नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी के वसंत कुंज में जंग लगे टिन के बैरिकेड्स के पीछे छह अधूरे रिहायशी टावर खड़े हैं. उनकी खाली बालकनियां सुनसान आंगनों और बंद पड़ी मशीनों की ओर देखती हैं. निर्माण शुरू हुए करीब 17 साल हो चुके हैं, लेकिन आज भी यह प्रोजेक्ट पूरा नहीं हो पाया है.
इसके बावजूद ऑनलाइन प्रॉपर्टी पोर्टल अब भी महार्षि दयानंद कोऑपरेटिव ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी को दक्षिण दिल्ली का एक प्रीमियम पता बताकर बेच रहे हैं. वहां “तुरंत रहने के लिए तैयार” घर, जॉगिंग ट्रैक, खेल सुविधाएं और 24 घंटे सुरक्षा जैसी सुविधाओं का विज्ञापन दिया जा रहा है, जबकि यहां कोई रहने ही नहीं आया.
आसपास रहने वाले लोगों के लिए यह अधूरा प्रोजेक्ट अब इलाके की एक स्थायी पहचान बन चुका है.
काम से घर लौट रहीं आयशा बीबी ने कहा, “जब इसका निर्माण शुरू हुआ था, तब मैं अपने माता-पिता के साथ रहती थी. अब मेरी शादी हो चुकी है, मेरे दो बच्चे हैं, लेकिन निर्माण आज भी पूरा नहीं हुआ है.”
181 परिवारों का घर बनने की बजाय 300 करोड़ रुपये का यह प्रोजेक्ट वसंत कुंज की सबसे लंबे समय से अधूरी पड़ी परियोजनाओं में से एक बन गया है. यह अधूरा कॉम्प्लेक्स रुकी हुई योजनाओं, फंसी हुई बचत और वर्षों की निराशा की कहानी बन चुका है.
अच्छे इलाके में घर पाने की उम्मीद रखने वाले कई लोगों ने अपनी ज़िंदगी के करीब दो दशक इस इंतज़ार में बिता दिए कि उनका निवेश कभी तो काम आएगा, लेकिन वह आज भी बंद गेटों के पीछे फंसा हुआ है.
कमेटी के अंदरूनी विवाद, सदस्यों द्वारा भुगतान न करना, बकाया राशि, अदालतों के मामले, नियामकीय बाधाएं और बार-बार आने वाले फंड संकट ने इस परियोजना को बार-बार रोक दिया. इसकी वजह से यह प्रोजेक्ट ऐसे इलाके में भी अधूरा रह गया, जहां बाकी विकास तेज़ी से आगे बढ़ गया.

यह परियोजना 2009 में शुरू हुई थी और इसे मूल रूप से 2015 तक पूरा किया जाना था. सोसाइटी के सदस्यों का अनुमान है कि निर्माण का करीब 90 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है. समस्या बाकी बचे 10 प्रतिशत काम को पूरा करने की है.
कई रुकावटों के बाद पिछले पांच वर्षों में कई सदस्यों ने इस परियोजना में पैसा लगाना बंद कर दिया. सोसाइटी के एक सदस्य ने कहा, “जिन लोगों को कमेटी में कोई पद या अधिकार नहीं मिला, उन्होंने पैसा देना बंद कर दिया.”
33 साल के आयशा के लिए इस रुके हुए निर्माण ने उनके एक छोटे से सपने को भी रोक दिया.
उन्होंने कहा, “मेरी योजना थी कि जब लोग यहां रहने आएंगे तो मैं सोसाइटी में रसोइए के तौर पर काम करूंगी, लेकिन वह दिन कभी नहीं आया.”

