Wednesday, 26 January, 2022

अबंतिका घोष

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मत-विमत

अब इस गणतंत्र में सिर्फ ‘तंत्र’ बचा है, अगर ‘गण’ अब भी न जगा तो कुछ न बचेगा

गणतंत्र की प्राणवायु यानी विचार अब खर्च हो गए हैं. इक्कीसवीं सदी में गणतंत्र को बचाने के लिए बीसवीं सदी की विरासत का संयोजन और संशोधन करते हुए एक नई विचारधारा को गढ़ना होगा.

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