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Wednesday, 3 June, 2026
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रसोइया, नैनी और ड्राइवर के बाद अब लाइफस्टाइल मैनेजर बने अमीरों की नई पसंद

पेशेवर लाइफस्टाइल मैनेजर अमीर भारतीयों के लिए लॉजिस्टिक्स संभाल रहे हैं, घर के स्टाफ का प्रबंधन कर रहे हैं और कई बार उनकी ओर से फैसले भी ले रहे हैं. ‘यह अब एक संगठित उद्योग बन गया है.’

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नई दिल्ली: कभी शीतल किराने का सामान व्यवस्थित करती हैं और रसोई में रखे जारों पर लेबल लगाती हैं. दूसरे दिनों में वह यूट्यूब पर कारों के मॉडल्स के बारे में जानकारी जुटाती हैं, फिर डीलरों से मोलभाव करके खरीदारी तय कराती हैं. इसके बीच में वह किचन के रेनोवेशन की देखरेख कर सकती हैं, लाखों रुपये की शराब के कलेक्शन की सूची बना सकती हैं या लग्जरी वैकेशन की प्लानिंग कर सकती हैं.

लेकिन वह यह सब अपने लिए नहीं कर रही हैं.

गुरुग्राम स्थित पिंच में काम करने वाली लगभग 25 साल की लाइफस्टाइल मैनेजर शीतल ने कहा, “जिस तरह किसी लग्जरी होटल में मेहमानों को पर्दे के पीछे की मेहनत दिखाई नहीं देती, वे सिर्फ आराम और सुविधा का आनंद लेते हैं. अब कई लोग अपने घर में भी ऐसा ही अनुभव चाहते हैं. हाउस मैनेजर के तौर पर हम यह सुनिश्चित करते हैं कि हर चीज़ बिना किसी परेशानी के आसानी से चलती रहे.” पिंच अमीर ग्राहकों को घर और लाइफस्टाइल से जुड़ी निजी सेवाएं उपलब्ध कराती है.

भारत के बड़े शहरों में एक नई भूमिका तेज़ी से उभर रही है—लाइफस्टाइल मैनेजर. यह भूमिका बदल रही है कि भारत के अमीर लोग अपनी ज़िंदगी कैसे चलाते हैं. आज अमीर परिवार रोजमर्रा के झंझटों की जिम्मेदारी प्रशिक्षित पेशेवरों को सौंप रहे हैं, ताकि घर के लोगों को यह सोचने की जरूरत ही न पड़े कि कोई काम कैसे होगा—चाहे वह पार्टी की तैयारी हो, इंटीरियर डिजाइनर चुनना हो या घरेलू स्टाफ को ट्रेनिंग देना हो.

शीतल जैसे लाइफस्टाइल मैनेजर आमतौर पर अच्छी शिक्षा प्राप्त होते हैं और अमीर परिवारों के माहौल में आसानी से घुल-मिल जाते हैं | फोटो: इंस्टाग्राम/@pinch.co.in
शीतल जैसे लाइफस्टाइल मैनेजर आमतौर पर अच्छी शिक्षा प्राप्त होते हैं और अमीर परिवारों के माहौल में आसानी से घुल-मिल जाते हैं | फोटो: इंस्टाग्राम/@pinch.co.in

 

इस बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए कई प्रीमियम लाइफस्टाइल मैनेजमेंट और कंसीयर्ज कंपनियां सामने आई हैं. इनमें गुरुग्राम की पिंच और एलीटबटलर्स, बेंगलुरु की क्लब कंसीयर्ज और गोवा की इंडल्ज कंसीयर्ज जैसी कंपनियां शामिल हैं. इनके जरिए ग्राहक अपना समय और मानसिक सुकून खरीदते हैं, जिसकी कीमत अलग-अलग पैकेजों के हिसाब से तय होती है. पिंच में पैकेज 15,000 रुपये प्रति माह से शुरू होकर 1.5 लाख रुपये तक जाते हैं.

भारत जैसे देश में, जहां घरेलू कामकाज लंबे समय से अनौपचारिक व्यवस्था पर आधारित रहा है, दूसरों पर निर्भर रहना कोई नई बात नहीं है. लेकिन जो लोग इसका खर्च उठा सकते हैं, उनके लिए अब यह व्यवस्था ज्यादा पेशेवर और व्यवस्थित होती जा रही है.

