यह फिल्म दिखाती है कि कैसे उल्फा के एक कमांडर मृदुल के परिवार वालों पर अत्याचार होता है जबकि उनका मृदुल से अब कोई नाता भी नहीं रहा. लेकिन यह अत्याचार इस परिवार को बदल कर रख देता है.
विद्रोही प्रगतिशील धारा के व्यक्ति थे जिन्होंने समाज से कई धार्मिक विश्वासों, जेंडर को लेकर होने वाली असमानताओं और आर्थिक गैर-बराबरी को लेकर मुखरता से अपनी आवाज़ उठाई और आवाम के बीच उसे अपनी कविताओं के जरिए ले जाने का प्रयास किया.
फिल्म की अगली बड़ी खूबी कलाकारों का अभिनय है. आयुष्मान खुराना को हम इस किस्म के किरदारों के लिए नहीं जानते हैं लेकिन उन्होंने इस किरदार को भी सौतेला नहीं लगने दिया है.
53वें भारत अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (इफ्फी) के जूरी प्रमुख और इज़राइली फिल्मकार नदाव लैपिड ने हिंदी फिल्म ‘ द कश्मीर फाइल्स’ को ‘दुष्प्रचार करने वाली‘ और ‘भद्दी’ फिल्म बताया.
अपने स्वार्थ के नाम पर जंगलों को काटने की बात उठाने के साथ-साथ यह फिल्म उत्तर-पूर्व के लोगों में ‘बाहर’ से आने वालों के प्रति उपजे अविश्वास की बात भी करती है. फिल्म यह भी दिखाती-बताती है कि किस तरह से शहरी लोग विकास का चमकीला सपना दिखाकर गांव-जंगल में बसे लोगों को ललचाते हैं और उन्हें भी भ्रष्ट होने को प्रेरित करते हैं.
उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदेश की उन महिलाओं, जिनके पति की मृत्युपरांत वे निराश्रित हो गई हैं, के लिए निराश्रित महिला पेंशन योजना (1000 रुपए मासिक) के माध्यम से सभी पात्र लाभार्थियों को वर्ष 2022-23 के प्रथम त्रैमास की पेंशन राशि सीधे उनके खाते में भेजने की व्यवस्था कर दी है.
पेश है दिप्रिंट का इस बारे में राउंड-अप कि कैसे उर्दू मीडिया ने पिछले सप्ताह के दौरान विभिन्न समाचार सम्बन्धी घटनाओं को कवर किया, और उनमें से कुछ ने इसके बारे में किस तरह की संपादकीय रुख अख्तियार किया.
एक पक्ष सोचता है कि आज भारत अपनी हैसियत से ज्यादा आगे बढ़कर कदम उठा रहा है, जबकि दूसरा पक्ष सोचता है कि मोदी ने भारत की हैसियत कमजोर कर दी है और भारत अपनी हैसियत से कम कदम उठा रहा है. सच यह है कि दोनों ही गलत हैं.