इस बार देवानूर महादेव की प्रसिद्धि की धमक दिल्ली की 'राष्ट्रीय' मीडिया तक पहुंची है, हिंदी के अखबारों तक भी. उनकी छोटी सी कुल 64 पन्नों की पुस्तिका के खूब चर्चा में है.
भारत में ईशनिंदा विरोधी अभियान मौलवी नहीं चला रहे. और उदयपुर और अमरावती में हत्या की घटनाओं के आरोपियों ने न तो कोई मजहबी शिक्षा हासिल की थी और न ही उनका दक्षिणपंथी संगठनों से कोई संबंध रहा है.
मोदी की भाजपा तो यही चाहेगी कि कांग्रेस ही मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में उभरे ताकि उसे सड़क पर उतरकर संघर्ष करने वाले, राजनीतिक रूप से अधिक चुस्त-चतुर क्षेत्रीय नेताओं का सामना न करना पड़े.
मुर्मू के गांव के तमाम लोग न तो रायसीना हिल के बारे में जानते हैं और न ही उन्हें यह पता है कि भारत में राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों की सीमा क्या है.
भारत की आत्मा की सौम्यता, ‘सत्यमेव जयते’ का धैर्य और साहस भी इस नये स्तम्भ में एकसार नहीं ही हो पाए हैं, जबकि किसी भी देश का राष्ट्रीय प्रतीक उसके मूल चरित्र का परिचायक होता है.
पश्चिम बंगाल चुनाव में वामपंथी दल और कांग्रेस खुरचन में हिस्सेदारी के लिए होड़ लगा रहे हैं. पूर्वी-मध्य भारत में माओवाद को कब्र में दफन कर दिया गया है, तो केरल में वे सरकार विरोधी दोहरी भावना से जूझ रहे हैं.