ज्यादातर लाइफस्टाइल मैनेजर कॉर्पोरेट कंसल्टेंट्स की तरह दिखते हैं—साफ-सुथरी शर्ट, हल्के रंगों के कपड़े, स्मार्टवॉच और हमेशा व्यवस्थित व्यक्तित्व. उनके पास अक्सर आईपैड या लैपटॉप होता है. वे पढ़े-लिखे, शहरी और अंग्रेजी बोलने वाले होते हैं तथा आमतौर पर उनकी उम्र 20 से 30 साल के बीच होती है. हालांकि, कुछ लोग इससे अधिक उम्र के भी हैं.

लगभग सभी के पास सर्विस सेक्टर का अच्छा अनुभव होता है. इनमें से कई के पास होटल मैनेजमेंट की डिग्री होती है या वे एयरलाइन केबिन क्रू के रूप में काम कर चुके होते हैं. शुरुआत में सालाना सैलरी लगभग 4 से 6 लाख रुपये से शुरू होती है, लेकिन अनुभव और अच्छे ग्राहकों के साथ यह कई लाख रुपये तक पहुंच सकता है, खासकर उन कंपनियों में जो बेहद अमीर परिवारों को सेवाएं देती हैं.

जब आप काम खत्म करके घर लौटते हैं, तो शाम को प्लंबर से बात करने या दुकानदारों से बहस करने में समय नहीं बिताना चाहते. आप बस चाहते हैं कि कोई और यह सब संभाल ले

—लाइफस्टाइल मैनेजमेंट सेवा का एक ग्राहक

भारत के तेज़ी से आगे बढ़ रहे उच्च-मध्यवर्ग के लिए लाइफस्टाइल मैनेजर एक खास जीवनशैली की पहचान भी बन रहे हैं. यह ऐसी जीवनशैली है जो दुनिया भर की लग्जरी से प्रभावित है, लेकिन स्थानीय सामाजिक सोच का असर भी उसमें दिखाई देता है.

वे परिवार और रसोइयों, ड्राइवरों, सफाईकर्मियों तथा अन्य सेवा देने वाले लोगों के बीच एक अतिरिक्त कड़ी की तरह काम करते हैं. असल में वे जो सेवा बेच रहे हैं, वह है हर ज़रूरत का पहले से अंदाज़ा लगाना, अमीर परिवारों के माहौल में आसानी से काम करना और हर चीज़ को बिना परेशानी के संभालना.

पारंपरिक हाउसकीपर की तरह जो घर का हिस्सा बनकर काम करते हैं, ये लाइफस्टाइल मैनेजर एक तरह के पर्सनल मैनेजेर की भूमिका निभाते हैं. ज़रूरत पड़ने पर वे घर में मौजूद रहते हैं, बाकी समय दूर से काम करते हैं, लेकिन हमेशा इस बात की जिम्मेदारी लेते हैं कि उनके ग्राहक की ज़िंदगी बिना रुकावट और आसानी से चलती रहे.

लग्जरी स्टाफिंग और हॉस्पिटैलिटी एजेंसी एलीटबटलर्स के रणनीति और संचालन निदेशक विपुल चौहान ने कहा, “हमारे ग्राहक आमतौर पर अमीर लोग, बेहद अमीर लोग, सेलिब्रिटी, खिलाड़ी और बड़े कारोबारी होते हैं. उनके दिन का रूटीन बिगाड़ने वाली किसी भी चीज़ को वे आउटसोर्स करके लाइफस्टाइल मैनेजमेंट टीम को सौंप देना चाहते हैं.”

परिवारों के लिए एक इंसानी एक्सेल शीट

24 साल के लाइफस्टाइल मैनेजर उत्तरण सेन अक्सर बिना कुछ बताए ही समझ जाते हैं कि किसी परिवार में क्या चल रहा है. कई बार इसका अंदाज़ा उन्हें किराने की सूची से हो जाता है—दूध के कम पैकेट, सब्जियों की कम मात्रा. इसी तरह उन्हें पता चला कि तीन लोगों का एक परिवार अब दो लोगों का रह गया है.

