नई दिल्ली: शुक्रवार की रात है. कैबों का एक काफिला हौज खास विलेज (HKV) के बाहर आकर रुकता है. बाजार नीयन लाइटों से जगमगा रहा है. बॉलीवुड के हिट गाने बज रहे हैं और बारों के बाहर खड़े लोग सरोजिनी नगर की तरह ऑफर दे रहे हैं. “टू-प्लस-वन, मैडम!”, “अंदर फ्री शॉट्स”, “लेडीज़ नाइट”. कुछ नशे में धुत ग्राहक अपनी उबर का इंतजार करते हुए पहले ही लड़खड़ाते हुए बाहर निकल रहे हैं.
यह एक बड़ा बदलाव है. जो जगह कभी दिल्ली के स्टाइलिश और खास लोगों का अड्डा थी, आज वहां ड्रग बेचने वाले, जर्जर बार, जिम के दीवाने लड़के, दिखावा करने वाले युवा और कथित तौर पर सेक्स वर्कर तक दिखाई देते हैं.
चार दशक पहले, HKV को न्यूयॉर्क के ग्रीनविच विलेज का जवाब माना जाता था. इसकी सड़कों पर एंबेसडर, मर्सिडीज, बीएमडब्ल्यू और मॉरिस गैरेज की गाड़ियां खड़ी रहती थीं. बॉलीवुड सितारे रेखा और राजेश खन्ना, विदेशी नागरिक, राजनयिक, समाज की प्रतिष्ठित महिलाएं और शहर के नए अमीर लोग यहां की शानदार बुटीक दुकानों और रेस्तरां में घूमते दिखाई देते थे. यह एक आत्मविश्वासी और वैश्विक होती भारत की पहचान था, जो दुनिया को अपनाने के साथ अपनी ग्रामीण जड़ों को भी संभालना चाहता था. इसलिए उसने दक्षिण दिल्ली के एक आधुनिक बनाए गए गांव में अपनी जगह बनाई.
77 वर्षीय दुकानदार कुसुम जैन ने कहा, “यह एक महंगा बाजार था, जिसे खास लोगों के लिए बनाया गया था.” उनकी दुकान कॉटेज एंड ज्वेल्स इस इलाके की सबसे पुरानी दुकानों में से एक है और कभी बॉलीवुड की कई बड़ी हस्तियों को आकर्षित करती थी. दुकान की दीवारों पर डिंपल कपाड़िया से लेकर अर्जुन कपूर तक की तस्वीरें लगी हैं, लेकिन अब उन पर धूल जम चुकी है.
1990 के दशक में मीडिया ने HKV को दिखावे की बीमारी से ग्रस्त बताया था. इंडिया टुडे ने एक बार इसे “घमंड और ऐसे लोगों की जगह जो खुद को हास्यास्पद दिखाने के लिए मेहनत करते हैं” कहकर निशाना बनाया था, हालांकि बाद में उसने माना कि यहां का खानपान लोगों को “एक ही जगह पर पूरी दुनिया” का अनुभव देता है.
2011 तक अंतरराष्ट्रीय मीडिया भी इसकी बोहेमियन पहचान को मान्यता देने लगा था. 25 फरवरी 2011 के एक लेख में वॉशिंगटन पोस्ट ने HKV को दिल्ली के उन इलाकों में शामिल किया था, जहां जरूर जाना चाहिए.
2022 में भी न्यूयॉर्क टाइम्स ने HKV को “उभरता हुआ इलाका” बताया था, जहां समकालीन कला का आधुनिक माहौल है.

अपने सुनहरे दौर में HKV दिल्ली के अमीर तबके को एक खास सपना बेचता था. ऐसा लग्जरी अनुभव जो एक जीवंत गांव के भीतर मौजूद था और जहां पहुंच सिर्फ चुनिंदा लोगों को थी.
जैन ने कहा, “हमने लोगों के मन में खास होने और जिज्ञासा की भावना पैदा की और जैसा हमने सोचा था, वैसे ही सभी यहां आने लगे. HKV एक स्टेटस सिंबल बन गया था. ऐसी चीज जिसे आप अपने खास सामाजिक दायरे में दिखा सकते थे.”
