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Wednesday, 3 June, 2026
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2028 की राह में तेलंगाना: सरकार के आधे कार्यकाल के बाद रेवंत रेड्डी के सामने कौन-कौन सी बड़ी चुनौतियां?

सरकार के आधे कार्यकाल पूरे होने पर तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी पर चुनावी वादों को पूरा करने, बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए धन जुटाने और मजबूत हो रहे विपक्ष का मुकाबला करने का दबाव है.

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हैदराबाद: दो जून 2026 को तेलंगाना स्थापना दिवस के साथ राज्य में रेवंत रेड्डी के नेतृत्व वाली सरकार ने आधा कार्यकाल पूरा कर लिया है. अब मुख्यमंत्री और उनकी 15 सदस्यीय कैबिनेट के पास बड़े विकास प्रोजेक्ट्स को लागू करने और 2023 में किए गए छह कल्याणकारी वादों को पूरी तरह लागू करने के लिए 30 महीने से भी कम समय बचा है.

कांग्रेस सरकार की उपलब्धियों में पूरे राज्य में महिलाओं के लिए मुफ्त रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (RTC) बस सेवा और सामाजिक-आर्थिक, शिक्षा, रोजगार तथा राजनीतिक सर्वे का सफलतापूर्वक पूरा होना प्रमुख हैं. बाकी पांच गारंटी योजनाएं अभी आंशिक रूप से लागू हुई हैं. सरकार के सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया कि मुख्यमंत्री अगले दो वर्षों में इन योजनाओं को तेजी से लागू करना चाहते हैं और इसके लिए सर्वे के नतीजों को आधार बनाया जाएगा.

रेवंत रेड्डी, उनके नेता राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी के लिए जाति जनगणना, जिसे अक्सर समाज का ‘एक्स-रे’ कहा जाता है, भारत में सामाजिक न्याय के अगले चरण की नींव के रूप में पेश की गई थी. राहुल गांधी इसे गहरी सामाजिक असमानताओं को समझने, सभी को उचित प्रतिनिधित्व दिलाने और सार्वजनिक नीतियों को नया रूप देने का एक ज़रूरी साधन मानते हैं.

ऐसे में समाज के उन वर्गों को केंद्र में रखकर प्रभावी और निष्पक्ष कल्याणकारी नीतियां बनाने में रेवंत रेड्डी की समझ और सफलता अन्य कांग्रेस शासित राज्यों के लिए भी मॉडल बन सकती है. खासकर कर्नाटक जैसे राज्यों के लिए, जहां सामाजिक-आर्थिक सर्वे से अब तक बहुत कम परिणाम मिले हैं.

सामाजिक-आर्थिक, शैक्षणिक, रोजगार, राजनीतिक और जाति सर्वे (SEEEPC) के आधार पर विकास मॉडल की सफलता 2029 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी के लिए एक बड़ा आधार बन सकती है.

अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों को उनकी व्यक्तिगत और राजनीतिक ताकत का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल करने से रोकना और उन पार्टी नेताओं को नियंत्रण में रखना, जिन्होंने शुरुआत में उनके तेजी से उभरने का विरोध किया था, रेवंत रेड्डी की व्यक्तिगत राजनीतिक उपलब्धियों में गिना जाता है. 2017 में कांग्रेस में शामिल होने के बाद उनकी राजनीतिक यात्रा काफी हद तक स्वयं के प्रयासों से आगे बढ़ी है.

वरिष्ठ नौकरशाहों ने बताया कि उपमुख्यमंत्री, उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री और सिंचाई मंत्री सभी अलग राजनीतिक पृष्ठभूमि से आते हैं. ऐसे में मुख्यमंत्री के रूप में रेवंत रेड्डी का पहला साल मुख्य रूप से प्रशासन चलाना सीखने में बीता.

‘प्रजा पालना’ कार्यक्रम का महत्व

उस्मानिया विश्वविद्यालय में पढ़ा चुके और पूर्व एमएलसी प्रो. नागेश्वर ने कहा कि गारंटी योजनाओं को लेकर हो रही आलोचनाओं के बीच ‘प्रजा पालना’ (अभयहस्तम) शासन कार्यक्रम ने लोगों के बीच कांग्रेस और रेवंत रेड्डी की छवि कल्याणकारी नेता के रूप में मजबूत की है.

उन्होंने कहा, “किसी भी राजनीतिक दल का सबसे ज़रूरी काम लोगों के साथ अपनी पहचान बनाना होता है…लोगों की समस्याओं और उनकी आकांक्षाओं को समझना होता है. प्रजा पालना के जरिए रेवंत ने मतदाताओं को यह भरोसा दिलाया है कि सरकार उन्हें समझती है और उनके साथ खड़ी है.”

