Thursday, 20 January, 2022
होममत-विमतजनरल रावत का ‘सभ्यता का टकराव’ विवाद दिखाता है, कि सेना को प्रेस में सुनाई नहीं सिर्फ दिखाई देना चाहिए

जनरल रावत का ‘सभ्यता का टकराव’ विवाद दिखाता है, कि सेना को प्रेस में सुनाई नहीं सिर्फ दिखाई देना चाहिए

COAS और CDS दोनों हैसियत से जनरल बिपिन रावत की मीडिया में मौजूदगी ने, अपने पीछे बेतुकी बातों और विचारों का एक ऐसा सिलसिला छोड़ा है, जिसने अनावश्यक विवादों को जन्म दिया है.

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15 सितंबर को चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत ने, दिल्ली में सामरिक समुदाय की एक सभा के सामने एक सवाल रखा. उन्होंने वाकपटुता के साथ उनसे पूछा कि क्या ईरान, टर्की, और अफगानिस्तान के साथ चीन का बढ़ता मेल-मिलाप, ‘सभ्यताओं के टकराव’ को फिर से शुरू करेगा, जिसमें चीनी और इस्लामी सभ्यताएं, पश्चिमी दुनिया के खिलाफ एक जुट हो जाएंगी? सीडीएस द्वारा उठाया गया सवाल एक बौद्धिक प्रवचन का हिस्सा था, और किसी भी मानदंड से एक नीति वक्तव्य नहीं था. लेकिन मीडिया ने उसे इसी तरह पेश किया, और चीन-भारत रिश्तों के एक संवेदनशील दौर में, एक विवाद के बीज बो दिए.

अगले दिन, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने दुशांबे में, शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गनाइज़ेशन में एक मीटिंग से इतर, अपने चीनी समकक्ष वांग यी के सामने इस संदेह पर सफाई देने की कोशिश की: ‘भारत ने कभी सभ्यताओं के टकराव के सिद्धांत का समर्थन नहीं किया’. लेकिन सीडीएस, जिनका विवादों से पुराना नाता है, फिर से आलोचनाओं के घेरे में आ गए. इस घटना ने सिविल-सैन्य-मीडिया के परस्पर रिश्तों पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनकी जांच की आवश्यकता है.


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CDS का बयान और भारत के विदेश संबंध

ऐसा लगता है कि विदेश मंत्री का स्पष्टीकरण, सरकार के सिविल-सैन्य अंगों के बीच मतभेद की ओर इशारा करता है. इस मतभेद की बुनियाद मीडिया ने रखी, जिसने सीडीएस के एक बौद्धिक सवाल को एक नीति वक्तव्य की तरह पेश किया. लगता है कि विदेश मंत्रालय (एमईए) ने उचित मूल्यांकन के बिना, आंखें बंद करके मीडिया के नैरेटिव को मान लिया. उससे भी ख़राब ये, कि उन्हें लगा होगा कि उनके पास उच्च-स्तरीय कूटनीतिक बातचीत से पहले, चीन के खिलाफ नंबर बनाने का एक अवसर है, ख़ासकर ऐसे समय जब रिश्तों में एक तनाव है, जिसे सामान्य करने की ज़रूरत है.

एमईए द्वारा सीडीएस की टिप्पणी के विकृत संदर्भ की काट करना, एक सोचा समझा क़दम था और उसे राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने की दिशा में, एक चतुर कूटनीति की तरह देखा जा सकता है. ये सवाल अभी भी बाक़ी है कि क्या सीडीएस को, जिनके सर पर कई भारी हैट्स हैं, ऐसे सार्वजनिक बयान देने चाहिएं, जो भारत के विदेश संबंधों के साथ टकराते हों?

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राष्ट्रीय नीति स्तर के बयान, कुछ असाधारण परिस्थितियों में, ऐसे किसी भी भारी हैट से आ सकते हैं, जो सीडीएस लगाते हैं. लेकिन हमारे लोकतंत्र में इसे हमेशा संस्थागत रूप से हासिल किया जाएगा. जनरल रावत का सवाल कोई नीति वक्तव्य नहीं था. वो एक व्यक्तिगत प्रवचन से निकला था, जो वैश्विक भू-राजनीति की रूपरेखा को टटोल रहा था. लेकिन एक ऐसे सिद्धांत को उधार लेना, जो एक अमेरिकी कल्पना की उपज है, और जिसमें सार्वजनिक रूप से इस्लामी और चीनी सभ्यता को, एक ही इकाई के तौर पर दिखाया गया है, एक ऐसी दुनिया में राजनीति से भरा हुआ है, जिसे ख़ुद सीडीएस ‘उथल-पुथल’ भरा बताते हैं. सीडीएस को ऐसे सार्वजनिक बयानों से बचना चाहिए, जो किसी भी तरह से भारत के विदेश संबंधों पर विपरीत असर डाल सकते हों. और इनसे बचने का एक ही तरीक़ा है, कि मीडिया और जन संपर्क के कार्यों से दूरी बनाकर रखी जाए.