अब दशकों बाद सिर्फ दुकानदार और मकान मालिक ही नहीं कहते कि बाजार बदल गया है. यहां वर्षों से काम कर रहे कर्मचारी भी मानते हैं कि यहां आने वाली भीड़ और माहौल में बड़ा बदलाव आया है.
HKV की एक गली में सुरेश अपने काम के बीच ब्रेक के दौरान फोन चला रहे हैं. वह पिछले 10 साल से दक्षिण भारतीय रेस्तरां नैवेद्यम में काम कर रहे हैं और कहते हैं कि आज के बाजार और पहले के बाजार में फर्क साफ दिखाई देता है.
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “पहले बहुत अच्छे लोग आते थे. अब ज्यादातर ‘चिरकुट’ लोग आते हैं.”

बढ़ता मध्यम वर्ग और ग्लोकल सपने
हौज खास विलेज ने दिल्ली को उसकी पहली नाइटलाइफ दी, जो 1980 के दशक तक सिर्फ पांच सितारा होटलों के भीतर सीमित थी. जब यह सोशलाइट और उद्यमी बीना रमानी और उनके समूह की सोच के तहत विकसित होने लगा, तो यह फैशन, कला और नाइटलाइफ का ऐसा केंद्र बन गया जो अब आम लोगों के लिए खुला था. हर कोई इसका हिस्सा बनना चाहता था.
उस दौर में हौज खास विलेज की सबसे प्रसिद्ध लग्जरी बुटीक दुकानों में ओगान शामिल थी, जो 1989 में शुरू हुई थी और आज भी इलाके की पहचान बनी हुई है. अन्य प्रमुख नामों में बीना रमानी की वन्स अपॉन ए टाइम, लिमलाइट और इश्वतम शामिल थीं. स्थानीय लोगों को याद है कि अभिनेत्री पद्मिनी कोल्हापुरे की भी यहां एक कपड़ों की दुकान थी.
बुटीक संस्कृति के साथ-साथ कैफे और रेस्तरां का माहौल भी तेजी से बढ़ा. बिस्ट्रो जैसे स्थान लोकप्रिय मिलन स्थल बन गए, जबकि आज दिवा रेस्तरां के लिए मशहूर ऋतु डालमिया का मेज़ालूना भी HKV की बढ़ती पहचान का हिस्सा बना.
बहुत कम लोग जानते हैं कि दिल्ली की प्रसिद्ध कला दीर्घा DAG, जिसकी स्थापना आशीष आनंद ने की थी और जिसे आज अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली हुई है, उसकी शुरुआत भी HKV से ही हुई थी.
दिल्ली के सोशलाइट दिलीप चेरियन ने भी HKV में “अ टच ऑफ क्लास” नाम का रेस्तरां चलाया था. यह 12 सीटों वाला छोटा रेस्तरां था, जिसकी एक कांच की दीवार ऐसे शौचालय की ओर खुलती थी जिसे गांव के दो घर साझा करते थे.
चेरियन ने द प्रिंट से कहा, “तब HKV की यही खासियत थी. यह बोहेमियन, कलात्मक और थोड़ा अव्यवस्थित था. यह दिल्ली के एक नए सांस्कृतिक दौर में प्रवेश करने जैसा था. यहां परिष्कार और गांव की असली जिंदगी साथ-साथ मौजूद थे, जैसे एक ही थाली में क्लास और गोबर.”
भारत की अर्थव्यवस्था खुल रही थी, तेजी से खर्च करने वाला नया मध्यम वर्ग उभर रहा था, पैसा आना शुरू हो गया था और दुनिया का ध्यान भारत की ओर बढ़ रहा था. लेकिन आधुनिकता की इस दौड़ के बीच भारतीय पहचान को बचाए रखने की गहरी इच्छा भी थी. 1990 के दशक की हिंदी फिल्मों, जैसे फिर भी दिल है हिंदुस्तानी, में भी यही भावना दिखाई देती थी, जहां वैश्विक सपनों और भारतीयता दोनों को महत्व दिया गया. “ग्लोकल” शब्द के लोकप्रिय होने से बहुत पहले, हौज खास विलेज उसकी जीती-जागती मिसाल बन चुका था.

