बेंगलुरु: बेंगलुरु के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज के अंदर, करीब एक दशक की मेहनत अब पूरी हुई है. मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज में जो झिझक और कलंक है, उसके बीच सावधानी से काम करते हुए दो दर्जन से ज्यादा शोधकर्ताओं ने भारत का पहला डिजिटल भंडार तैयार किया है, जिसमें मानसिक बीमारियों का डेटा है. यह अब भविष्य में रिसर्च और दवाओं में सुधार का रास्ता खोलने वाला है.
कई सालों से भारत में मानसिक स्वास्थ्य पर काम करने वाले शोधकर्ताओं को गहराई से स्थानीय अध्ययन की कमी के कारण ज्यादा तर पश्चिमी यानी कॉकसियन आबादी के डेटा पर निर्भर रहना पड़ता था. अब भारत का सबसे बड़ा मानसिक स्वास्थ्य संस्थान इस स्थिति को बदलने की कोशिश कर रहा है.
मार्च में, NIMHANS ने रोहिणी नीलेकणि सेंटर फॉर ब्रेन एंड माइंड और नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज के साथ मिलकर CALM-Brain का पहला चरण शुरू किया. यह दिमाग की बनावट और कामकाज से जुड़ा डेटा रखने वाला एक खास डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जिसमें पांच बड़ी मानसिक बीमारियों की जानकारी है.
दुनिया भर के डॉक्टर, वैज्ञानिक और मानसिक स्वास्थ्य शोधकर्ता इस डेटा का इस्तेमाल कर सकेंगे. इसमें अब तक 2000 से ज्यादा भारतीय प्रतिभागियों और 900 परिवारों का अध्ययन किया जा चुका है.
यह सभी के लिए एक अहम कदम है. यह डेटाबेस अब देश भर में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कोशिशों के लिए एक बड़ा आधार बनेगा.
न्यूरोसाइंटिस्ट्स के मुताबिक, यह केंद्रीकृत डेटा, जो आगे चलकर ओपन-सोर्स भी होगा, वैश्विक रिसर्च में भारतीय आबादी की खास पहचान भी बनाएगा.
प्रतिमा मूर्ति, जो इस प्रोजेक्ट से जुड़ी हैं, ने कहा कि अभी ज्यादातर मानसिक स्वास्थ्य अध्ययन पश्चिमी आबादी पर केंद्रित हैं. जबकि मरीज की जातीय पृष्ठभूमि, स्थानीय मौसम और सामाजिक माहौल जैसे कारक उसके लक्षणों और इलाज पर बड़ा असर डालते हैं.
उन्होंने कहा, “जब मरीज की स्थिति और इलाज पर इतने सारे स्थानीय कारकों का असर पड़ता है, तो जरूरी है कि उनकी सही हिस्सेदारी भी हो. एशियाई, खासकर भारतीय आबादी पर पर्याप्त अध्ययन नहीं हुआ है.”

डेटा चार स्तरों पर इकट्ठा किया गया. एक, मानसिक बीमारी वाले मरीज. दूसरा, उनके परिवार के सदस्य जिनमें वही या दूसरी मानसिक बीमारी हो सकती है. तीसरा, परिवार का स्वस्थ सदस्य. और चौथा, समाज के ऐसे लोग जिनका इनसे कोई संबंध नहीं है और वे स्वस्थ हैं.
जनार्दन रेड्डी ने कहा, “यह भारत में मानसिक स्वास्थ्य रिसर्च के क्षेत्र में एक अहम पहल है. इससे हमें खास तौर पर भारतीय आबादी में मानसिक बीमारियां कैसे सामने आती हैं, इसकी गहरी समझ मिलेगी. यह भविष्य की भारतीय रिसर्च के लिए बहुत जरूरी है.”
CALM-Brain प्रोजेक्ट 2015 में शुरू हुआ था, जिसका मकसद भारतीय आबादी में मानसिक बीमारियों को बेहतर समझना था.