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मीडिया में बयानात को सीमित करना

सीडीएस और तमाम सैन्य लीडरान को, मीडिया के ज़रिए अपने व्यक्तित्व को चमकाने से परहेज़ करना चाहिए. बेहतर है कि वो सिर्फ दिखें या महसूस हों, सुनाई न पड़ें; मीडिया में उनकी मौजूदगी कुछ विशेष या औपचारिक अवसरों तक ही सीमित रखी जानी चाहिए. COAS और CDS दोनों हैसियत से जनरल बिपिन रावत की मीडिया में मौजूदगी ने, अपने पीछे बेतुकी बातों और विचारों का एक ऐसा सिलसिला छोड़ा है, जिसने अनावश्यक विवादों को जन्म दिया है. ख़ासकर भारतीय सेना के लिए, मीडिया हमेशा एक दोधारी तलवार रहेगा. डिजिटल संसार बहुत ही बोझिल और बेरहम है, और इसमें वास्तविकता को आसानी से तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है. नीति के तौर पर मीडिया प्रवक्ताओं को, जो अब अधिकतर सैन्य संरचनाओं का हिस्सा हैं, बातचीत का मोर्चा संभालना चाहिए, और मीडिया के बिछाए जाल से बच निकलने की, भरसक कोशिश करनी चाहिए.

ऐसा लगता है कि कुछ सैन्य लीडर छवि चमकाने के बढ़ते रुझान से संक्रमित हो रहे हैं, जो ख़ासकर सियासत की दुनिया में, सिविल कार्य क्षेत्र के लिए ज़्यादा उपयुक्त है. अपनी उपलब्धियों का मुज़ाहिरा करने के लिए, सेना को ज़्यादा प्रयास करने की ज़रूरत नहीं है. उनकी उपलब्धियों को ख़ुद बोलना चाहिए. मीडिया से बातचीत का उद्देश्य श्रेय लेना नहीं होना चाहिए.

ये सच है कि जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों के साथ आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी गतिविधियों में, मीडिया से संपर्क की नीति ऐसी होनी चाहिए, कि भारतीय सशस्त्र बलों को बेरहम हत्यारे और आम जन के दुश्मन, तथा नई दिल्ली के चाटुकार के तौर पर पेश करने के, विरोधियों के प्रयासों का जवाब दिया जा सके. हाल ही में श्रीनगर स्थित 15 कोर के फर्ज़ी ट्विटर हैण्डल से, ट्वीट्स का इस्तेमाल इसी को दिखाता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्म दिवस पर, ट्विटर हैण्डल @chinarcorpsIA के नाम से, व्हाट्सएप पर एक स्क्रीनशॉट चल रहा था- अस्ली नेतृत्व का संबंध किसी उपाधि या पद से नहीं है, इसका मतलब है टक्कर, असर और प्रेरणा. #ChinarCorps की ओर से माननीय पीएम @narendramodi. को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं. हम आपके लंबे, स्वस्थ, और उत्साह तथा जोश से भरे, सुखी जीवन की कामना करते हैं #HappybdayModiji. दुर्भाग्यवश, चिनार कोर या एडीजीपीआई किसी ने ट्वीट का खंडन नहीं किया. लगता है कि ट्वीट को निर्बाध प्रचार मिल गया, जिसमें एक उत्कृष्ट और प्रोफेशनल 15 कोर कमांडर को, एक चाटुकार के रूप में दिखाने की कोशिश की गई थी. सेना के मीडिया संगठनों में सुधार की ज़रूरत है.

एक ईमानदार सैन्य नेतृत्व कभी व्यक्तिगत श्रेय नहीं लेता. उसकी बजाय, जब कोई मिशन पूरा होता है तो सामान्य सैनिकों को महसूस होता है, कि इसे उन्होंने ख़ुद अंजाम दिया है. लेकिन, पेशेवर तरक़्क़ी के अपने निजी उद्देश्यों को आगे बढ़ाने की ख़ातिर, कुछ महत्वाकांक्षी सैन्य लीडरों ने ऐसी बारीकियों को त्याग दिया है. ये एक ऐसा रुझान है जिसपर रोक लगाई जानी चाहिए, और ऐसा करने का सबसे अच्छा तरीक़ा है निजी उदाहरण पेश करना- इसकी शुरूआत सीडीएस से होनी चाहिए, जो भारत के शीर्ष सैन्य लीडर हैं.

ले. जन.(रिटा) डॉ प्रकाश मेनन तक्षशिला संस्थान में स्ट्रैटजिक स्टडीज़ प्रोग्राम के डायरेक्टर और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय के पूर्व सैन्य सलाहकार हैं. वो @prakashmenon51 पर ट्वीट करते हैं. व्यक्त विचार निजी हैं.


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