मार्च में रेवंत रेड्डी ने राज्य में विकास और कल्याणकारी योजनाओं को तेज करने के लिए ‘99-दिवसीय प्रजा पालना–प्रगति प्राणालिका’ कार्यक्रम शुरू किया था. यह एक ऐसा मंच भी था, जहां लोग सरकार के कामकाज और योजनाओं को लेकर अपनी शिकायतें दर्ज करा सकते थे.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि रेवंत रेड्डी के कई विचार उनके राजनीतिक गुरु और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की कार्यशैली से मिलते-जुलते दिखाई देते हैं.

कांग्रेस के पुराने नेता, जो दिवंगत मुख्यमंत्री वाई. एस. राजशेखर रेड्डी की कैबिनेट का हिस्सा रहे थे, भी मानते हैं कि केंद्र सरकार के प्रति रेवंत का टकराव से बचने वाला रवैया राजनीतिक रूप से उनके लिए फायदेमंद रहा है.

पूर्व मुख्यमंत्री और भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के संस्थापक के. चंद्रशेखर राव के विपरीत, जो अक्सर राज्य प्रोटोकॉल का पालन नहीं करने को लेकर चर्चा में रहते थे, रेवंत रेड्डी ने प्रधानमंत्री के हैदराबाद दौरे के दौरान हमेशा प्रोटोकॉल का पालन किया है.

राजनीति बनाम प्रशासन

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद के. केशव राव ने दिप्रिंट से कहा, “रेवंत ने बहुत जल्दी राजनीति और प्रशासन के बीच का फर्क समझ लिया. इस मामले में वह नायडू के सहयोगात्मक संघवाद (कोऑपरेटिव फेडरलिज्म) के मॉडल का पालन करते हैं, न कि टकराव वाली राजनीति का. अगर केंद्र सरकार उनके शासन में हस्तक्षेप नहीं कर रही है, तो वह भी विरोध करने का कोई कारण नहीं देखते. वह समझते हैं कि विकास उनकी जिम्मेदारी है और विकास परियोजनाओं के लिए केंद्र से मदद मिल सकती है.”

यही वजह है कि सरकार की ज्यादातर योजनाएं कल्याणकारी कार्यक्रमों पर केंद्रित रही हैं और पूंजीगत खर्च (कैपिटल एक्सपेंडिचर) पर कम ध्यान दिया गया है. हालांकि, दक्षिण भारत के अन्य राज्यों की तरह वित्तीय स्थिति सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है.

दिसंबर 2023 में तेलंगाना में सत्ता में आई कांग्रेस सरकार को लगभग 3.50 लाख करोड़ रुपये का बकाया सार्वजनिक कर्ज विरासत में मिला था. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) के अनुसार, राज्य की कुल देनदारियां और गारंटी मिलाकर यह राशि 3.89 लाख करोड़ रुपये थी.

सरकार ने पालमुरु-रंगारेड्डी लिफ्ट सिंचाई परियोजना, प्राणहिता-चेवेला लिफ्ट सिंचाई परियोजना और सीता राम लिफ्ट सिंचाई परियोजना जैसी मध्यम और बड़ी सिंचाई परियोजनाओं की घोषणा की है. इन परियोजनाओं की कुल लागत लगभग 1 लाख करोड़ रुपये है, लेकिन ये अभी अलग-अलग चरणों में हैं.

‘उन्हें अपनी सीमाओं का पता है’

तेलंगाना आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले और वर्तमान एमएलसी प्रो. कोदंडराम ने दिप्रिंट से कहा, “रेवंत को अपनी सीमाओं का पता है, क्योंकि राज्य की वित्तीय स्थिति कमजोर है. हालांकि, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना में कांग्रेस की गारंटी आधारित सरकारों के कारण विकास और विकास परियोजनाओं पर ज्यादा ध्यान देने की गुंजाइश कम रह गई है.”

वित्तीय सीमाओं के कारण 200 यूनिट मुफ्त बिजली, वरिष्ठ नागरिकों के लिए 4,000 रुपये की सामाजिक पेंशन (चेयुथा), बेहतर आरोग्यश्री स्वास्थ्य योजना और गरीबों के लिए इंदिरम्मा इल्लू (मकान) जैसी योजनाएं चरणबद्ध तरीके से लागू की जा रही हैं, लेकिन हाशिए पर रहने वाले समुदायों के बेरोजगार युवाओं को स्वरोजगार शुरू करने के लिए 3-4 लाख रुपये तक का सब्सिडी वाला ऋण देने वाली राजीव युवा विकासम योजना की रफ्तार धीमी बनी हुई है. इसी तरह सभी वर्गों के छात्रों के लिए प्रस्तावित 119 एकीकृत स्कूलों की योजना भी धीमी गति से आगे बढ़ रही है.