सेन ने बताया, “कुछ दिनों बाद क्लाइंट का फोन आया और उन्होंने पूरी बात विस्तार से बताई. वह अपनी स्थिति को आसानी से शब्दों में नहीं बता पा रही थीं, लेकिन फिर भी उन्होंने पूरा संदर्भ साझा किया ताकि मैं समझ सकूं कि उनकी ज़िंदगी में क्या बदलाव आ रहे हैं और उसी हिसाब से सब कुछ व्यवस्थित कर सकूं—किराने के सामान से लेकर घर की ज़रूरतों और रोजमर्रा की योजना तक.”

सेन करीब दो साल से पिंच के साथ काम कर रहे हैं.

24 साल के उत्तरण सेन का कहना है कि किराने के सामान की लिस्ट से भी पता चल सकता है कि घर के अंदर क्या बदलाव हुए हैं | फोटो: साक्षी मेहरा/दिप्रिंट
24 साल के उत्तरण सेन का कहना है कि किराने के सामान की लिस्ट से भी पता चल सकता है कि घर के अंदर क्या बदलाव हुए हैं | फोटो: साक्षी मेहरा/दिप्रिंट

उन जैसे लाइफस्टाइल मैनेजर परिवारों की ज़िंदगी में होने वाले छोटे-बड़े बदलावों को करीब से समझते हैं—चाहे अलगाव हो या किसी सदस्य का घर छोड़कर जाना क्योंकि वे उन्हीं छोटी-छोटी चीज़ों को मैनेज करते हैं.

वे शादी के प्लानर जैसे होते हैं, लेकिन सिर्फ एक प्रोग्राम के लिए नहीं, बल्कि पूरे साल और हर दिन के लिए. सेन लगातार फोन कॉल पर रहते हैं, मैसेज का जवाब देते हैं और चेकलिस्ट देखते रहते हैं. वह रोज़ छह से सात परिवारों को संभालते हैं और उनके फैसलों, चिंताओं, दिनचर्या और कामों को व्यवस्थित रखते हैं. एक तरह से वह परिवारों के लिए इंसानी एक्सेल शीट की तरह हैं.

सेन ने कहा, “घर का कोई भी काम जो उनका समय लेता है, चाहे सिर्फ दो मिनट ही क्यों न लगे—अगर मैं उसे संभाल रहा हूं, तो वही हमारा काम है.”

उनका काम दरवाजे की कुंडी ठीक करवाने और किराने की डिलीवरी करवाने से लेकर स्कूलों की जानकारी जुटाने, एयर प्यूरीफायर चुनने और यात्रा की योजना बनाने तक फैला हुआ है. जब क्लाइंट बहुत सारे विकल्प देखकर उलझ जाते हैं, तो सेन बताते हैं कि वह उनके लिए फैसला भी कर देते हैं.

उन्होंने कहा, “यह प्रक्रिया किसी कंसल्टेंसी की तरह होती है. हम 10 से 15 ऑप्शन्स पर रिसर्च करते हैं, फिर उन्हें कम करके कुछ चुनिंदा विकल्प रखते हैं और क्लाइंट के सामने पेश करते हैं, लेकिन काम यहीं खत्म नहीं होता. हम तब तक जुड़े रहते हैं जब तक फैसला लागू न हो जाए, चीज़ें लग न जाएं और पूरी तरह काम शुरू न कर दें.”

परिवारों के लिए अपनी निजी ज़िंदगी की जिम्मेदारी किसी और को सौंपना अक्सर थकान से पैदा हुआ एक व्यावहारिक फैसला होता है.

करीब 30 साल की उम्र के एक कॉर्पोरेट प्रोफेशनल, जो लाइफस्टाइल मैनेजमेंट सर्विस का यूज़ करते हैं, उन्होंने कहा, “ऐसा नहीं है कि हम ये काम नहीं कर सकते, लेकिन पूरे दिन काम करने के बाद आप अपनी शाम प्लंबरों से बात करने या दुकानदारों से बहस करने में नहीं बिताना चाहते. आप बस चाहते हैं कि कोई यह सब संभाल ले.”

लेकिन सिर्फ कामकाज संभालना ही इस नौकरी का एक हिस्सा है क्योंकि लाइफस्टाइल मैनेजर घरों के भीतर काम करते हैं और हर घर की अपनी भावनाएं और परिस्थितियां होती हैं.

