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Saturday, 2 May, 2026
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नीलगिरि में जंगल की आग का सिलसिला क्यों नहीं थम रहा? पिछले सालों का पैटर्न और वजहें

नीलगिरि में अब तक की सबसे बड़ी जंगल की आग में से एक के खिलाफ लड़ाई तब शुरू हुई, जब 11 अप्रैल को पाइकारा घाटी में पहली बार आग भड़की और बाद में 15 अप्रैल तक कई पर्वतमालाओं में फैल गई.

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नीलगिरि ज़िला: नीलगिरी के पायकड़ा, पार्सन्स और सिंगारा घाटी के कुछ इलाकों में अब भी जली हुई चीज़ों की तेज़ गंध हवा में बनी हुई है. करीब दो हफ्ते तक चले मुश्किल फायरफाइटिंग ऑपरेशन के बाद जंगल की आग पर काबू पाया गया है.

पायकड़ा की जली हुई पहाड़ियों में फॉरेस्ट रेंजर आर. मंजुहासिनी सावधानी से उन खाइयों के पास चलते हैं जो फायरलाइन (यानी रणनीतिक तरीके से साफ की गई जमीन की पट्टियां) के रूप में बनाई गई थीं. वह और वन विभाग के कर्मचारी जली हुई जमीन के नीचे किसी छिपी आग के निशान को ढूंढते रहते हैं. उनके पैरों के नीचे जली हुई झाड़ियां चरमराती हैं.

अगर कहीं हल्का सा धुआं या गर्मी महसूस होती है, तो टीम तुरंत सतर्क हो जाती है. नई आग या जमीन के नीचे छिपी चिंगारियों के संकेत पर नजर रखी जा रही है. नीलगिरि में हाल के सबसे बड़े जंगल की आग से लड़ाई 11 अप्रैल को पायकड़ा घाटी में लगी पहली आग से शुरू हुई थी. 15 अप्रैल तक यह कई इलाकों में फैल गई, जिसके बाद अधिकारी दिन-रात प्रभावित जगहों का निरीक्षण करने लगे.

इस पूरे अभियान में 500 से ज्यादा वन कर्मचारी शामिल थे, जो कोयंबटूर, इरोड, सलेम, सत्यमंगलम और दूसरे जिलों से आए थे. उनके साथ छह जिला वन अधिकारी (DFO) भी थे, जिन्हें कठिन इलाकों में काम करने का अनुभव है. इसके अलावा, स्टेट डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स (SDRF) की 60 सदस्यों वाली दो टीमें, फायर और रेस्क्यू विभाग की टीमें और स्थानीय इको-डेवलपमेंट कमेटियों (EDCs) के 100 से ज्यादा सदस्य भी शामिल थे.

“पहले के छोटे-छोटे जंगल की आग के मुकाबले, जिन्हें आम तौर पर नियमित पेट्रोलिंग से संभाल लिया जाता था, इस बार की आग के लिए पूरी तरह अलग रणनीति की जरूरत पड़ी,” पायकड़ा रेंज ऑफिसर आर. मंजुहासिनी ने दिप्रिंट से कहा.

नीलगिरि में जंगल की आग कई कारणों से लगती है, जैसे बिजली की लाइनों से चिंगारी, ज्यादा तापमान, कम नमी, तेज हवाएं और कई सालों से जमा सूखी झाड़ियां और कचरा.

A trench dug up to stop the spread of forest fire in Parsons Valley, Mukurthi National Park | Shweta Tripathi | ThePrint
पार्सन्स वैली, मुकुर्थी नेशनल पार्क में जंगल की आग को फैलने से रोकने के लिए खोदी गई खाई | श्वेता त्रिपाठी | दिप्रिंट

वन विभाग के अनुसार, इस बार आग ज्यादा भयानक इसलिए हुई क्योंकि तापमान असामान्य रूप से ज्यादा था, हवा तेज थी, पहाड़ी इलाका आग को तेजी से फैलने में मदद कर रहा था, और बड़ी मात्रा में सूखी घास, झाड़ियां और ऑस्ट्रेलियन वॉटल जैसे बाहरी पेड़ों का कचरा जमा था. इसी वजह से जमीन के नीचे भी आग बनी रही.

