई आंदोलन चला और ना ही कोई सामाजिक उद्वेलन ही देखने में आया. लेकिन अब देश में बेरोजगारों की इतनी बड़ी तादाद मौजूद है कि बेरोजगारी के मसले पर बड़ा जन-आंदोलन छेड़ा जा सकता है. बेरोजगारी के बदली हुई तस्वीर को देखें तो नजर आयेगा कि अब शहरों में पढ़े-लिखे और मुखर ऐसे बेरोजगार नौजवानों की इतनी संख्या हो चली है कि उसे ढंककर नहीं चला जा सकता. आज ऐसे समूह मौजूद हैं जो रोजगार के मसले पर देशव्यापी आंदोलन की अगुवाई कर सकते हैं. चुनौती एक सकारात्मक एजेंडे के साथ आगे आने और ऊपर बताये गये पांच श्रेणी के बेरोजगारों को एकजुट करके एक ऐसा अभियान चलाने की है जो चालू आर्थिक समझ की रुढ़ियों पर पुनर्विचार के लिए बाध्य कर सके.

(योगेंद्र यादव जय किसान आंदोलन के सह संस्थापक हैे और स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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