सेन ने कहा, “हर घर अपने आप में अलग होता है और हर घर का काम करने का अपना तरीका और अपनी लय होती है.”

उत्तरण सेन एक कलाकृति दिखाते हुए, जिसे उन्होंने हाल ही में एक क्लाइंट के लिए खरीदा था | फोटो: साक्षी मेहरा/दिप्रिंट
उत्तरण सेन एक कलाकृति दिखाते हुए, जिसे उन्होंने हाल ही में एक क्लाइंट के लिए खरीदा था | फोटो: साक्षी मेहरा/दिप्रिंट

वह घरों को एक ऐसी व्यवस्था की तरह देखने लगे हैं, जिसके अपने पैटर्न, आपसी जुड़ाव और कमज़ोरियां होती हैं. प्रक्रियाएं और चेकलिस्ट उन्हें व्यवस्थित रहने में मदद करती हैं, लेकिन वे लोगों के व्यवहार और भावनाओं को पूरी तरह नहीं समझा सकतीं.

कुछ घर शांत और दूरी बनाए रखने वाले होते हैं, जबकि कुछ बहुत व्यस्त और ज्यादा मांग करने वाले. कुछ क्लाइंट संबंधों को सिर्फ काम तक सीमित रखते हैं, जबकि कुछ लोग उससे कहीं ज्यादा उम्मीद करते हैं.

सेन को एक घटना याद है जब देर रात, उनके काम के समय के काफी बाद, एक क्लाइंट का फोन आया. क्लाइंट की बेटी घर लौटते समय फोन नहीं उठा रही थी. सेन ने ड्राइवर का पता लगाना शुरू किया, जानकारी जुटाई और तब तक फोन पर बने रहे जब तक वह सुरक्षित घर नहीं पहुंच गई.

उन्होंने कहा, “क्लाइंट को भावनात्मक सहारे की ज़रूरत थी और उन्हें वह मिला. उनके लिए कोई मौजूद था, कोई ऐसा जिस पर वे भरोसा कर सकती थीं, कोई जो उनके लिए चीजों का ध्यान रख सके.”

और फिर वे कर्मचारी भी हैं जो वास्तव में घर चलाते हैं. उनके बुरे दिन भी सेन की जिम्मेदारी बन जाते हैं. घर की देखभाल करने वाला कर्मचारी किसी परेशानी के कारण बर्तन नहीं धोता. रसोइया नौकरी छोड़ने की धमकी देता है. ड्राइवर काम पर नहीं आता. किसी न किसी को स्थिति संभालनी होती है, और वह व्यक्ति सेन होते हैं.

पारंपरिक रूप से घर के इस तरह के प्रबंधन की जिम्मेदारी घर की महिला की होती थी और पारिवारिक कारोबार वाले घरों में आज भी अक्सर ऐसा ही होता है, लेकिन गुरुग्राम जैसे शहरों के दोहरी आय वाले कॉर्पोरेट परिवारों में अब ज्यादा लोग उस काम के लिए पैसे देना पसंद कर रहे हैं, जिसे पहले बिना किसी भुगतान के किए जाने की उम्मीद की जाती थी.

हालांकि, यह सिर्फ अमीर परिवारों द्वारा सुविधा खरीदने की कहानी नहीं है. अविनाश कुमार के अनुसार, यह सुरक्षित और स्थायी रोजगार की कमी की कहानी भी है.

उन्होंने कहा, “घरेलू काम के ‘पेशेवर बनने’ के पीछे एक गहरा आर्थिक संकट है. जब मध्यम वर्ग की महिलाएं घर से बाहर काम करने लगीं, तब भी देखभाल और घरेलू काम ज्यादातर दूसरी महिलाओं द्वारा ही किए जाते रहे. इसे सोशल रिप्रोडक्शन कहा जाता है.”

उन्होंने आगे कहा, “अब हम कुछ अलग देख रहे हैं. बेरोजगारी, पर्याप्त नौकरियों के बिना आर्थिक वृद्धि और कई क्षेत्रों में नौकरी जाने के कारण अब बहुत से पुरुष भी ऐप और प्लेटफॉर्म के जरिए घरेलू और सफाई के कामों में आ रहे हैं.”