छोटी-छोटी आग की घटनाएं जल्दी ही कई जगहों पर फैल गईं. आग ने बड़े इलाके की वनस्पति को जला दिया, खासकर सूखी झाड़ियां, शोला जंगल के किनारे और वे इलाके जहां बाहरी पौधे और कचरा ज्यादा जमा था. पायकड़ा, पार्सन्स वैली और वेनलॉक डाउन क्षेत्र में 5,000 एकड़ से ज्यादा जंगल प्रभावित हुआ.

पश्चिमी घाट का हिस्सा होने के कारण नीलगिरि पर्यावरण के लिहाज से बहुत संवेदनशील है. यहां शोला-घास के अनोखे इकोसिस्टम, जैव विविधता (जिसमें खास प्रजातियां शामिल हैं), और बाघ, हाथी और नीलगिरि तहर जैसे जानवरों का आवास है. यह इलाका पानी के स्रोत के लिए भी बहुत अहम है. यह तमिलनाडु के उत्तर-पश्चिम में फैला है और कर्नाटक और केरल तक जाता है. यहां मुदुमलाई टाइगर रिज़र्व और मुकुर्थी राष्ट्रीय उद्यान जैसे संरक्षित क्षेत्र भी हैं.

मुदुमलाई के फील्ड डायरेक्टर आर. किरुबा शंकर ने दिप्रिंट से कहा, “कई कारण थे जैसे ज्यादा तापमान, कम नमी और तेज हवाएं, जिससे सूखी वनस्पति बहुत जल्दी जलने वाली बन गई. नीलगिरि का पहाड़ी इलाका, जहां ढलान तेज हैं और हवाएं अनिश्चित होती हैं, आग को फैलाने में मदद करता है. कई सालों से जमा कचरे की वजह से जमीन के नीचे भी आग लगी रही. यह कचरा 1-2 मीटर तक जमा था क्योंकि पिछले कई सालों से कोई बड़ी आग नहीं लगी थी.”

पिछले सालों में दोहराव

1980 के दशक के अंत से लेकर 2010 तक, नीलगिरि बायोस्फियर रिजर्व में जंगल की आग की घटनाएं और जले हुए क्षेत्र कम होते गए, क्योंकि प्रबंधन बेहतर हुआ. हालांकि बीच-बीच में कुछ बढ़ोतरी भी देखी गई.

आमतौर पर फरवरी से जून के बीच आग लगती है और ये छोटे स्तर की होती हैं, जिन्हें स्थानीय स्तर पर काबू कर लिया जाता है. लेकिन 2021 में 14 आग की घटनाएं हुईं, जिनमें से आठ में वेनलॉक डाउन क्षेत्र में काफी नुकसान हुआ. बाद में बारिश से कुछ राहत मिली.

2022 में यह संख्या घटकर आठ हो गई. 2023 में यह फिर बढ़कर 25 से ज्यादा हो गई, जिनमें से 17 घटनाएं वेनलॉक डाउन क्षेत्र में हुईं.

यह बढ़त जारी रही और अप्रैल 2024 की शुरुआत तक नीलगिरि में 37 जंगल की आग की घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें मार्च में एक बड़ी घटना भी शामिल थी.

Charred logs of pine trees lying on the forest ground in Pykara | Shweta Tripathi | ThePrint
पाइकारा के जंगल में ज़मीन पर पड़े चीड़ के पेड़ों के जले हुए लट्ठे | श्वेता त्रिपाठी | दिप्रिंट

मार्च 2024 में कुन्नूर इलाके में लगी आग को बुझाने के लिए कई वन डिवीजनों से 150 से ज्यादा कर्मचारियों को तैनात करना पड़ा. यह आग एक हफ्ते से ज्यादा चली, उसके बाद जाकर काबू में आई. जमीन पर फायर-बिटिंग उपकरण और फायरलाइन बनाकर आग बुझाने की कोशिश की गई, लेकिन कठिन पहाड़ी इलाकों और ढलानों की वजह से काम मुश्किल रहा.

2024 के बाद, इस साल की आग हाल के वर्षों में सबसे बड़ी और सबसे गंभीर मानी जा रही है, जिसके लिए बहुत बड़े स्तर पर बचाव और फायरफाइटिंग ऑपरेशन चलाना पड़ा.