यह डिजाइनर बुटीक और कैफे से भरा एक आलीशान बाजार था, लेकिन इसकी बनावट गांव जैसी थी. एक लग्जरी कपड़ों की दुकान के बगल में चारपाई होती थी, जहां सफेद पगड़ी और बड़ी मूंछों वाले लोग हुक्का पीते थे. कुछ कदम दूर महिलाएं खुले आंगन में गायों का दूध निकालती थीं. गलियों में मोर घूमते थे और पेड़ों पर सैकड़ों हरे तोते बैठे रहते थे. शहर और गांव का यह मेल कोई संयोग नहीं था, बल्कि सोच-समझकर तैयार किया गया अनुभव था.
दिल्ली को अपना एक फैशनेबल गांव मिल गया था. लेकिन गांव के भीतर एक आधुनिक व्यावसायिक इलाका बसाने के साथ ऐसी समस्याएं भी आईं, जिनका समाधान शहर कभी पूरी तरह नहीं कर पाया. वैधता और नियमों से जुड़े सवाल हमेशा बने रहे. समय के साथ यहां आग लगने की घटनाएं हुईं, चोरी की खबरें आईं और हत्या व आत्महत्या की घटनाओं ने इसकी चमकदार छवि को धूमिल करना शुरू कर दिया.
धीरे-धीरे अमीर लोग उस गांव से दूर होने लगे, जिसे लोकप्रिय बनाने में कभी उनका बड़ा योगदान था. हालांकि HKV आज भी दिल्लीवासियों की घूमने की सूची में शामिल है, लेकिन अब यहां आने वाले लोगों की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है. संकरी गलियां अब कॉलेज छात्रों और सस्ती नाइट आउट की तलाश में आने वाले लोगों से भरी रहती हैं.
एक 18 वर्षीय लड़की ने अपनी दोस्त की तस्वीर खींचते हुए कहा, “सिर्फ 3,000-4,000 रुपये में यहां शॉपिंग, खाना और ड्रिंक सब हो जाता है.”
वह और उसकी दोस्त एक दिन पहले ही बोर्ड परीक्षा खत्म होने के बाद जश्न मनाने यहां आई थीं.
उसने कहा, “हमारे सीनियर्स ने बताया था कि यहां सस्ता लेकिन अच्छा खाना और ड्रिंक्स मिलते हैं.”
और सस्ता होना कभी हौज खास विलेज की पहचान नहीं था. अब विशिष्टता खत्म हो चुकी है और हर किसी का यहां स्वागत है.

‘हादसे का इंतिजार’
हनुमान मंदिर रोड पर दिखा एक नजारा सुधीर गोचुकल को परेशान कर गया. गांव के 43 वर्षीय मकान मालिक जब इस सड़क से गुजर रहे थे, तो उन्होंने मंदिर के बाहर एक जोड़े को बीयर पीते और किस करते देखा. उन्होंने धीरे से कुछ बड़बड़ाया और आगे बढ़ गए.
कुछ ही देर बाद एक एजेंट उनके पास आया और उन्हें “स्पा सर्विस के जरिए लड़कियां” ऑफर करने लगा. आसपास जो कुछ वह देख रहे थे, उससे पहले ही नाराज गोचुकल अपना आपा खो बैठे और उन्होंने उस आदमी को थप्पड़ मार दिया. कुछ ही मिनटों में वहां भीड़ जमा हो गई. भीड़ में से किसी ने उन्हें पहचान लिया.
“ये गांव के हैं,” एक आदमी ने एजेंट को शांत कराते हुए कहा. “कम से कम ये तो देख लिया करो कि किसके पास ऐसे ऑफर लेकर जा रहे हो.”