कुमार ने यह भी कहा कि ये कॉर्पोरेट प्लेटफॉर्म कर्मचारियों को ‘उद्यमी’ या ‘पेशेवर’ के रूप में पेश करते हैं, लेकिन वास्तव में उनका काम अक्सर असुरक्षित होता है.

उन्होंने कहा, “मैं इसे अस्थिरता की ओर धकेलना कहूंगा. कर्मचारियों को ज्यादा असुरक्षित परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है. अगर हम सिर्फ ऊपर से दिखने वाली चीजों—जैसे यूनिफॉर्म, ऐप, रेटिंग या औपचारिक प्रक्रियाओं—को देखें, तो यह ज्यादा पेशेवर लग सकता है. लेकिन इससे पूरी सच्चाई सामने नहीं आती.”

‘मदद’ को पेशेवर रूप देना

कई मायनों में यह पेशा एक दिलचस्प बात पर आधारित है: यह जितना अच्छा काम करता है, उतना ही कम दिखाई देता है. बाहर से जो सब कुछ आसान और बिना मेहनत का लगता है, उसके पीछे एक अच्छी तरह से बना सिस्टम होता है, जो चुपचाप पर्दे के पीछे काम करता रहता है.

इस इमेज को बनाए रखने के लिए एजेंसियां इन पेशेवरों को पारंपरिक हाउसकीपर से अलग रखती हैं. टीम के सदस्यों को घरेलू कर्मचारी नहीं, बल्कि सलाहकार (कंसल्टेंट) के रूप में पेश किया जाता है.

एलीटबटलर्स के चौहान ने कहा, “लाइफस्टाइल मैनेजमेंट में घरेलू कर्मचारियों का प्रबंधन, खाने की योजना बनाना, रसोई का सामान व्यवस्थित रखना, कार्यक्रम आयोजित करना, यात्रा की योजना बनाना, उपहार चुनना और यहां तक कि घर के रेनोवेशन में मदद करना भी शामिल हो सकता है. आज ज्यादातर कंसीयर्ज सेवाएं पूरी तरह ऑनलाइन हैं, लेकिन हमें अलग बनाता है कि हम हाइब्रिड हैं; हम ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह से काम करते हैं. दूसरी ओर, हाउस मैनेजर या एस्टेट मैनेजर पूरी तरह ऑफलाइन काम करते हैं और उनका काम अलग होता है; वे उपहार चुनने जैसे कामों में शामिल नहीं भी हो सकते हैं.”

एलीटबटलर्स बटलर ट्रेनिंग प्रोग्राम चल रहा है | फोटो: इंस्टाग्राम/@elitebutlers_
एलीटबटलर्स बटलर ट्रेनिंग प्रोग्राम चल रहा है | फोटो: इंस्टाग्राम/@elitebutlers_

ज्यादातर लाइफस्टाइल मैनेजर हॉस्पिटैलिटी सेक्टर से आते हैं, खासकर मैरियट और रिट्ज-कार्लटन जैसे बड़े होटल समूहों से. अब भर्ती का दायरा एविएशन सेक्टर तक भी बढ़ गया है, क्योंकि केबिन क्रू इस काम के लिए काफी उपयुक्त साबित होते हैं. उन्हें धैर्य, बातचीत करने की क्षमता और सेवा से जुड़े अनुशासन की ट्रेनिंग मिली होती है. चौहान ने कहा कि कंपनी बिल्कुल नए लोगों को नौकरी नहीं देती और उम्मीदवारों के पास कम से कम दो साल का अनुभव होना चाहिए. कुछ लोगों के पास 20 साल से भी ज्यादा का अनुभव रहा है.

इस क्षेत्र की मांग भी तेज़ी से बढ़ रही है. बताया जाता है कि पिंच की सालाना आय 2022-23 में 78 लाख रुपये से बढ़कर पिछले वित्तीय वर्ष में 4.8 करोड़ रुपये हो गई. स्टार्टअपीडिया को दिए एक इंटरव्यू में संस्थापक और सीईओ नितिन श्रीवास्तव ने कहा कि उन्हें यह विचार कोविड महामारी के दौरान आया, जब उन्होंने मार्केट में एक कमी देखी. लोगों को ऐसे भरोसेमंद व्यक्ति की ज़रूरत थी जो उनकी पूरी स्थिति को समझता हो और जरूरत पड़ने पर उनकी जिम्मेदारियां संभाल सके.

