सुनील अरोड़ा, जो दिसंबर में मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में प्रभारी होंगे, होने वाले आम चुनाव की समाप्ति तक केवल 10 विधान सभा चुनाव की देख रेख कर चुके होंगे जो कि 2009 और 2014 में रहे उनके पूर्ववर्तियों के आधे अनुभव से भी कम है।
अधिकांश विश्वविद्यालयों ने केवल राजनेताओं के नाम पर चेयर्स स्थापित कर रखी हैं खासकर उस पार्टी की विचारधारा को ध्यान में रखकर जो कि केन्द्र की सत्ता में हैं।
केवाईसी का काम तीसरे पक्ष से करवाना भी एक मसला है, क्योंकि वे बिना सोचे-समझे ग्राहकों से दस्तावेज़ मांगने के संदेशों की बमबारी करने के लिए जाने जाते हैं.
नयी दिल्ली, दो अप्रैल (भाषा) दिल्ली में भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (एसीबी) ने फर्जी फार्मेसी पंजीकरण रैकेट का भंडाफोड़ कर दिल्ली फार्मेसी परिषद (डीपीसी) के...