गोचुकल को शराबखानों वाली संस्कृति बिल्कुल पसंद नहीं है. उनके मुताबिक इसकी शुरुआत करीब 2016 में हुई थी, लेकिन अब यह हद से ज्यादा परेशान करने वाली हो गई है. उन्होंने अधिकारियों से भी शिकायत की, लेकिन कुछ नहीं बदला.
“ये पुलिस को पैसे देते हैं,” गोचुकल ने कहा.
उनका कहना है कि वह अब उस इलाके को पहचान नहीं पाते, जहां वह बड़े हुए थे. कभी हौज खास विलेज में महिलाएं बेखौफ घूमती थीं.

आज, उनके मुताबिक, माहौल पूरी तरह बदल चुका है. हौज खास विलेज में महिलाओं के साथ छेड़छाड़ होती है, एजेंट उन्हें असहज महसूस कराते हैं और यह अब पहले जैसा सुरक्षित घूमने-फिरने का स्थान नहीं रहा.
करीब दो साल तक अपना रेस्तरां चलाने वाले दिलीप चेरियन का मानना है कि इलाके का पतन तब शुरू हुआ जब रचनात्मकता और पहचान की जगह सिर्फ कमाई ने ले ली.
उन्होंने कहा, “जब कोई जगह बहुत ज्यादा सफल हो जाती है, तो उसकी गुणवत्ता गिरना तय होता है. मकान मालिकों ने जल्दी पैसा कमाने के पीछे भागना शुरू कर दिया.” उन्होंने बताया कि उन्हें अपना रेस्तरां इसलिए बंद करना पड़ा क्योंकि मकान मालिक को दूसरा किरायेदार ज्यादा किराया देने को तैयार था.
चेरियन करीब एक दशक पहले आखिरी बार ओगान में खाना खाने के लिए हौज खास विलेज गए थे. उनके मुताबिक आज हौज खास विलेज की हालत “शराबी जैसी” हो गई है.
उन्होंने कहा, “जब किसी जगह पर पजेरो चलाने वाले दिखावटी ‘वॉनाबी जाट’ हावी होने लगें, तो समझ जाइए कि उस इलाके की आत्मा खत्म हो चुकी है.”

हौज खास विलेज की सफलता के पीछे चौधरी
कॉलोनियल राज बिल्डिंग, जो बाद में कुतुब कोलोनेड बनी, में अपना पहला बुटीक खोलने के आठ महीने बाद बीना रमानी एक ऐसी जगह ढूंढ रही थीं जहां वह अपना वर्कशॉप शुरू कर सकें. एक शाम जब वह अपनी फिएट कार से हौज खास के पास की संकरी सड़कों से गुजर रही थीं, तभी सफेद धोती-कुर्ता पहने और मूंछों वाले एक व्यक्ति ने उन्हें रोक लिया.
उसने अंग्रेजी में कहा, “स्मारक छह बजे बंद हो जाता है. कल वापस आइए.” यह सुनकर रमानी हैरान रह गईं. उन्होंने बताया कि वह पर्यटक नहीं हैं और दुकान की तलाश में हैं.
उन्हें रोकने वाला व्यक्ति रघुवीर सिंह चौधरी था, जो गांव का बेहद सम्मानित व्यक्ति था. वह लगभग सरपंच जैसी हैसियत रखते थे और अपनी “टूटी-फूटी अंग्रेजी” तथा “स्थानीय लोगों पर प्रभाव” के लिए जाने जाते थे.
चौधरी ने रमानी को एक छोटी जगह के बारे में बताया, जिसे नमक के बोरे रखने के लिए 3,000 रुपये महीने पर किराए पर दिया गया था, लेकिन उन्होंने वह जगह उन्हें 2,000 रुपये में देने की पेशकश की. जब वह उन्हें संपत्ति दिखा रहे थे और एक अंधेरे कमरे से दूसरे कमरे में ले जा रहे थे, तब उन्होंने आखिर में एक लकड़ी का दरवाजा खोला जो झील की ओर खुलता था. रमानी के मुताबिक उस पल उनका “दिल रुक गया.”