श्रीवास्तव ने दिप्रिंट को बताया कि संपन्न परिवारों के पास हमेशा ऐसे लोग रहे हैं जो उनके घर संभालते थे. नया यह है कि अब उस पुरानी अनौपचारिक व्यवस्था का एक पेशेवर विकल्प आ गया है, जिसमें कॉन्ट्रैक्ट और करियर में आगे बढ़ने का साफ रास्ता भी शामिल है.

पहले यह काम घरेलू कर्मचारियों के एक अनौपचारिक नेटवर्क में बंटा हुआ रहता था, जैसे ड्राइवर, रसोइए और हाउसकीपर. ये अक्सर प्रवासी मजदूर होते थे, जिनके पास औपचारिक ट्रेनिंग कम होती थी और जिन्हें सामाजिक व्यवस्था में निचले स्तर पर देखा जाता था. आज वही काम एक ही भूमिका में समेट दिया गया है. जो काम पहले अलग-अलग लोगों द्वारा किया जाता था और कम वेतन वाला श्रम माना जाता था, उसे अब एक साथ जोड़कर, ब्रांड बनाकर और पेशेवर सेवा के रूप में बेचा जा रहा है.

श्रीवास्तव ने कहा, “इंग्लैंड और खाड़ी देशों जैसे कई देशों में यह व्यवस्था कई वर्षों से मौजूद है. भारत में भी इसकी कुछ रूपरेखाएं, जैसे बटलर सेवा, सदियों से शाही परिवारों का हिस्सा रही हैं. इसलिए यह कोई नई या बाहर से आई हुई चीज नहीं है. जो बदला है, वह यह है कि अब इसे औपचारिक रूप दिया गया है. यह एक व्यवस्थित प्रक्रिया और संगठित उद्योग बन गया है, और अब बहुत बड़े वर्ग के लोगों के लिए उपलब्ध है.”

गुरुग्राम की लाइफस्टाइल मैनेजमेंट फर्म पिंच के ऑफिस के बाहर | फोटो: साक्षी मेहरा/दिप्रिंट
गुरुग्राम की लाइफस्टाइल मैनेजमेंट फर्म पिंच के ऑफिस के बाहर | फोटो: साक्षी मेहरा/दिप्रिंट

एक व्यवस्थित जीवन की व्यवस्था

जो परिवार लाइफस्टाइल मैनेजर रखते हैं, उनके लिए यह एक तरह का सहारा होता है. इससे उन्हें शहरों में रहने वाले व्यस्त और भागदौड़ भरे जीवन से कुछ राहत मिलती है.

एक बहुराष्ट्रीय कंपनी (MNC) में काम करने वाले एक पेशेवर ने यह सेवा तब ली, जब वह और उनकी पत्नी अपनी व्यस्त वैश्विक नौकरियों और देर रात तक चलने वाले अनियमित काम के दबाव से परेशान हो गए थे.

उन्होंने कहा, “मैं और मेरी पत्नी दोनों बहुत व्यस्त हैं. हमारा दिन बहुत जल्दी शुरू हो जाता है और रात में अमेरिका से जुड़ी मीटिंग्स होती हैं. हमारा पूरा दिन काम में बीत जाता है और हमारे पास समय बहुत कम होता है. हमारी एक छोटी बेटी भी है. यह सब हमारे लिए बहुत भारी होता जा रहा था और तभी हमने यह सेवा लेने का फैसला किया.”

उनके पास पहले से ही घरेलू मदद के लिए एक रसोइया, नैनी, ड्राइवर और सफाईकर्मी थे, लेकिन अब यह व्यवस्था पर्याप्त नहीं लग रही थी. सबसे बड़ी कमी एक ऐसे व्यक्ति की थी, जो इन सभी लोगों के कामों को जोड़कर संभाल सके और उनका मानसिक बोझ कम कर सके.