मानसिक स्वास्थ्य पर सामाजिक झिझक
बिहार के एक 30 साल के युवक ने जब आठ साल पहले बेंगलुरु आकर नई जिंदगी शुरू की, तो उसके बड़े सपने थे. अच्छी नौकरी, कुछ साल में कार, फिर घर और परिवार.
लेकिन 2 साल के अंदर ही लंबी शिफ्ट्स और तनाव ने उसकी जिंदगी बदल दी. शहर में परिवार और दोस्तों की कमी ने हालात और खराब कर दिए.
फिर 2021 में एक बड़ा झटका लगा.
उसकी मां की कोविड-19 से अचानक मौत हो गई और वह सैकड़ों किलोमीटर दूर था, आखिरी बार मिल भी नहीं पाया.
उसने कहा, “तभी डिप्रेशन और भ्रम का पहला दौर शुरू हुआ.”
करीब एक साल बाद उसे स्किज़ोफेक्टिव डिसऑर्डर बताया गया, जिसमें व्यक्ति में स्किज़ोफ्रेनिया और बाइपोलर डिसऑर्डर दोनों के लक्षण दिखते हैं.
उसने कहा, “मुझे मानने में बहुत समय लगा कि मुझमें कुछ गलत हो सकता है. मैं आज भी अपने पूरे परिवार को अपनी बीमारी के बारे में बताने में सहज नहीं हूं. अगर यह शारीरिक बीमारी होती तो शायद अलग होता, लेकिन मानसिक बीमारियों को लेकर अब भी काफी कलंक है.”
डॉ. रेड्डी के अनुसार, मरीजों और उनके परिवार को इस रिसर्च में शामिल होने के लिए तैयार करना सबसे मुश्किल काम था.
उन्होंने कहा, “अगर मरीज मान भी जाएं, तो उनके परिवार के लोगों को, खासकर स्वस्थ लोगों को शामिल करना बहुत कठिन होता है.”
“समस्या यह है कि मानसिक स्वास्थ्य सर्वे में मरीज को कोई सीधा फायदा नहीं मिलता. दवा के ट्रायल में कम से कम इलाज का फायदा मिलने की उम्मीद होती है. यहां ऐसा कुछ नहीं होता. आपको उन्हें समझाना पड़ता है कि यह बड़े मकसद के लिए है.”
2016 में NIMHANS और NCBS की टीम ने ADBS प्रोजेक्ट के तहत चरणबद्ध तरीके से डेटा इकट्ठा करना शुरू किया.
इस प्रोजेक्ट को सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी और प्रतीक्षा ट्रस्ट ने मिलकर फंड किया. यह ट्रस्ट क्रिस गोपालकृष्णन और सुधा गोपालकृष्णन से जुड़ा है, जो भारत में ब्रेन रिसर्च और शिक्षा को बढ़ावा देता है.
CALM-Brain में फिलहाल 2000 से ज्यादा प्रतिभागियों और करीब 900 परिवारों का डेटा है.
2025 में किंग्स कॉलेज लंदन के वैज्ञानिकों के एक रिसर्च में कहा गया कि एक आदर्श लंबी अवधि के मानसिक स्वास्थ्य अध्ययन में शुरुआत में कम से कम 8000 प्रतिभागी होने चाहिए. इसमें 14 से 30 साल के लोगों का डेटा होना चाहिए और शुरुआती तीन साल तक डेटा इकट्ठा किया जाना चाहिए.
ग्लोबल लेवल पर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के 2025 ग्लोबल फ्लोरिशिंग स्टडी में 22 देशों के 2 लाख लोगों को शामिल किया गया था. भारत के इस अध्ययन में 2000 मरीज और उनके परिवार शामिल हैं, जो 8000 प्रतिभागियों की सिफारिश से ज्यादा है.

काम
शुरुआती दौर में, डेटा रिपॉजिटरी मुख्य रूप से पांच साइकेट्रिक डिसऑर्डर पर फोकस करती है—एडिक्शन, बाइपोलर डिसऑर्डर, डिमेंशिया, ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर (OCD) और सिज़ोफ्रेनिया.