दरवाजे के उस पार डूबते सूरज की रोशनी में चमकती हौज खास झील थी. एक तरफ मध्यकालीन स्मारक के खंडहर थे और दूसरी तरफ घने हरे पेड़.
रमानी ने याद करते हुए कहा, “मैंने इससे ज्यादा खूबसूरत दृश्य कभी नहीं देखा था. वह तस्वीर आज तक मेरे मन में बसी हुई है. उसी पल मैंने तय कर लिया था कि मुझे यहीं रहना है.” यह कहते हुए उनकी आंखों से आंसू निकल आए.

इस याद को बताते हुए भावुक रमानी ने चार उंगलियां उठाकर समझाया कि उन्होंने उसी समय चौधरी को प्रस्तावित किराए का दोगुना देने का वादा कर दिया था और 4,000 रुपये देने की बात कही.
रमानी के शुरुआती ग्राहक मुख्य रूप से राजनयिकों की पत्नियां थीं, जो कपड़े के नमूने, डिजाइन और नाप लेकर सिलाई के लिए गांव आती थीं. उनके लिए यह इलाका भारत का एक अलग रूप था, जो आलीशान होटलों और राजनयिक दुनिया की चमक-दमक से अलग था.
जैसे-जैसे उनके वर्कशॉप में लोगों की आवाजाही बढ़ी, रमानी ने गांव की महिलाओं को ग्राहकों के लिए मसाला चाय बेचने वाला एक छोटा चाय स्टॉल खोलने के लिए प्रेरित किया.
उन्होंने हंसते हुए कहा, “मैंने उनमें से एक को एस्प्रेसो बनाना भी सिखाया था.” और देखते ही देखते वह कैफे लोकप्रिय हो गया. रमानी और चौधरी ने मिलकर गांव को बदलना शुरू कर दिया. रमानी ने गांव के कई लोगों को बैंक खाता खोलने की सलाह दी. कुछ लोगों ने अपनी गायें बेच दीं, पैसे बचत खाते में जमा कर दिए और फिर अपने शेड उन दुकानदारों को किराए पर देने लगे जिन्हें रमानी अपने नेटवर्क के जरिए लाती थीं.
उन्होंने कहा, “एक समय ऐसा आया जब मैं भूल गई कि मैं डिजाइनर हूं. मैं तो रियल एस्टेट एजेंट बन गई थी.”
उन्होंने अपने सभी जानने वालों को फोन करना शुरू किया. दोस्त, कलाकार, उद्यमी, निवेशक, जो भी दुकान खोलना चाहता था या कारोबार शुरू करना चाहता था. धीरे-धीरे हौज खास विलेज एक ऐसे सांस्कृतिक और व्यावसायिक केंद्र में बदल गया जैसा दिल्ली ने पहले कभी नहीं देखा था.
इन्हीं शुरुआती खरीदारों में कुसुम जैन भी थीं. उन्होंने 1989 में दुकान किराए पर ली थी और 1992 में उसे खरीद लिया.
जब उनकी दुकान के छोटे टीवी पर शम्मी कपूर का पुराना गीत ‘छुपने वाले सामने आ’ (तुमसा नहीं देखा, 1957) बज रहा था, तब जैन ने बेसमेंट में बैठकर पुराने हौज खास को “कोरा कागज” बताया, एक ऐसी जगह जो अनगिनत संभावनाओं से भरी थी.
जैन ने कहा, “हमें यहां शतरंज की बिसात बिछानी थी, लेकिन कहीं न कहीं हम सब असफल हो गए. वह कोरा कागज अब कुछ ऐसा बन चुका है जिसे पहचानना मुश्किल है.” यह कहते हुए उनकी आंखों में पछतावा साफ दिख रहा था.
अब युवा पर्यटक और विदेशी सैलानी उनकी दुकान में आते हैं, कुछ देर सामान देखते हैं, कीमत पूछते हैं और बिना कुछ खरीदे चले जाते हैं.
जैन ने कहा, “तीस साल पहले शायद ही कोई खाली हाथ जाता था. मोलभाव तो दूर, लोग एक दिन में हजारों रुपये खर्च कर देते थे. अब कुछ नहीं बचा.”