जमी हुई उम्मीदें
2025 का एक पुराना एमसीडी नोटिस, जिसमें अस्थायी रूप से सील हटाने की अनुमति दी गई थी, वसंत कुंज के सेक्टर बी-4 स्थित सोसाइटी के प्रवेश द्वार पर अब भी ढीला लटका हुआ है. बिना रंग की बाउंड्री वॉल के नीचे लाल ईंटें दिखाई देती हैं. कुछ निर्माण मशीनें अब भी प्रवेश द्वार के पास खड़ी हैं, जैसे मजदूर किसी भी समय वापस आ सकते हों.
लेकिन ज्यादातर दिनों में ऐसा नहीं होता.
पास में काम करने वाले हसन अली ने कहा, “हम कभी-कभी पुलिस या अधिकारियों को इमारत के अंदर आते-जाते देखते हैं. कुछ दिनों में मशीनों की आवाज़ आती है और मजदूर काम करते दिखाई देते हैं. फिर कई महीनों तक कुछ नहीं होता. हम सालों से यही देख रहे हैं.”
करीब तीन एकड़ में फैली महार्षि दयानंद हाउसिंग सोसाइटी की योजना एक आधुनिक रिहायशी कॉम्प्लेक्स के रूप में बनाई गई थी, जिसमें लगभग आधा दर्जन टावरों में 181 दो बेडरूम वाले फ्लैट होने थे.
यह सोसाइटी 1983 में पंजीकृत हुई थी. इसे एक सहकारी हाउसिंग सोसाइटी के रूप में बनाया गया था, जिसमें सदस्यों ने मिलकर ज़मीन लेने और दिल्ली में घर बनाने के लिए संसाधन जुटाए थे. 2009 में दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने वसंत विहार की ज़मीन के बदले वसंत कुंज में इस सोसाइटी को ज़मीन आवंटित की. इसके साथ ही उस परियोजना पर काम शुरू हुआ, जिसका सदस्य वर्षों से इंतज़ार कर रहे थे.
उस समय सब कुछ सही लग रहा था.
वसंत कुंज तेज़ी से दक्षिण दिल्ली के सबसे पसंदीदा रिहायशी इलाकों में से एक बन रहा था. फोर्टिस जैसे बड़े अस्पताल, दिल्ली पब्लिक स्कूल जैसे प्रतिष्ठित स्कूल और बड़े मॉल इस इलाके की तस्वीर बदल रहे थे. संपत्तियों की कीमतें लगातार बढ़ रही थीं.
हाउसिंग सोसाइटी का सपना सीधा था—दिल्ली के सबसे अच्छे इलाकों में से एक में अपना स्थायी घर हासिल करना.
लेकिन इसके बजाय सदस्य एक ऐसी परियोजना में फंस गए, जो अब इतनी बन चुकी है कि उसे छोड़ा नहीं जा सकता, लेकिन इतनी समस्याओं में घिरी है कि उसे पूरा भी नहीं किया जा सकता.

कॉम्प्लेक्स के पास की खाली ज़मीन धीरे-धीरे एक अनौपचारिक पार्किंग स्थल बन गई है, जहां लंबी कतारों में कैब खड़ी रहती हैं. पास में मजदूर आसपास के इलाकों से लाया गया कचरा छांटते हुए घंटों बिताते हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि शाम के समय अक्सर कुछ लोग इन छोड़े गए टावरों के आसपास बैठकर शराब पीते हैं.
पास की हरिजन बस्ती के एक निवासी ने कहा, “ड्राइवर यहां रुककर आराम करते हैं. लोग यहां बैठकर शराब पीते हैं क्योंकि उन्हें रोकने वाला कोई नहीं है. जब कोई जगह सालों तक खाली पड़ी रहती है, तो लोग उसका इस्तेमाल अपनी मर्जी से करने लगते हैं.”
अब इस अधूरे कॉम्प्लेक्स के आसपास वसंत कुंज लगातार आगे बढ़ता रहा है. डीएलएफ प्रोमेनेड और एम्बिएंस मॉल जैसे शॉपिंग सेंटर इलाके की पहचान बन गए. रिहायशी सोसाइटियां भर गईं और सड़कें बेहतर हो गईं. इसी प्रोजेक्ट के ठीक सामने 2022 में इम्पीरियल क्लब ऑफ इंडिया भी शुरू हो गया, जबकि उसका निर्माण हाउसिंग सोसाइटी के काम शुरू होने के कई साल बाद शुरू हुआ था.
बी-4 ब्लॉक के निवासी अमित जैन ने कहा, “हमने अपने आसपास नई सड़कें, नए रिहायशी कॉम्प्लेक्स और दूसरी सुविधाएं बनते देखी हैं. हमने वसंत कुंज को बढ़ते और विकसित होते देखा है, लेकिन यह हाउसिंग प्रोजेक्ट आज भी अधूरा पड़ा हुआ है.”
अधूरे कॉम्प्लेक्स के अंदर एक गार्ड अपना ज्यादातर समय उसी टिन की चादरों से बने अस्थायी शेड के नीचे बैठकर बिताता है, जो पूरे प्रोजेक्ट को चारों तरफ से घेरे हुए हैं. वह अपने फोन पर वीडियो देखता रहता है.
गार्ड ने गेट के अंदर से झांकते हुए कहा, “पहले कुछ सदस्य यहां आया करते थे. अब वे भी आना बंद कर चुके हैं.”