अगर कमज़ोर वित्तीय स्थिति के कारण योजनाओं के क्रियान्वयन में देरी हुई, तो पश्चिम एशिया के युद्ध ने राज्य सरकारों के सामने अतिरिक्त चुनौतियां खड़ी कर दीं और तेलंगाना भी इससे अछूता नहीं रहा.

महालक्ष्मी योजना, जिसके तहत सफेद राशन कार्ड रखने वाली महिलाओं को 500 रुपये में एलपीजी सिलेंडर देने का वादा किया गया था, एलपीजी की कमी के कारण मुश्किल में पड़ गई. मंत्रियों ने बताया कि कई जिलों से शिकायतें मिली हैं कि राज्य सरकार की सब्सिडी राशि समय पर नहीं पहुंच रही है, जिसके कारण लाभार्थियों को पहले सिलेंडर की पूरी कीमत चुकानी पड़ रही है. यह राशि बाद में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के जरिए खाते में भेजी जानी होती है.

और यही आने वाले ढाई वर्षों में रेवंत रेड्डी की सबसे बड़ी चुनौती है.

रेवंत रेड्डी के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां

रेवंत रेड्डी के अगले 30 महीनों के कार्यकाल में जिन पांच प्रमुख राजनीतिक, विकास और कल्याणकारी प्राथमिकताओं पर नजर रहेगी, उनमें भारत फ्यूचर सिटी (BFC) परियोजना, मूसी नदी पुनर्जीवन और विकास परियोजना, मेट्रो रेल का दूसरा चरण और रीजनल रिंग रोड (RRR) परियोजना के लिए धन जुटाना शामिल है.

ये सभी महत्वाकांक्षी परियोजनाएं हैं. अगर ये पूरी हो जाती हैं, तो रेवंत रेड्डी की छवि एक दूरदर्शी नेता के रूप में मजबूत हो सकती है और उन्हें पूर्व मुख्यमंत्रियों चंद्रबाबू नायडू और के. चंद्रशेखर राव की श्रेणी में खड़ा कर सकती हैं.

तेलंगाना के टियर-2 शहरों, जैसे वारंगल, करीमनगर, खम्मम और निजामाबाद का विकास भी बेहद जरूरी है. इससे आर्थिक विकास का विकेंद्रीकरण होगा, हैदराबाद पर बुनियादी ढांचे का अत्यधिक दबाव कम होगा और गांवों से शहरों की ओर पलायन भी घटेगा.

मुख्यमंत्री यदि दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए अपनी सकारात्मक कार्रवाई की नीतियों का विस्तार करना चाहते हैं और संपत्ति के बेहतर वितरण का लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं, तो इसके लिए जिला मुख्यालयों में आर्थिक अवसर पैदा करने होंगे, केवल हैदराबाद में नहीं.

उन्हें सीमित वित्तीय संसाधनों के बीच छह गारंटी योजनाओं को भी लागू करना है, जिन पर हर साल 50,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च आता है. निष्पक्ष तरीके से मकानों का वितरण, किसानों के कर्ज की माफी और फसल बीमा जैसे मुद्दों की लागत ने बीआरएस सरकार को लगातार तीसरा कार्यकाल पाने से वंचित कर दिया था.

रेवंत रेड्डी को तेलंगाना के अल्पसंख्यक समुदाय के साथ अपने रिश्ते भी बेहतर करने होंगे. समुदाय के लोग लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि पंचायतों, नगरपालिकाओं और अन्य बोर्डों में उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला है, जबकि मुख्यमंत्री के करीबी लोगों को प्राथमिकता दी गई है.

ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस को अच्छा समर्थन मिला था क्योंकि अल्पसंख्यक समुदाय ने बड़ी संख्या में पार्टी के पक्ष में मतदान किया और बीआरएस से दूरी बना ली.

एक और चुनौती 2025 के सामाजिक-आर्थिक, शैक्षणिक, रोजगार, राजनीतिक और जाति सर्वे (SEEEPC) के नतीजों के आधार पर तेलंगाना के विकास के लिए आर्थिक रोडमैप तैयार करना होगा.

कांग्रेस ने 2023 में सत्ता में आने पर 2 लाख नौकरियां देने का वादा किया था और 60,000 से अधिक उम्मीदवार अभी भी सरकारी नौकरियों में भर्ती का इंतजार कर रहे हैं.

अंत में, रेवंत रेड्डी को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और बीआरएस के धीरे-धीरे बढ़ते प्रभाव को भी रोकना होगा. दोनों दल कांग्रेस सरकार की कथित विफलताओं और मंत्रिमंडल के अंदर मौजूद मतभेदों को मुद्दा बनाकर अपने बिखरे हुए कार्यकर्ताओं को फिर से संगठित करने की कोशिश कर रहे हैं.

राजनीतिक रूप से देखें तो कांग्रेस के लिए सबसे बेहतर स्थिति एक कमजोर और बिखरा हुआ विपक्ष हो सकता है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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