शोधकर्ताओं ने कहा कि इन बीमारियों को इसलिए चुना गया क्योंकि ये भारतीय आबादी में तेजी से बढ़ रही हैं. इनमें से कई बीमारियां पहले पारंपरिक रूप से मानसिक बीमारी नहीं मानी जाती थीं, लेकिन अब दुनिया भर में इन्हें इसी तरह माना जा रहा है.
उदाहरण के तौर पर, लत—जिसे क्लिनिकली सब्सटेंस यूज डिसऑर्डर (SUD) कहा जाता है—अब एक लंबी चलने वाली मानसिक बीमारी मानी जाती है, जो शराब या ड्रग्स के बार-बार इस्तेमाल से होती है.
डिमेंशिया को भले ही पहले मानसिक बीमारी नहीं माना जाता था, लेकिन इसमें अक्सर डिप्रेशन, चिंता और भ्रम जैसे मानसिक लक्षण दिखते हैं. यह दिमाग की एक बीमारी है, जिसमें याददाश्त धीरे-धीरे कम होती है, सोचने-समझने की क्षमता घटती है और व्यवहार में बदलाव आता है.
इतने बड़े डेटा और विस्तार से किए गए इस रिसर्च से अहम न्यूरो-कॉग्निटिव बायोमार्कर पहचानने में मदद मिलेगी, मानसिक बीमारियों की जल्दी पहचान हो सकेगी और आगे चलकर खास इलाज विकसित किए जा सकेंगे.
इस अध्ययन में शामिल लोगों को इन बीमारियों में से कम से कम एक गंभीर रूप में था.
यह प्रक्रिया सिर्फ सवाल-जवाब तक सीमित नहीं है.
शोधकर्ताओं ने बताया कि सर्वे पूरी तरह गोपनीय था, लेकिन इसे इस तरह बनाया गया कि मरीजों और उनके परिवारों के कई पहलुओं और अनुभवों को समझा जा सके, साथ ही उनकी जेनेटिक प्रवृत्ति की भी जांच हो सके.
इस सर्वे में तकनीक का भी इस्तेमाल हुआ, जैसे फंक्शनल मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग (fMRI)—यह बिना शरीर को नुकसान पहुंचाए दिमाग की गतिविधि को मापता है और खून में ऑक्सीजन के बदलाव के जरिए काम करता है. नियर इंफ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी (NIRS)—यह एक लाइट आधारित तकनीक है, जो टिशू में ऑक्सीजन की मात्रा मापती है. और इलेक्ट्रोएन्सेफेलोग्राम (EEG)—यह सिर पर छोटे सेंसर लगाकर दिमाग की इलेक्ट्रिकल गतिविधि को रिकॉर्ड करता है. इन सबके जरिए प्रतिभागियों के दिमाग की बारीक गतिविधियों का अध्ययन किया गया.
इस विश्लेषण में सोचने-समझने की क्षमता, आंखों की गतिविधि, खून के सैंपल से जेनेटिक टेस्ट और विस्तार से क्लिनिकल जांच भी शामिल थी.
यह डेटा एक बायो-रिपॉजिटरी से भी जुड़ा है, जिसमें स्टेम सेल रखे गए हैं. इससे आगे चलकर मानसिक बीमारियों की जड़ समझने के लिए और रिसर्च की जा सकती है.
इतने बड़े डेटा और विस्तार से किए गए इस रिसर्च से अहम न्यूरो-कॉग्निटिव बायोमार्कर पहचानने में मदद मिलेगी, मानसिक बीमारियों की जल्दी पहचान हो सकेगी और आगे चलकर खास इलाज विकसित किए जा सकेंगे.
डॉ. मूर्ति ने कहा कि अब इस प्रोजेक्ट को लगातार चलाना बहुत जरूरी होगा.