कमेटी की लड़ाई और गायब होता पैसा
बाहरी समस्याएं आने से पहले ही यह प्रोजेक्ट अंदरूनी विवादों से बिखरने लगा था.
प्रोजेक्ट से जुड़े कई सदस्यों के अनुसार, नेतृत्व पदों को लेकर शुरू हुए मतभेद धीरे-धीरे वित्तीय मामलों, फैसले लेने की प्रक्रिया और आगे के निवेश को लेकर बड़े विवादों में बदल गए. कुछ मामले तो उन सदस्यों से जुड़े कानूनी विवादों तक पहुंच गए, जिन्हें डिफॉल्टर घोषित किया गया है.
एक सदस्य ने कहा, “हर कोई अध्यक्ष बनना चाहता था या कमेटी में कोई पद पाना चाहता था.”
एक अन्य सदस्य, जो पहले कमेटी के अध्यक्ष और सचिव दोनों रह चुके हैं, ने भी यही वजह बताई.
उन्होंने कहा, “अगर दो लोग पैसा लगाते हैं, तो चार लोग पैसा लगाना बंद कर देते हैं क्योंकि हर कोई कमेटी में पद चाहता है और ऐसा संभव नहीं है.”

इसका वित्तीय असर बहुत गंभीर रहा.
करीब 70 सदस्यों ने पैसा देना बंद कर दिया, जिससे निर्माण कार्य धीमा पड़ गया. कुछ लोगों ने अपनी आर्थिक परेशानियों का हवाला दिया, जबकि कुछ ने सोसाइटी प्रबंधन से मतभेद के कारण भुगतान रोक दिया. इससे प्रोजेक्ट पर लोगों का भरोसा और कमजोर होता गया और यह सिलसिला साल-दर-साल चलता रहा.
कमेटी के संयुक्त सचिव कृष्ण गोयल ने कहा, “प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए अभी भी करीब 20 करोड़ रुपये की ज़रूरत है.”
सदस्यों के अनुसार, विवाद इतने बढ़ गए कि 2023 से कमेटी के चुनाव भी नहीं हो पाए. इससे निवेशकों की चिंता और बढ़ गई कि इस परियोजना का भविष्य क्या होगा.
एक सदस्य ने कहा, “हमें यह भी साफ नहीं है कि निर्माण कार्य सही तरीके से कब दोबारा शुरू होगा या यह प्रोजेक्ट आखिर कब पूरा होगा.”
एक अन्य निवेशक ने और भी सीधे शब्दों में अपनी बात कही.
उन्होंने कहा, “मैं इस प्रोजेक्ट में करोड़ों रुपये लगा चुका हूं. आज मुझे यह भी नहीं पता कि यह कब खत्म होगा. नई इमारत का हाल यह है कि उद्घाटन होने से पहले ही वह पुरानी होती जा रही है.”

अदालतों और निर्माण के बीच फंसा प्रोजेक्ट
वित्तीय समस्याएं जल्द ही अदालत तक पहुंच गईं.
सबसे बड़े विवादों में से एक तब सामने आया, जब प्रोजेक्ट से जुड़ी आर्किटेक्चर, इंजीनियरिंग और प्लानिंग कंपनी खुरमी एसोसिएट्स ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया. कंपनी का दावा था कि सोसाइटी ने लगभग 6.9 करोड़ रुपये का भुगतान नहीं किया है.
कंपनी के अनुसार, वर्षों तक प्रोजेक्ट की डिजाइनिंग और निर्माण कार्य में शामिल रहने के बावजूद, सोसाइटी ने बकाया भुगतान किए बिना उसे हटाकर दूसरी कंपनी को नियुक्त करने की कोशिश की.
खुरमी एसोसिएट्स के निदेशक हरप्रीत सिंह खुरमी ने कहा, “सोसाइटी के कुछ सदस्यों ने हमें नियुक्त किया था, फिर कमेटी के कुछ अन्य लोगों ने दूसरी कंपनी को रख लिया. सोसाइटी के अंदर काफी गड़बड़ी है, लेकिन हमें अपना पैसा चाहिए था, इसलिए आखिरकार हमें अदालत जाना पड़ा.”
फिर एमसीडी की बाधा भी सामने आ गई.
सालों तक कमेटी के सदस्य एमसीडी से समय बढ़ाने की मांग करते रहे, क्योंकि निर्माण कार्य मंजूरशुदा भवन योजना में तय समय से काफी आगे निकल गया था. इसके बावजूद प्रोजेक्ट समय पर पूरा नहीं हो सका.
2018 में शुरू हुआ अवैध निर्माण का मामला एक और बड़ी रुकावट बन गया. आखिरकार 2023 में संपत्ति के कुछ हिस्सों को सील कर दिया गया, जिससे लगभग पूरा हो चुका यह हाउसिंग कॉम्प्लेक्स बैरिकेड्स के पीछे बंद हो गया.

