नई दिल्ली: भारत में जो कपल इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) चुनते हैं, वे अब यह जान सकते हैं कि उनके किस एम्ब्रियो (भ्रूण) में दिल की बीमारी, डायबिटीज या अल्जाइमर का जोखिम हो सकता है—यह सब कई साल या दशकों पहले, जब ये बीमारियां सामने भी नहीं आई हों.
यह कोई पक्का निदान नहीं होगा. यह सिर्फ संभावना होगी.
इस संख्या को पॉलीजेनिक रिस्क स्कोर (PRS) कहा जाता है. यह एम्ब्रियो के DNA में जेनेटिक बदलावों का विश्लेषण करके, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से निकाला जाता है. यह भारत के फर्टिलिटी सेक्टर में हो रहे बड़े बदलाव को दिखाता है.
2026 की शुरुआत तक, देश में कम से कम छह बड़े फर्टिलिटी नेटवर्क और कई क्षेत्रीय क्लीनिक अपने IVF सर्विस में AI टूल्स इस्तेमाल करने लगे हैं. ये टूल दो तरह के हैं. एक, जो स्पर्म या एम्ब्रियो की तस्वीरों को देखकर यह अंदाजा लगाते हैं कि गर्भ ठहरेगा या नहीं. दूसरे, जो DNA का अध्ययन करके बच्चे में बीमारी का जोखिम बताते हैं.
न्यूयॉर्क की स्टार्टअप न्यूक्लियस जीनोमिक्स ने मार्च में इंदिरा IVF के साथ साझेदारी की. यह भारत की सबसे बड़ी फर्टिलिटी सेवा देने वाली संस्था है, जिसकी शुरुआत राजस्थान के उदयपुर में हुई थी. यह एम्ब्रियो स्तर पर पॉलीजेनिक स्क्रीनिंग की सुविधा दे रही है. इंडिरा IVF के देशभर में करीब 160 क्लीनिक हैं और यह हर साल लगभग 42,000 IVF साइकिल करती है.
इसके बाद, दिल्ली की Gaudium IVF ने यूके की IVF 2.0 के साथ समझौता किया और दो इमेज आधारित टूल—ERICA (एम्ब्रियो रैंकिंग इंटेलिजेंट क्लासिफिकेशन असिस्टेंट) और SiD (स्पर्म आइडेंटिफिकेशन डिवाइस)—लागू किए.
दिल्ली स्थित नोवा IVF फर्टिलिटी ने दक्षिण कोरिया के काई हेल्थ द्वारा AI भ्रूण मूल्यांकन प्रणाली वीटा एम्ब्रियो को 65 भारतीय शहरों में 120 क्लीनिकों में शुरू किया.
इसका व्यावसायिक कारण साफ है. 2024 में भारत का IVF बाजार 961 मिलियन डॉलर का था और 2030 तक इसके 1.49 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. इसके पीछे देर से माता-पिता बनना, बांझपन के बढ़ते मामले और मध्यवर्ग का अपनी जेब से खर्च करने की बढ़ती तैयारी है, ऐसा मार्केट रिसर्च फर्म Techsci Research ने बताया. संयुक्त राष्ट्र की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में करीब 2.75 करोड़ कपल बांझपन की समस्या से जूझ रहे हैं.
लेकिन इस तेजी से बढ़ते फर्टिलिटी सेक्टर में खासकर DNA आधारित जांच को लेकर क्लिनिकल, नैतिक और कानूनी सवाल अब भी पूरी तरह साफ नहीं हैं.
AI एम्ब्रियो चुनने में कैसे मदद करता है
जब कोई कपल IVF कराता है, तो डॉक्टर अंडाशय को कई अंडे बनाने के लिए तैयार करते हैं, उन्हें लैब में निषेचित करते हैं और फिर तय करते हैं कि कौन सा एम्ब्रियो गर्भाशय में डाला जाए. हर एम्ब्रियो सफल नहीं होता, और यह तय करना कि कौन सा सफल होगा, फर्टिलिटी इलाज की सबसे बड़ी चुनौती है.
AIIMS, नई दिल्ली की डॉक्टर जुही भारती ने कहा कि अब AI का इस्तेमाल हर स्टेज पर हो रहा है—एम्ब्रियो चयन, भविष्यवाणी मॉडल और स्पर्म जांच में—ताकि IVF का परिणाम बेहतर हो.
