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Thursday, 11 July, 2024
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आज़ादी और आत्मनिर्भरता के संघर्ष में प्रेरणा की स्रोत रही गीता कैसे भारतीय डाक के साथ लोगों तक पहुंची

गीता के सन्देश के प्रचार प्रसार में डाक विभाग का भी बड़ा योगदान रहा है. 1978 में भगवद्गीता पर जारी पहले स्मारक डाक टिकट की 50 लाख प्रतियां छापी गयी थीं.  

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आज़ादी के अमृत महोत्सव के ज़रिये हम अपनी स्वतंत्रता के संघर्ष और उसके मूल्यों से एक बार फिर से जुड़ रहे हैं. भगवद्गीता इस संघर्ष का एक अभिन्न अंग रही है. गीता के निष्काम कर्म के सन्देश ने भारत के हर भाग में स्वातंत्र्य वीरों को प्रेरित किया. लेकिन हरियाणा की मिट्टी से गीता का विशेष सम्बन्ध रहा है.

2016 में हरियाणा सरकार ने गीता जयन्ती के अवसर पर अन्तर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव की शुरुआत की. यह महोत्सव हर वर्ष नवम्बर-दिसम्बर के महीने में आयोजित किया जाता है. इस महोत्सव में विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से गीता को जनमानस तक पहुंचाया जाता है.

एक जमाने में गीता के सन्देश के प्रचार प्रसार में डाक विभाग का भी बड़ा योगदान रहा है. 1978 में भगवद्गीता पर जारी पहले स्मारक डाक टिकट की 50 लाख प्रतियां छापी गयी थीं.

यह कहानी गीता की अनूठी डाक यात्रा की है.

लोकमान्य तिलक

डाक जगत में गीता का उल्लेख सबसे पहले 1956 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के टिकट की विवरणिका (ब्रोशर) में मिलता है. इसमें उनकी प्रसिद्ध किताब ‘गीता रहस्य’ का ज़िक्र हुआ जिसे उन्होंने मांडले जेल (म्यांमार) में लिखा था. इस पुस्तक को ‘उनकी विद्वता और उत्कृष्टता की कसौटी’ माना जाता है. आज़ादी के संघर्ष में तिलक शायद पहले जन नेता थे जिन्होंने गीता की व्याख्या लिखी. आज़ादी के बाद भी उनकी ‘गीता रहस्य’ काफ़ी प्रसिद्ध रही. 1998 में ‘हिंदी साहित्य के नवजागरण के अग्रदूतों में से एक’ लेखक शिव पूजन सहाय के डाक टिकट की विवरणिका में उन्हें लोकमान्य तिलक की ‘गीता रहस्य’ से काफ़ी प्रभावित बताया गया.

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक (स्मारक डाक टिकट) – 1956

तिलक की ‘गीता रहस्य’और अन्य किताबें (पुणे से जयपुर भेजा गया पोस्टकार्ड) – 1968

स्त्रोत – अंकिता पाण्डेय

 

2018 में एक बार फिर से तिलक का गीता से जुड़ाव दामोदर हरि चापेकर पर जारी टिकट की विवरणिका में देखने को मिला. तिलक ने क्रांतिवीर चापेकर को गीता की एक प्रति भेंट की थी ‘जिसे उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दिन अर्थात 18 अप्रैल, 1898 को फांसी लगाये जाने तक अपने पास रखा’.

स्मारक टिकट

1970 के दशक तक रामायण पर चार स्मारक डाक टिकट जारी हो चुके थे – तुलसीदास (1952), कंबर (1966), महर्षि वाल्मीकि (1970) और रामचरितमानस (1975). 25अगस्त 1978 को प्रधानमन्त्री मोरारजी देसाई ने भगवद्गीता पर पहले स्मारक डाक टिकट का विमोचन भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली में किया. कार्यक्रम की अध्यक्षता भारतीय जनसंघ के सदस्य और संचार मंत्री बृजलाल वर्मा ने की थी.

