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Sunday, 3 May, 2026
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गर्भपात मामलों में SC की जस्टिस नागरत्ना का रुख—महिला की चॉइस सबसे ऊपर

नाबालिग रेप सर्वाइवर्स के लेट टर्मिनेशन से लेकर मेंटल हेल्थ के आधार पर अबॉर्शन के अधिकार को बनाए रखने तक, SC की अकेली महिला जज ने बार-बार बॉडी ऑटोनॉमी के पक्ष में फैसला सुनाया है.

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नई दिल्ली: बी.वी. नागरत्ना, जो सुप्रीम कोर्ट की अकेली महिला जज हैं, ने सुप्रीम कोर्ट में आने के बाद बार-बार मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी के मामलों में ऐसा कानूनी रुख अपनाया है जिसमें महिला के शरीर पर उसके अधिकार को सबसे ऊपर रखा गया है.

इन मामलों में 26 हफ्ते की गर्भावस्था वाला एक ऐसा केस भी शामिल है जिसमें उनका फैसला अलग रहा, नाबालिग रेप पीड़िताओं के देर से गर्भपात के कई मामले, और कम से कम एक मामला जिसमें उन्होंने हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए मानसिक स्वास्थ्य के आधार पर गर्भपात की अनुमति दी.

इन सभी मामलों में उनकी सोच एक जैसी रही. उन्होंने माना कि मानसिक आघात और जीवन के अवसरों पर असर, शारीरिक खतरे जितना ही महत्वपूर्ण है. भ्रूण के जीवित रहने की संभावना महिला के अधिकारों से ऊपर नहीं है. और अदालत किसी महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर नहीं कर सकती.

इस सोच की सबसे ताजा परीक्षा 24 अप्रैल को हुई, जब जस्टिस नागरथना और उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने 15 साल की नाबालिग को 28 हफ्ते का गर्भ खत्म करने की अनुमति दी.

भारत में कुछ मामलों में, जैसे रेप पीड़िता, रिश्तेदारी में शोषण, नाबालिग या दिव्यांग महिला के मामले में, 24 हफ्ते तक गर्भपात की अनुमति है.

इस मामले में AIIMS की मेडिकल बोर्ड ने गर्भपात का विरोध किया था. उसने कहा था कि इससे समय से पहले बच्चे का जन्म हो सकता है जिसे गहन देखभाल की जरूरत पड़ेगी.

लेकिन दो जजों की बेंच इस बात से सहमत नहीं हुई. उसने कहा कि कोई भी अदालत किसी महिला, खासकर नाबालिग, को गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर नहीं कर सकती. निर्णय लेने का अधिकार सबसे अहम है.

इसके बाद AIIMS ने इस हफ्ते पुनर्विचार याचिका दायर की, जिसमें देर से गर्भपात और भ्रूण के जीवित रहने को लेकर नैतिक चिंताएं जताई गईं. बेंच ने इसमें दखल देने से मना कर दिया.

जब AIIMS ने क्यूरेटिव याचिका दायर की, तो मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने मामले को दोबारा खोलने से मना कर दिया और कहा कि “व्यक्ति की पसंद संस्था की पसंद से ऊपर होनी चाहिए”.

जस्टिस नागरथना 2021 में सुप्रीम कोर्ट में आई थीं. 2027 में वह भारत की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनने वाली हैं, हालांकि उनका कार्यकाल सिर्फ एक महीने से थोड़ा ज्यादा होगा.

फरवरी 2026: गोद लेना विकल्प नहीं

एक महीने पहले, जस्टिस नागरथना और भुयान ने दखल दिया जब बॉम्बे हाई कोर्ट ने 30 हफ्ते की गर्भवती नाबालिग रेप पीड़िता को गर्भपात की अनुमति देने से मना कर दिया था.

हाई कोर्ट ने भ्रूण के जीवित रहने और गोद लेने की संभावना का हवाला दिया था.

इस मामले में बनी मेडिकल बोर्ड ने कहा था कि भ्रूण में कोई खराबी नहीं है और गर्भपात संभव है, लेकिन यह भी कहा कि मुंबई के अस्पताल में जरूरी विशेषज्ञता नहीं है और गर्भपात की अनुमति देने पर समय से पहले डिलीवरी का खतरा है.