उन्होंने कहा कि वह अपने निजी या रचनात्मक फैसले किसी और को नहीं सौंपना चाहते थे. वह सिर्फ उन कामों का तनाव कम करना चाहते थे, जिनमें बहुत समय लगता है. नए घर में शिफ्ट होने के बाद उसे व्यवस्थित करने से लेकर बाली में परिवार की छुट्टियों की योजना बनाने तक, मैनेजर का काम यह सुनिश्चित करना था कि दंपति की योजनाएं वास्तव में पूरी हो जाएं.

जो योजनाएं पहले रोजमर्रा की व्यस्तताओं की वजह से टलती रहती थीं, वे अब पूरी होने लगीं क्योंकि उनके उबाऊ और समय लेने वाले हिस्से को मैनेजर संभाल लेता था, लेकिन इस पेशेवर ने यह भी माना कि हर कोई इस विचार को आसानी से स्वीकार नहीं करता.

उन्होंने कहा, “कुछ लोगों को हमने यह सेवा सुझाई, लेकिन उन्हें इसकी जरूरत महसूस नहीं हुई या उन्हें यह खर्च सही नहीं लगा. आखिरकार यह आपकी सोच पर निर्भर करता है. अगर आपकी प्राथमिकता अपना समय वापस पाना और महत्वपूर्ण चीजों पर ध्यान देना है, तो इसका महत्व साफ दिखाई देता है. मेरे लिए यह हाउस मैनेजर रखने की बात नहीं है. यह अपने और अपने परिवार के लिए समय खरीदने की बात है.”

शीतल ने बताया कि हर घर अलग तरीके से चलता है. कुछ परिवार इस बात को लेकर बहुत खास होते हैं कि उनका किराने का सामान कहां से खरीदा जाए. कुछ लोग सख्त खान-पान नियमों का पालन करते हैं. कई परिवार उम्मीद करते हैं कि मैनेजर उनकी आदतों को देखे, याद रखे और बिना बार-बार बताए उसी के अनुसार काम करे. समय के साथ ऐसे अनुभवों का असर शीतल पर भी पड़ा. वह खुद भी पोषण, स्वास्थ्य और जीवनशैली को लेकर ज्यादा जागरूक हो गईं.

उन्होंने कहा, “एक बेहतरीन लाइफ डिजाइनर बनना मुश्किल नहीं है. इसके लिए सिर्फ तीन चीजों की जरूरत होती है: लोगों की भावनाओं को समझना, अच्छा संवाद और पहले से पहल करने की आदत.”

यह बात सबसे ज्यादा बड़े, कई पीढ़ियों वाले भारतीय परिवारों में दिखाई देती है, जहां एक ही घर में अलग-अलग तरह की जरूरतें होती हैं. सिर्फ रसोई में ही कई तरह की चुनौतियां हो सकती हैं—जैसे किसी बुजुर्ग को मधुमेह होने के कारण नाप-तौल कर खाना देना, किसी किशोर को खाने से एलर्जी होना, या किसी फिटनेस पर ध्यान देने वाले दंपति का अपने खाने की मात्रा पर नजर रखना. ऐसे मामलों में किराने का सामान अलग-अलग रखना पड़ता है और खाना बनाने की तैयारी भी बहुत सावधानी से करनी होती है.

इसके अलावा, अक्सर तीन या चार कारें और उनके ड्राइवर भी होते हैं, जिनका प्रबंधन करना पड़ता है. स्कूल से बच्चों को लाना, ऑफिस आने-जाने की व्यवस्था करना और देर रात एयरपोर्ट छोड़ने या लेने के कार्यक्रमों को इस तरह संभालना होता है कि पूरे दिन का काम बिना किसी रुकावट के चलता रहे.

शीतल ने कहा, “लॉजिस्टिक्स के अलावा स्वास्थ्य जांच की अपॉइंटमेंट तय करनी होती हैं, समय पर दवाइयां मंगवानी होती हैं, यात्राओं की तैयारियों का समन्वय करना होता है और बच्चों की जन्मदिन पार्टियां आयोजित करनी होती हैं. बाहर से देखने पर यह सिर्फ एक परिवार लगता है, लेकिन अंदर यह एक ऐसा सिस्टम होता है जो लगातार चलता रहता है और जिसे पर्दे के पीछे से संभाला जा रहा होता है.”

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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