उन्होंने अपने भाषण में गीता के महत्व पर बल देते हुए कहा कि ‘आज़ादी की लड़ाई जीत कर हम शायद गीता ज्ञान को अपना मार्गदर्शक सिद्धांत बनाने में चूक गए… गीता ज्ञान किसी सम्प्रदाय विशेष की धरोहर नहीं है. इस ज्ञान का सम्बन्ध केवल भारतीय धर्मों से नहीं है. यह तो मानवमात्र की धरोहर है.’ टिकट की विवरणिका में गीता के महात्म्य पर महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, अल्डस हक्सले और मदन मोहन मालवीय के विचार बताये गये हैं.

भगवद्गीता पर डाक टिकट विमोचन कार्यक्रम का निमंत्रण पत्र – 1978

भगवद्गीता (प्रथम दिवस आवरण) – 1978

स्त्रोत – अंकिता पाण्डेय

25 पैसे के हल्के चमकीले नारंगी और सुनहरे रंग के डाक टिकट पर श्रीमद् भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के एक बहुप्रसिद्ध श्लोक का पहला भाग ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ उद्धृत है. अक्सर हम इसे ही कर्म का सिद्धांत मान लेते हैं. लेकिन श्लोक के दूसरे भाग ‘मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोSस्त्वकर्मणि’ को साथ लेकर ही इसकी सही विवेचना की जा सकती है अर्थात् कर्म करें और फल का मोह न करें, किन्तु फल का मोह न होने का यह तात्पर्य नहीं है कि कर्म करने से मुंह मोड़ लें.

टिकट के विरूपण (कैंसलेशन) में श्रीकृष्ण की प्रतीक बांसुरी चित्रित है तथा प्रथम दिवस आवरण पर कांगड़ा शैली में युद्ध-भूमि में रथ पर सवार कृष्ण और अर्जुन का चित्र दर्शाया गया है, जो कि टिकट पर भी दिखाया गया है. रथ की पृष्ठभूमि में गीता के चौथे अध्याय का सातवां श्लोक उद्धृत है:

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥

इसके बाद हरियाणा राज्य की स्थापना की रजत जयंती (1992) पर जारी प्रथम दिवस आवरण और स्वर्ण जयंती (2016) पर जारी प्रथम दिवस आवरण एवं टिकट पर भी रथ पर सवार अर्जुन और कृष्ण का चिरपरिचित चित्र दिखा.

हरियाणा की पच्चीसवीं वर्षगांठ – 1992

हरियाणा की पचासवीं वर्षगांठ – 2016

स्त्रोत – अंकिता पाण्डेय

2017 में कुरुक्षेत्र में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव के कार्यक्रम के दौरान केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री मनोज सिन्हा ने महाभारत पर 18 डाक टिकट और तीन लघुचित्र पत्र (मिनिएचर शीट्स) जारी किये. ये आज़ादी के लगभग सत्तर वर्ष बाद जारी हुए महाभारत पर पहले डाक टिकट थे. इनमें गीता से सम्बंधित दो दृश्य हैं- पहले में राजस्थान की पिछवई शैली में ईश्वर के विराट स्वरुप की छवि अंकित है और दूसरे में आंध्र प्रदेश की कलमकारी शैली में रथ पर कृष्ण और अर्जुन को दिखाया गया है.

महाभारत  (विराट स्वरुप) – 2017

 महाभारत (कृष्ण और अर्जुन) – 2017

मिनिएचर शीट्स (स्त्रोत – अंकिता पाण्डेय)

 

1990 में गीता की प्रसिद्द मराठी टीका ज्ञानेश्वरी’ पर टिकट जारी हुआ. इस ग्रन्थ की रचना 13वीं शताब्दी में महाराष्ट्र के संत-कवि ज्ञानेश्वर ने ‘भावार्थ दीपिका’ नाम से की थी जो आगे चल कर ‘कवि के नाम पर ‘ज्ञानेश्वरी’ के नाम से प्रसिद्द हुई.’ इसी दशक में संत ज्ञानेश्वर (1997) पर भी टिकट जारी हुआ. स्वामी स्वरूपानन्दजी (2003) पर जारी टिकट की विवरणिका के अनुसार उनके अनुवाद ने ‘ज्ञानेश्वरी’ को ‘साधारण जनता के लिए ग्राह्य और सुलभ बना दिया’.