उन्होंने कहा, “पहले हम माइक्रोस्कोप से एम्ब्रियो देखते थे या जेनेटिक टेस्ट करते थे. लेकिन AI ऐसे कई पहलुओं का विश्लेषण कर सकता है, जो इंसान के लिए मुश्किल है.”
एक अहम तकनीक टाइम-लैप्स इमेजिंग है, जो एम्ब्रियो के विकास की लगातार तस्वीरें लेती है. इसमें एम्ब्रियो का आकार (मॉर्फोलॉजी) और उसके बढ़ने की गति (मॉर्फोकाइनेटिक्स) दोनों का विश्लेषण होता है. इन सबको एल्गोरिदम के साथ मिलाकर AI यह पहचानने में मदद करता है कि कौन सा एम्ब्रियो सबसे ज्यादा सफल हो सकता है.
डॉ. भारती ने कहा, “इनवेसिव जेनेटिक टेस्टिंग के बजाय, जो हमेशा उपलब्ध नहीं होती और इससे एम्ब्रियो को नुकसान भी हो सकता है, यह एक गैर-इनवेसिव तरीका है. टाइम-लैप्स तकनीक से हम तय करते हैं कि कौन सा एम्ब्रियो सबसे बेहतर है.”
ERICA सिस्टम, जिसे इस अप्रैल Gaudium IVF ने शुरू किया, पुराने बड़े डेटा से तुलना करके एम्ब्रियो को रैंक करता है. वहीं SiD स्पर्म के लिए ऐसा ही काम करता है, माइक्रोस्कोप में उसकी गति देखकर सबसे बेहतर स्पर्म चुनता है.
गॉडियम IVF की संस्थापक और मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. मनिका खन्ना ने इन टूल्स के दायरे के बारे में बिल्कुल साफ़-साफ़ बताया. उन्होंने कहा, “यह आपको बताता है कि गर्भ के अंदर इम्प्लांट होने के लिहाज़ से भ्रूण कितना स्वस्थ होगा.”
उन्होंने कहा, “यह टूल हरी आंखों या गोरी त्वचा वाले बच्चे नहीं बना सकते. यह सिर्फ यह बताते हैं कि जो एम्ब्रियो आपने बनाए हैं, उनमें से कौन सबसे ज्यादा सफल गर्भ दे सकता है.”
अभी Gaudium ERICA की लागत खुद उठा रहा है. “हम ज्यादा से ज्यादा सफल गर्भ चाहते हैं. इसलिए हम मरीज पर खर्च का बोझ नहीं डालना चाहते,” डॉ. खन्ना ने कहा.
पॉलीजेनिक रिस्क स्कोर क्या मापता है
उम्र बढ़ने के साथ सही एम्ब्रियो चुनना और भी जरूरी हो जाता है. एक स्वस्थ मानव कोशिका में 46 क्रोमोसोम होते हैं—23 जोड़े. इनमें थोड़ी सी गड़बड़ी भी एम्ब्रियो को असफल बना सकती है, जिससे गर्भ ठहरने में दिक्कत या गर्भपात हो सकता है.
क्षितिज मुर्दिया ने कहा, “30 से 35 साल के बीच करीब 60 प्रतिशत एम्ब्रियो सामान्य होते हैं. 42 साल की उम्र में यह घटकर 20-25 प्रतिशत रह जाता है.”
उन्होंने कहा, “जितनी ज्यादा उम्र होती है, सही एम्ब्रियो ढूंढना उतना मुश्किल हो जाता है.”
इसके लिए पहले से PGT-A (क्रोमोसोम की जांच) और PGT-M (एक जीन से जुड़ी बीमारियों की जांच) जैसे तरीके हैं. इनमें एम्ब्रियो से कोशिकाएं निकालकर लैब में जांच की जाती है.
अब एक नया तरीका सामने आ रहा है—पॉलीजेनिक रिस्क स्कोर.
यह पहले के तरीकों से अलग है. इसमें किसी एक जीन की खराबी नहीं, बल्कि पूरे DNA में फैले छोटे-छोटे बदलावों से बीमारी का जोखिम मापा जाता है.
हर जेनेटिक बदलाव को उसके असर के आधार पर एक वजन दिया जाता है. इन्हें मिलाकर एक स्कोर बनता है, जो बताता है कि किसी व्यक्ति में बीमारी का खतरा कितना है. यह कोई पक्का निदान नहीं है, बल्कि तुलना के आधार पर जोखिम दिखाता है.