उलझनों का जाल
जब कोई गांव की मुख्य गली से गुजरता है, तो ऊपर बिजली के उलझे हुए तार दिखाई देते हैं. इनके साथ बार और रेस्तरां के बीच सजावटी लाइटें भी टंगी रहती हैं.
लेकिन संकरी गलियों के अंदर स्थिति और भी चिंताजनक लगती है. रास्ते इतने तंग हैं कि लोगों के चलने की मुश्किल से जगह बचती है. लगभग हर मोड़ पर खुले तार, जरूरत से ज्यादा लोड वाले बिजली मीटर और उलझी हुई केबलें दिखाई देती हैं.
गोचुकल का दावा है कि हौज खास विलेज के कई रेस्तरां अभी भी उचित फायर एनओसी के बिना चल रहे हैं, जिससे सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ती है.
गोचुकल ने कहा, “यह एक ऐसा हादसा है जो बस होने का इंतजार कर रहा है. इनमें से कई जगहें अवैध तरीके से चल रही हैं, लेकिन क्योंकि इनसे मकान मालिकों को भारी किराया मिलता है, इसलिए कोई सवाल नहीं उठाता.”

उनके मुताबिक असली समस्या खराब प्रबंधन और बिना नियंत्रण के हुए व्यावसायीकरण में है.
उन्होंने कहा, “यहां किसी को भी क्लब चलाना ठीक से नहीं आता. उन्हें इसका उच्चारण तक नहीं आता. वे इसे ‘किलाब’ कहते हैं.”
ज्यादा से ज्यादा किराया कमाने की होड़ ने हौज खास विलेज की भीड़भाड़ को और बढ़ा दिया है.
गोचुकल ने बताया, “अगर किसी मकान मालिक के पास 1,000 वर्ग फुट की संपत्ति है, तो वह उसे एक किरायेदार को देने के बजाय दो हिस्सों में बांट देता है ताकि दोगुना किराया मिल सके. इससे पूरा इलाका और ज्यादा तंग हो जाता है.”
गोचुकल ने बताया कि उन्होंने हौज खास विलेज में अपनी इमारत की तीनों मंजिलें किराए पर दी हुई हैं और उनसे हर महीने करीब 20 लाख रुपये की कमाई होती है.
उन्होंने कहा, “फिर भी यह रकम कई दूसरे लोगों की कमाई से कम है.”
यह बदलाव लोकप्रिय संस्कृति और मीडिया में हौज खास विलेज की छवि में भी दिखाई देता है. कभी डिजाइनर बुटीक, फिल्मी सितारों के अड्डों और शानदार कैफे संस्कृति के लिए मशहूर यह इलाका वजीर, तमाशा और 2 स्टेट्स जैसी फिल्मों में नजर आता था. उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स ब्रांड boAt की शुरुआत भी एचकेवी सोशल से हुई थी, जो आज भी अपने इंडस्ट्रियल स्क्रैप-मेटल डिजाइन के कारण लोगों के बीच लोकप्रिय है.
पार्किंग एक बड़ी समस्या बन गई, बिजली की सप्लाई भरोसेमंद नहीं रही और रमानी के समूह समेत कई डिजाइनर बुटीक बंद होकर एमजी रोड जैसे नए लग्जरी इलाकों में चले गए.
करीब 2011-12 के आसपास हौज खास विलेज को लेकर चर्चा का स्वर बदलने लगा. जो मीडिया कभी इसकी फैशन, संस्कृति और कैफे संस्कृति की तारीफ करता था, वह अब फायर सेफ्टी नियमों के उल्लंघन, कमजोर नियमन वाले बार और रेस्तरां, भीड़भाड़ और सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं पर ध्यान देने लगा.
गोचुकल के लिए यह बदलाव व्यक्तिगत भी था. उन्होंने 2017 में वसंत कुंज में घर ले लिया क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे हौज खास विलेज में बड़े हों.
