हर बार के बजट भाषण के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की साड़ी भी चर्चा का केंद्र बना रहता है. साल 2019 में अपना पहला बजट पेश करते हुए निर्मला सीतारमण ने डार्क पिंक रंग की साड़ी पहनी थी जिसपर गोल्डन बॉर्डर बना हुआ था.
सीतारमण अपना पांचवां बजट ऐसे समय में पेश करने वाली हैं, जब अर्थव्यवस्था के सामने वैश्विक आघातों से निपटने और घरेलू जरूरतों को पूरा करने की मुश्किल चुनौती है.
सबसे कम विकसित 117 जिलों में जीवन स्तर में सुधार के लिए 2018 में शुरू किए गए सर्वेक्षण में कहा गया है कि स्वास्थ्य, वित्तीय समावेशन के परिणाम कई गैर-आकांक्षी जिलों की तुलना में बेहतर हैं.
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अमृतकाल के पहले बजट के भाषण में निर्मला सीतारमण ने युवाओं, महिलाओं, और विद्यार्थियों का विशेष ध्यान रखा है. बजट 2023 के दौरान कई महत्वपूर्ण घोषणाओं में, छात्रों के लिए लाइब्रेरी, युवाओं के लिए कौशल विकास और महिलाओं के लिए बचत पत्र जैसी घोषणाएं की गईं.
इसमें कहा गया है, 'शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में श्रम बाजार पूर्व-कोविड स्तरों से आगे निकल गया है, बेरोजगारी दर 2018-19 में 5.8 प्रतिशत से गिरकर 2020-21 में 4.2 प्रतिशत हो गई है.'
प्री-प्राइमरी को छोड़कर सभी स्तरों पर स्कूलों में एनरोलमेंट में सुधार हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक, 2021-22 में देश के 40% स्कूलों में इंटरनेट और 89.3% स्कूलों में बिजली थी.
आंकड़ों से पता चलता है कि राज्यों ने पूंजी परिव्यय के लिए कुल 7 लाख करोड़ रुपये से थोड़ा अधिक का बजट रखा था, नवंबर 2022 तक केवल 2.58 लाख करोड़ रुपये खर्च किए गए थे. आंध्र प्रदेश बड़े राज्यों में सबसे निचले स्थान पर था.
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सदन में आर्थिक-सर्वेक्षण 2022-23 पेश किया, जिसके आंकड़ों के मुताबिक, विकास दर कम रहने का अनुमान जताया गया है. हालांकि, भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा.
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा, माइनिंग से लेकर सेना में अंग्रिम मोर्चों तक, हर सेक्टर में महिलाओं की भर्ती को खोल दिया गया है. सैनिक स्कूलों से लेकर मिलिट्री ट्रेनिंग स्कूलों तक में, अब हमारी बेटियां पढ़ रही हैं.
अधिकारियों का कहना है कि बजट आवंटन में वार्षिक 'मामूली वृद्धि' वेतन और भत्तों में चली जाती है. इसके बाद विकास और आधुनिकीकरण के लिए बहुत कम पैसा बचता है.
चीन को छोड़ कोई भी देश ट्रंप के साथ बराबरी की हैसियत से बात नहीं कर सकता. इसलिए, जो ‘मिडल पावर’ देश इन बहुपक्षीय संगठनों के मूल आधार थे वे आज बेसहारा महसूस कर रहे हैं.