ज्ञानेश्वरी – 1990

संत ज्ञानेश्वर – 1997

स्त्रोत : भारतीय डाक

आज़ादी के संघर्ष में भारत के हर भाग में नेताओं, लेखकों और चिंतकों ने 20वीं शताब्दी के परिपेक्ष में गीता को जनसाधारण तक पहुँचाने के लिए उसका आधुनिक भारतीय भाषाओँ में अनुवाद किया और उसपर टीकाएँ लिखीं. इसका उल्लेख भारतीय डाक ने उन लोगों पर जारी टिकट की विवरणिकाओं में विशेष रूप से किया. तिलक के बाद थीअॅसॉफ़िकल सोसाइटी की संस्थापक एनी बेसेंट (1963), महर्षि अरविन्द (1964 और 1972) और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (1973) के गीता अनुवाद और टीका का प्रमुख स्थान है.

इनके अलावा संयुक्त महाराष्ट्र आन्दोलन के नेता सेनापति बापट (1077), तेलुगु नाटककार त्रिपुरानेनी रामास्वामी चौदरी (1987), कन्नड़ लेखक डॉ. डीवी गुंडप्पा (1988), भारतीय विद्या भवन के संस्थापक कनैयालाल मा. मुंशी (1988), ओड़िशा के मुख्यमंत्री रहे हरेकृष्ण मेहताब (1989), ‘असम के प्रसिद्द राष्ट्रवादी और समाज सुधारक’ कृष्णनाथ सरमा (2001) और 2008 में रामकृष्ण मिशन के अध्यक्ष रहे स्वामी रंगनाथानंद महाराज पर जारी टिकट की विवरणिकाओं से उनके गीता के अनुवाद और टीका का पता चलता है.

डाक टिकट जिनकी विवरणिका में गीता के अनुवाद और टीका का उल्लेख है (स्त्रोत : भारतीय डाक)

गीता प्रेस

भारतीय डाक में प्रेस पर अनेक टिकट जारी हुए हैं किन्तु आज़ादी पूर्व भारतीय ग्रंथों को चलन में बनाये रखने में अभूतपूर्व योगदान करने वाली श्री वेंकटेश्वर प्रेस (मुंबई), इण्डियन प्रेस (प्रयाग) और गीता प्रेस (गोरखपुर) पर अभी तक कोई टिकट जारी नहीं हुआ है. हालांकि 1992 में गीता प्रेस के संस्थापकों में से एक और इस प्रेस से छपने वाली ‘कल्याण’ पत्रिका के संपादक रहे हनुमान प्रसाद पोद्दार पर डाक टिकट जारी हुआ. विवरणिका के अनुसार ‘उन्होंने रामायण, गीता और उपनिषदों का संस्कृत मूलपाठ के साथ हिंदी अनुवाद भी प्रकाशित किया जिससे यह आम आदमी के लिए सुलभ हो सके’.

गीता प्रेस का लिफ़ाफ़ा – गोरखपुर से बीकानेर भेजा गया – जनवरी 1932– विरूपण में गीता प्रेस

कल्याण ‘गीता प्रेस’ द्वारा महाराजा पब्लिक लाईब्रेरी

1954 हनुमान प्रसाद पोद्दार – 1992

स्त्रोत – अंकिता पाण्डेय

गीता का प्रभाव

चाहे स्वतंत्रता सेनानी हो या लेखक या फिर समाज के प्रति अपने दायित्व को लेकर जागरूक व्यवसायी गीता के सन्देश ने सभी को प्रेरित किया. 1980 में केशव चन्द्र सेन के टिकट की विवरणिका में भगवद्गीता का उल्लेख हुआ. गौरतलब है कि तिलक से काफ़ी पहले गीता और अन्य भारतीय ग्रंथों को राष्ट्रीयचेतना का आधार बनाने की प्रक्रिया धर्म एवं समाज सुधारक केशव चन्द्र सेन ने आरम्भ की थी.