दिसंबर 2025 में एमसीडी ने रखरखाव और सुरक्षा से जुड़े कामों के लिए 15 दिनों के लिए परिसर की सील अस्थायी रूप से हटाई थी. इसके बाद सोसाइटी ने प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए नई मंजूरियां और समय बढ़ाने की मांग की, लेकिन कई जरूरी स्वीकृतियां अब भी लंबित हैं.
नाम न बताने की शर्त पर एमसीडी के एक अधिकारी ने कहा, “अभी भी अग्नि सुरक्षा से जुड़े काम, लिफ्ट लगाने का काम और संबंधित निरीक्षण बाकी हैं. सोसाइटी को अभी तक ज़रूरी एनओसी नहीं मिली हैं. जब वे औपचारिक रूप से मंजूरी के लिए आवेदन करेंगे और बाकी काम पूरा करेंगे, तब हमारी टीम साइट का निरीक्षण करेगी और उसके बाद ही आगे की मंजूरी पर विचार किया जाएगा.”
हाउसिंग प्रोजेक्ट का निर्माण शुरू होने से पहले ही यह दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) के साथ कानूनी विवाद में फंस गया था.
1990 में डीडीए और दिल्ली प्रशासन ने महरौली के कुसुमपुर इलाके की इसी ज़मीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की थी. उनका कहना था कि वसंत कुंज रिहायशी योजना के तहत दिल्ली के नियोजित विकास के लिए यह ज़मीन ज़रूरी है. उसी समय सोसाइटी की भवन योजना मंजूर करने की मांग भी खारिज कर दी गई थी. इससे विवाद खड़ा हो गया कि जमीन पर सोसाइटी निर्माण कर सकती है या इसे सार्वजनिक आवास योजना के लिए लिया जाएगा.
मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा, जिसने आखिरकार 1990 की भूमि अधिग्रहण अधिसूचना को रद्द कर दिया. इस फैसले के बाद सोसाइटी ज़मीन अपने पास रखने में सफल रही. बाद में यही ज़मीन वसंत कुंज क्षेत्र का हिस्सा बनी, जहां इस हाउसिंग प्रोजेक्ट की योजना बनाई गई.
सोसाइटी के एक प्रतिनिधि ने कहा, “किसी भी बड़े प्रोजेक्ट में कानूनी मामले होना सामान्य बात है, लेकिन किसी परियोजना को वर्षों तक अटका कर रखने की वजह सिर्फ अदालतें नहीं होतीं, बल्कि सदस्य और पैसा भी उतनी ही बड़ी वजह होते हैं.”

लंबा इंतज़ार
स्क्वायर यार्ड्स, 99एकर्स और मैजिकब्रिक्स जैसे रियल एस्टेट प्लेटफॉर्म पर आज भी ऐसे विज्ञापन दिखाई देते हैं, जिनमें यह हाउसिंग सोसाइटी कागजों पर पूरी तरह तैयार और जीवंत नजर आती है.
इन विज्ञापनों में लिखा है, “बेहतरीन तरीके से डिजाइन किया गया प्रोजेक्ट, तुरंत रहने के लिए तैयार”, “फिटनेस पसंद करने वालों के लिए जॉगिंग और साइक्लिंग ट्रैक”, “24×7 सुरक्षा, सीसीटीवी और इंटरकॉम सुविधा”, “इनडोर गेम्स और वॉलीबॉल कोर्ट”, “रेलवे स्टेशन और आईजीआई एयरपोर्ट से शानदार कनेक्टिविटी”.
लेकिन हकीकत में यह कॉम्प्लेक्स अब भी इंतज़ार कर रहा है—पैसे का, ज़रूरी मंजूरियों का, अदालतों में चल रहे मामलों के खत्म होने का और उन लोगों का, जिन्हें वर्षों पहले यहां आकर बस जाना था.
अमित जैन ने कहा, “पहले हम सोचते थे कि यहां क्या बन रहा है और इसे पूरा होने में इतना समय क्यों लग रहा है. लेकिन इतने साल बीत जाने के बाद अब हमारी जिज्ञासा और सवाल दोनों ही खत्म हो गए हैं.”
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