उन्होंने कहा, “मैं कहूंगी कि यह आसान हिस्सा था. असली चुनौती अब है कि इस प्रोजेक्ट को आगे कैसे चलाया जाए. लगातार फंडिंग, अलग-अलग एजेंसियों के बीच तालमेल और समाज की भागीदारी बहुत जरूरी है, तभी इसका पूरा फायदा मिल पाएगा.”
पहले चरण में इस अध्ययन को केंद्र सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी (DBT) और रोहिणी नीलेकणि फिलैंथ्रोपीज ने मिलकर फंड किया. लेकिन क्योंकि यह लंबी अवधि का अध्ययन है, इसलिए आगे भी लगातार फंडिंग की जरूरत होगी.
इसमें शामिल संस्थान इन प्रतिभागियों को लंबे समय तक फॉलो करते रहेंगे. इससे शोधकर्ताओं को समय के साथ उनके लक्षणों और दवाओं के असर को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलेगी.
वैश्विक प्रतिनिधित्व की कमी
एक दशक से ज्यादा समय तक सीनियर डॉक्टर, रेजिडेंट डॉक्टर, नर्स और वॉलंटियर्स ने लगातार मेहनत की. टीम ने प्रतिभागियों को ढूंढने, परिवारों को समझाने, लंबा सर्वे करने और हाई-टेक टेस्ट करने में काफी मेहनत की.
जांच की प्रक्रिया बार-बार और बहुत ध्यान से की गई. हर कदम पर संवेदनशीलता और सटीकता रखी गई. यह काम इतना अहम था कि इसे छोड़ा नहीं जा सकता था. टीम जानती थी कि उनका काम हजारों परिवारों की जिंदगी बदल सकता है, जो मानसिक बीमारियों से जूझ रहे हैं—उन्हें बेहतर इलाज और सम्मान के साथ जीवन मिल सकता है.
एक दशक से ज़्यादा समय तक, सीनियर कंसल्टेंट्स, रेजिडेंट डॉक्टरों, नर्सों और वॉलंटियर्स ने बिना थके काम किया. टीम ने पार्टिसिपेंट्स को पहचानने, परिवारों को मनाने और काउंसलिंग करने, लंबे सर्वे करने और हाई-टेक टेस्ट करने जैसे मुश्किल प्रोसेस से गुज़रा है.
एक नर्स ने कहा, “हम रोज सैकड़ों मरीजों को यहां आते देखते हैं. सिर्फ मरीज ही नहीं, पूरा परिवार इस बीमारी से लड़ता है.”
2020 के दि लैंसेट के एक अध्ययन में बताया गया कि मानसिक बीमारियां दुनिया भर के कुल रोगों का करीब 5.2 प्रतिशत हिस्सा हैं. इसमें सिर्फ डिप्रेशन 6.2 प्रतिशत और चिंता 4.7 प्रतिशत है.
भारत में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है. 2015-16 के नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे के मुताबिक, भारत में करीब 10.6 प्रतिशत वयस्क—यानी हर 100 में से लगभग 11 लोग—किसी न किसी मानसिक बीमारी से जूझ रहे थे.
डेटा के अनुसार, भारत में जीवन के किसी न किसी समय पर मानसिक बीमारी का प्रतिशत 13.7 है. यानी हर 100 में से करीब 14 लोगों को कभी न कभी मानसिक बीमारी हुई है.
शोधकर्ता इस काम को गर्व के साथ देखते हैं और उम्मीद करते हैं कि इसे आगे बढ़ाने के लिए जरूरी संसाधन मिलेंगे.
डॉ. मूर्ति ने कहा कि अब इस प्रोजेक्ट को लगातार आर्थिक मदद और समाज की स्वीकार्यता की जरूरत है.
उन्होंने कहा, “इस प्रोजेक्ट को पैसे की जरूरत तो है ही, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है एक संवेदनशील समाज बनाना. हमें मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता बढ़ानी होगी. सभी को मिलकर काम करना होगा.”
डॉ. मूर्ति ने कहा, “सर्वे करना आसान था. असली मुश्किल अब शुरू होती है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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