यह विचार नया नहीं है. PRS पहली बार 2007 के आसपास रिसर्च में इस्तेमाल हुआ था. IVF में इसका उपयोग 2019 के आसपास शुरू हुआ.
कियान सादेघी ने बताया, “हम लाखों लोगों के जेनेटिक डेटा का विश्लेषण करते हैं, जिसमें दक्षिण एशियाई लोगों का भी अच्छा डेटा शामिल है.”
उन्होंने कहा, “बीमार और स्वस्थ लोगों की तुलना करके और उम्र, लिंग और वंश को ध्यान में रखकर हम ऐसे जेनेटिक बदलाव पहचानते हैं, जो बीमारी से जुड़े होते हैं.”
“इन संकेतों को मिलाकर एक स्कोर बनता है, जो बताता है कि एम्ब्रियो में अल्जाइमर, ब्रेस्ट कैंसर या टाइप 2 डायबिटीज का खतरा कितना है,” उन्होंने कहा.
उन्होंने कहा, “एम्ब्रियो का DNA और बड़े इंसान का DNA एक जैसा होता है. इसलिए इससे भविष्य की बीमारी का अंदाजा लगाया जा सकता है.”
इंडिरा IVF के मुरदिया ने कहा कि यह तरीका हर किसी को नहीं दिया जाता.
उन्होंने कहा, “पहले माता-पिता की जांच की जाती है. अगर उनमें किसी बीमारी का खतरा ज्यादा होता है, तभी एम्ब्रियो की जांच की जाती है.”
इंडिरा IVF में एक IVF साइकिल की लागत 1.8 लाख से 2.5 लाख रुपये है. अगर इसमें जेनेटिक जांच जोड़ी जाए, तो हर साइकिल पर 2-3 लाख रुपये और खर्च बढ़ जाता है. भारत में कई परिवारों के लिए सिर्फ IVF ही पहले से महंगा है.

एक संख्या की सीमाएं
पॉलीजेनिक रिस्क स्कोर (PRS) अपनी प्रकृति में केवल संभावना पर आधारित होते हैं, यह कोई पूरी तरह पक्का विज्ञान नहीं है.
कियान सादेघी ने इसे माना और कहा, “कोई भी जेनेटिक्स कंपनी यह नहीं कह सकती कि हम बीमारी की बिल्कुल सही भविष्यवाणी कर सकते हैं. जैसे स्किन कैंसर में जेनेटिक कारण कम और पर्यावरण का असर ज्यादा होता है.”
दिल की बीमारी या टाइप 2 डायबिटीज जैसे मामलों में, उन्होंने कहा कि जेनेटिक योगदान 50 प्रतिशत तक हो सकता है. बाकी आधा—खानपान, व्यायाम और किस्मत—मॉडल के बाहर रहता है.
PRS को लेकर वैज्ञानिकों का शक सिर्फ संभावना वाले आंकड़ों तक सीमित नहीं है. IVF में इसके इस्तेमाल से जुड़ी एक बड़ी संरचनात्मक समस्या है. ये स्कोर अलग-अलग लोगों के बड़े डेटा की तुलना करके बनाए जाते हैं.
लेकिन जब इन्हें एक ही कपल के एम्ब्रियो पर लागू किया जाता है, तो उनमें अंतर बहुत कम होता है, क्योंकि सबका DNA उन्हीं दो माता-पिता से आता है. इसलिए जहां इनकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है—एक ही कपल के एम्ब्रियो में फर्क करने के लिए—वहीं ये कम भरोसेमंद हो जाते हैं.
न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ़ मेडिसिन में 2021 में छपे एक पेपर, जिसका टाइटल था ‘एम्ब्रियो को चुनने के लिए पॉलीजेनिक स्कोर इस्तेमाल करने में आने वाली दिक्कतें’, ने इसे मैथमेटिकल शब्दों में बताया.
इसके बाद विशेषज्ञों की राय भी इसी दिशा में मजबूत हुई. दिसंबर 2025 में अमेरिकन सोसाइटी फॉर रिप्रोडक्टिव मेडिसिन ने एक रिपोर्ट में कहा कि पॉलीजेनिक एम्ब्रियो स्क्रीनिंग अभी क्लिनिकल इस्तेमाल के लिए तैयार नहीं है और इसे प्रजनन सेवा के रूप में नहीं दिया जाना चाहिए. इसका कारण अनिश्चित भविष्यवाणी और गंभीर नैतिक सवाल बताए गए.