महिला ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया.

दो जजों की बेंच ने गर्भपात की अनुमति दी और साफ कहा कि अगर महिला गर्भ जारी नहीं रखना चाहती, तो “गोद लेना” विकल्प नहीं हो सकता.

अदालत ने कहा कि नाबालिग को गर्भ पूरा करने के लिए मजबूर करना गंभीर मानसिक और शारीरिक आघात देगा. फैसले में कहा गया कि गर्भपात का अधिकार शरीर पर अधिकार और संविधान के अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) से जुड़ा है.

अप्रैल 2024: 24 हफ्ते की सीमा अंतिम है, शुरुआत नहीं

दो साल पहले, जस्टिस नागरथना वाली बेंच ने 15 साल की लड़की को 30 हफ्ते का गर्भ खत्म करने की अनुमति दी थी और कहा था कि नाबालिग को गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर करना उसके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है.

2024 के दूसरे फैसलों में भी, जस्टिस नागरथना वाली बेंच ने साफ किया कि मेडिकल बोर्ड सिर्फ इस आधार पर गर्भपात से मना नहीं कर सकते कि गर्भ 24 हफ्ते से ज्यादा है. उन्हें महिला के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर असर को देखना होगा.

अक्टूबर 2023: अलग-अलग फैसला

जस्टिस नागरथना के फैसलों में एक अहम मोड़ अक्टूबर 2023 में आया, जब उन्होंने और एक अन्य जज ने 26 हफ्ते की गर्भावस्था वाले मामले में अलग-अलग फैसला दिया, जिसे बाद में तीन जजों की बेंच को भेजा गया.

याचिकाकर्ता दो बच्चों की मां थी. AIIMS मेडिकल बोर्ड ने कहा था कि भ्रूण के बचने की संभावना ज्यादा है और यह सवाल उठाया था कि यह गर्भपात होगा या समय से पहले डिलीवरी.

जस्टिस नागरथना ने कहा कि किसी महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर करना उसके अधिकारों का उल्लंघन है, चाहे इसे “प्रीटर्म डिलीवरी” कहा जाए या गर्भपात.

उन्होंने कहा कि महिला का गर्भ जारी न रखने का मजबूत फैसला सम्मानित किया जाना चाहिए और मुद्दा भ्रूण के जीवित रहने का नहीं, बल्कि मां के अधिकार और परिस्थितियों का है.

उन्होंने यह भी कहा कि अगर बच्चा बच जाता है, तो राज्य उसकी जिम्मेदारी ले सकता है.

जस्टिस हिमा कोहली (अब रिटायर्ड) इससे सहमत नहीं थीं. उन्होंने कहा कि जब मेडिकल बोर्ड ने भ्रूण के बचने की संभावना बताई है, तो वह गर्भपात की अनुमति नहीं दे सकतीं.

उन्होंने माना कि महिला मानसिक परेशानी में है, लेकिन यह भी कहा कि गर्भ स्वेच्छा से हुआ था और 24 हफ्ते की सीमा पार हो चुकी थी. सिर्फ इसलिए गर्भपात की अनुमति नहीं दी जा सकती कि माता-पिता अब पीछे हट रहे हैं.

मामला तीन जजों की बेंच को भेजा गया, जिसने आखिर में भ्रूण के जीवित रहने के आधार पर गर्भपात की अनुमति नहीं दी और AIIMS को बच्चे की सुरक्षित डिलीवरी कराने का निर्देश दिया.

उसी साल, जस्टिस नागरथना और भुयान की बेंच ने एक ऐसे मामले पर भी फैसला दिया जिसमें महिला 25 हफ्ते से ज्यादा गर्भवती थी और उसने शारीरिक व मानसिक नुकसान के आधार पर गर्भपात की मांग की थी. डॉक्टरों ने उसे इसके लिए फिट बताया था. बेंच ने हाई कोर्ट का फैसला पलटते हुए गर्भपात की अनुमति दी और कहा कि बिना राज्य के हस्तक्षेप के प्रजनन से जुड़े फैसले मानव गरिमा का अहम हिस्सा हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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