1970 में क्रांतिवीर यतीन्द्र नाथ मुखर्जी की पुण्यतिथि के अवसर पर जारी डाक टिकट की विवरणिका के अनुसार उनके ‘व्यक्तित्व में इतना आकर्षण था कि युवक गीता और अन्य धार्मिक ग्रंथों पर उनके व्याख्यान सुनने के लिए उन्हें घेरे रहते थे’. भारत के पहले प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरु की पत्नी श्रीमती कमला नेहरु (1974) भी भगवद्गीता से अत्यंत प्रभावित थीं. स्वामी स्वरूपानन्दजी (2003) की विवरणिका के अनुसार उन्होंने…’भगवद्गीता’ के आदर्शों को मूर्त रूप दिया और इन आदर्शों ने उनके व्यक्तित्व और विचारधारा को तराशा’.

प्रसिद्द उद्योगपति जीडी बिड़ला (1984), पद्मपत सिंहानिया (2005) और केके बिरला (2009) की विवरणिका में गीता को लेकर उनकी समझ और निष्ठा का ख़ास तौर से उल्लेख हुआ. जीडी बिड़ला को एक सच्चा कर्मयोगी बताया गया. उन्हें ‘कर्मयोग के सिद्धांत, जिसका प्रतिपादन भगवान कृष्ण ने गीता में किया था, के महान उपासक’ की संज्ञा दी गयी. 2015 में गोरखपुर पीठ के महंत अवैद्यनाथ के टिकट की विवरणिका में उन्हें ‘भगवद्गीता का मर्मज्ञ’ कहा गया.

पुणे की पैपल सेमिनरी के शताब्दी वर्ष (1993) पर जारी टिकट विवरणिका के अनुसार ‘इस संस्थान में वेद-उपनिषद, भगवद्-गीता, दर्शन, वेदान्त, वैष्णवधर्म, शैवधर्म, जैनधर्म, बौद्धधर्म, इस्लाम धर्म, आधुनिक हिन्दू धर्म और आधुनिक भारतीय चिंतन जैसे भारतीय विषयों से सम्बंधित अनेकों पाठ्यक्रम चलाए जाते हैं’.

त्यागमूर्ति गोस्वामी गणेशदत्त (1987) के टिकट की विवरणिका में उनके द्वारा स्थापित गीता भवन का ज़िक्र है. इसी प्रकार 2014 में स्वामी एकरसानंद सरस्वती के बारे में बताया गया कि उन्होंने ‘श्रीमद्भगवद्गीता के १16वें अध्याय में वर्णित दैवी सम्पति पर आधारित ‘सर्वभूतहिते रताः’ के सिद्धांतो पर 1914 में सर्व दैवी मंडल की स्थापना की.’ हालाँकि यह पंक्ति गीता के 16वें अध्याय के बजाय 12वें अध्याय के चौथे श्लोक का हिस्सा है. देखा जाये तो गीता के सिर्फ श्लोक ही नहीं बल्कि गीता शब्द स्वयं में प्रेरणा का स्त्रोत रहा है. इसका एक उदाहरण संत तुकडोजी महाराज (1995) की किताब ‘ग्राम गीता’ है.

क्रांतिकारी हेमू कालाणी (1983) के व्यक्तित्व पर गीता की गहरी छाप थी – ‘फांसी के तख्ते की ओर जाते-जाते उन्होंने अपनी व्यथित मां को सांत्वना देते हुए आत्मा की अनश्वरता के बारे में गीता की उन पंक्तियों का स्मरण कराया जिसकी शिक्षा स्वयं वे ही उन्हें बचपन में दिया करती थीं.’ इसी प्रकार नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की 125वीं जयंती पर जारी टिकट विवरणिका (2021) में ‘ब्रिटिश हुकूमत से जंग में भगवद्गीता को नेताजी के लिए प्रेरणा का स्त्रोत’ बताया गया.

इस तरह हम देख सकते हैं कि भारतीय डाक ने कैसे हमारी आज़ादी और आत्मनिर्भरता के संघर्ष में प्रेरणा की स्त्रोत रही गीता को लोगों तक पहुंचाया.

डाक टिकट जिनकी विवरणिका में गीता का उल्लेख है (स्त्रोत – भारतीय डाक)

 

[अंकिता पाण्डेय स्वतंत्र शोधकर्ता, अनुवादक एवं किताब आसक्ति से विरक्ति तक : ओड़िआ महाभारत की चुनिंदा कहानियां (वाणी प्रकाशन) की लेखिका हैं]


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