अमेरिकन कॉलेज ऑफ मेडिकल जेनेटिक्स एंड जीनोमिक्स ने भी 2024 में ऐसा ही कहा था कि इस तरह की जांच से बीमारी कम करने का कोई ठोस सबूत नहीं है.
सबाइन कपासी ने कहा, “मैं माता-पिता और उनके लाइफस्टाइल के आधार पर भी जोखिम का अनुमान दे सकती हूं, जो शायद लगभग उतना ही सटीक होगा.”
उन्होंने, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी संस्थाओं के साथ काम कर चुकी हैं, कहा कि ये तकनीक डेटा के पैटर्न पर आधारित है, न कि सीधे कारण-परिणाम के संबंध पर. “पॉलीजेनिक स्कोर बड़े डेटा के आधार पर संभावना बताते हैं. कुछ जेनेटिक संकेत सही साबित हुए हैं, लेकिन कई मामलों में अभी और सबूत की जरूरत है.”
उन्होंने इसकी उपयोगिता पर भी सवाल उठाया. “असल सवाल यह है कि क्या इससे इलाज या जोखिम कम करने में सच में मदद मिलती है. नहीं तो यह बिना फायदा के जटिलता बढ़ा सकता है.”
ऋषिकेश पाई ने भी कहा, “अभी इसे रिसर्च के रूप में देखना चाहिए, न कि सामान्य इलाज के रूप में. यह पारंपरिक तरीकों की जगह नहीं ले सकता. सही काउंसलिंग और पारदर्शिता जरूरी है.”

कानून, डेटा और नियमों से जुड़े सवाल
भारत का सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी अधिनियम 2021 सिर्फ उन्हीं मामलों में जेनेटिक जांच की अनुमति देता है, जहां पहले से कोई आनुवंशिक बीमारी हो. विशेषज्ञ कहते हैं कि यह कानून खासकर एक जीन से जुड़ी बीमारियों को ध्यान में रखकर बनाया गया था.
इंडिरा IVF के मुरदिया ने कहा कि PRS इस कानून के अनुरूप है.
लेकिन वकील बिप्लब लेनिन ने कहा कि इसमें एक टकराव है. “कानून के अनुसार, एम्ब्रियो में मौजूद जेनेटिक दोष की पहचान की जा सकती है. लेकिन भविष्य की संभावना के आधार पर भविष्यवाणी इसमें शामिल नहीं है.”
उन्होंने कहा कि “जांच का उद्देश्य यह नहीं होना चाहिए कि भविष्य में बीमारी होगी या नहीं, बल्कि यह देखना चाहिए कि अभी कोई समस्या है या नहीं.”
राधिका थापर बहल ने भी कहा कि सिर्फ पहले से मौजूद बीमारी के मामलों में ही ऐसी जांच की अनुमति है.
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अगर AI और डॉक्टर की राय अलग हो जाए तो क्या होगा. “अगर डॉक्टर एक एम्ब्रियो चुनता है और AI दूसरा, तो फैसला कौन करेगा? मरीज को यह साफ-साफ बताया जाना चाहिए.”
उन्होंने यह भी कहा कि अगर मरीज को पहले पूरी जानकारी नहीं दी गई, तो बाद में वह शिकायत नहीं कर सकता.
मुरदिया ने माना कि यह समझाना मुश्किल है. “डेटा जटिल है, लेकिन अंतिम रिपोर्ट सरल होती है, जिसे डॉक्टर और मरीज दोनों समझ सकते हैं.”
कानूनी विशेषज्ञों ने डेटा को लेकर भी चिंता जताई. ज्यादातर जेनेटिक डेटा यूरोपीय लोगों पर आधारित है, जिससे दक्षिण एशियाई लोगों पर इसकी सटीकता पर सवाल उठते हैं.
Gaudium IVF ने कहा कि वह भारतीय मरीजों के डेटा से अपने सिस्टम को बेहतर बना रहा है.
लेनिन ने कहा कि भविष्य में इसके कानूनी असर होंगे. “डेटा सुरक्षा कानून नए हैं, AI भी विकसित हो रहा है. इसमें सहमति बहुत जरूरी होगी.”
मुरदिया ने कहा कि सभी नियमों का पालन किया जा रहा है. “डेटा देश के बाहर नहीं जाता. हम नियमों का पूरी तरह पालन करते हैं.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: नीलगिरि में जंगल की आग का सिलसिला क्यों नहीं थम रहा? पिछले सालों का पैटर्न और वजहें