उन्होंने कहा, “जिन दिनों मैं हौज खास विलेज आता हूं, मैं खुद शाम 6 बजे के बाद नहीं रुकता. उसके बाद यहां पूरी अव्यवस्था फैल जाती है. उन्होंने इस जगह को कुछ ऐसा बना दिया है जिसे पहचानना मुश्किल है. यह शर्मनाक और निराशाजनक है.”

चौधरी के बिना एक गांव
अगर आप हौज खास विलेज के पुराने लोगों से पूछें कि यहां क्या गलत हुआ, तो उनमें से कई आखिरकार एक ही घटना का जिक्र करते हैं. रघुवीर चौधरी की मौत.
चौधरी एक तरफ प्रभावशाली व्यक्ति थे और दूसरी तरफ लोगों के बीच समझौता कराने वाले. उन्होंने स्थानीय लोगों और उन कलाकारों, डिजाइनरों, राजनयिकों तथा उद्यमियों के बीच पुल का काम किया, जो 1980 के दशक में हौज खास विलेज आने लगे थे. कई लोग मानते हैं कि उन्हीं की वजह से गांव का बदलाव अव्यवस्था में नहीं बदला.
लेकिन 1992 में उनकी मौत के बाद धीरे-धीरे दरारें दिखने लगीं.
जैसे-जैसे गांव के युवा बड़े हुए, वैसे-वैसे बाजार में शॉर्ट्स या स्कर्ट पहनकर आने वाली महिलाओं को असहज नजरों और व्यवहार का सामना करना पड़ने लगा.
कुसुम जैन की ज्वेलरी दुकान, कॉटेज एंड ज्वेल्स, में अब पहले जैसी भीड़ और ग्राहक नहीं आते. त्रिया गुलाटी | द प्रिंट
बीना रमानी ने कहा, “वे लगातार महिलाओं को घूरते रहते थे और उन्हें असहज महसूस कराते थे. मैंने इस बात पर कई बार उनका सामना भी किया. आखिरकार इससे आने वाले लोगों का अनुभव खराब हो गया.”
इसके बावजूद बाजार कई सालों तक अपनी पहचान बनाए रखने में सफल रहा और फलता-फूलता रहा.
कई स्थानीय लोगों और कारोबारियों के मुताबिक पहला बड़ा झटका 2017 में लगा, जब बड़े पैमाने पर चलाए गए सीलिंग अभियान के दौरान दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति ने इलाके के 21 बार और रेस्तरां बंद कर दिए. तब से कई लोगों का मानना है कि हौज खास विलेज पूरी तरह से संभल नहीं पाया.
लोगों को वापस आकर्षित करने के लिए कारोबारियों ने ज्यादा छूट, ऑफर और ग्राहकों को अपने प्रतिष्ठानों में बुलाने के लिए सड़क पर एजेंट लगाने शुरू कर दिए. धीरे-धीरे भीड़ और कमाई तो वापस आने लगी, लेकिन आने वाले लोगों की गुणवत्ता काफी गिर गई.
रमानी ने बताया कि वह आखिरी बार करीब आठ महीने पहले हौज खास विलेज गई थीं.
उन्होंने कहा, “यह लगातार और खराब होता जा रहा है.” इसके बाद उन्होंने 1992 में चौधरी की मौत के बाद लिखा अपना एक पुराना लेख निकाला. उसमें उन्होंने उस दुखद घटना का जिक्र किया था. बताया गया था कि चौधरी देर रात उठे थे और शौच के लिए बाहर गए थे. उसी दिन बने एक कुएं में उनका पैर फिसल गया और वह उसमें गिर गए.
उनके लेख की आखिरी पंक्ति थी, “अपने चौधरी के बिना हौज खास विलेज क्या है?”
रमानी ने कहा, “और सच कहूं तो पिछले कई दशकों में हमने इस सवाल का जवाब खुद सामने आते देखा है. हौज खास विलेज एक ऐसी जगह बन गया जो अपनी संभावनाओं को पूरा नहीं कर पाया. इसमें देने के लिए बहुत कुछ था. आज जब भी मैं वहां जाती हूं, यह देखकर दिल टूट जाता है कि वह क्या बन चुका है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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