जमीन के नीचे आग, एक बड़ी चुनौती

इस साल आग पर काबू पाने के लिए लोगों और उपकरणों की संख्या बढ़ानी पड़ी. कई सरकारी विभाग, रेस्क्यू एजेंसियां और यहां तक कि भारतीय वायु सेना भी इसमें शामिल हुई, जिससे यह राज्य स्तर का बड़ा ऑपरेशन बन गया. हालांकि जंगल की आग पर काबू पा लिया गया था, लेकिन दोपहर के समय फिर से नई आग लगने की खबरें सामने आईं.

नीलगिरि के DFO शशांक कश्यप ने आग बुझाने में आई मुश्किलों के बारे में बताया.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “हमारे सामने दो बड़ी आग थीं. पहली 11 तारीख को पायकड़ा रेंज में लगी और हमने नहीं सोचा था कि यह इतनी तेज होगी. दूसरी कुछ दिनों बाद पार्सन्स वैली में लगी. मुदुमलाई टाइगर रिज़र्व के बफर इलाके भी प्रभावित हुए. कई जगह आग लगने से यह तेजी से अलग-अलग रेंज में फैल गई, खासकर इसलिए क्योंकि कई सालों से जमा सूखा कचरा बहुत ज्यादा था, हवा बहुत तेज थी और तापमान 28 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था, जो नीलगिरि के लिए असामान्य रूप से ज्यादा है.”

DFO ने आगे कहा कि ऊपर से आग बुझी हुई लग रही थी, लेकिन थर्मल डिटेक्टर से पता चला कि जमीन के नीचे आग जल रही है. सेस्ट्रम, यूफोटोरियम और वॉटल जैसे बाहरी पौधों के कचरे ने इस आग को बढ़ाया, जिससे जमीन खोदकर आग रोकना कर्मचारियों के लिए मुश्किल हो गया.

Water was used from Pykara dam to douse the blaze in the nearby areas | Shweta Tripathi | ThePrint
आस-पास के इलाकों में आग बुझाने के लिए पाइकारा बांध के पानी का इस्तेमाल किया गया | श्वेता त्रिपाठी | दिप्रिंट

टीमों ने कई तरीके अपनाए. फायरलाइन और खाइयां खोदी गईं, मोटर पंप और नए आधुनिक फायर रिस्पॉन्स वाहन लगाए गए, और जरूरत पड़ने पर हाथ से भी आग बुझाई गई. खासकर पार्सन्स वैली की आग को रोकने के लिए एक बड़ी फायरलाइन बनाई गई, क्योंकि यह पास के मुकुर्थी राष्ट्रीय उद्यान तक फैल सकती थी.

पायकड़ा की रेंज ऑफिसर आर. मंजुहासिनी ने कहा कि फायरलाइन के लिए खोदी गई खाइयां भी काफी नहीं थीं.

उन्होंने बताया, “फायरलाइन आमतौर पर आग को सीमित करने में मदद करती है, लेकिन जब तक हम इन्हें बना पाते, आग पहले ही फैल चुकी थी. हमें अपनी रणनीति बदलनी पड़ी और कुछ जंगल का हिस्सा छोड़कर दूर और चौड़ी फायरलाइन बनानी पड़ी ताकि आग आगे न फैले. इससे धीरे-धीरे मदद मिली, लेकिन जमीन के नीचे की आग अभी भी चुनौती है, क्योंकि ऊपर से आग दिखाई नहीं देती और नीचे कचरा जलता रहता है.”

तेज हवाओं के अलावा, पहाड़ी इलाके ने भी परेशानी बढ़ाई. एक फॉरेस्ट स्टाफ ने बताया, “ऊंचाई वाले इलाकों तक दूर-दूर से पानी पहुंचाना बहुत मुश्किल था, भले ही पास में पाइकारा झील जैसे स्रोत मौजूद थे. झील के पास वाले इलाके को जल्दी कंट्रोल कर लिया गया, लेकिन बाकी जगहों तक कई किलोमीटर पानी ले जाना चुनौती बना रहा.”

इलाके की कठिनाई को देखते हुए, जिला कलेक्टर लक्ष्मी भव्या तनेरू को पहली बार हवाई मदद मांगनी पड़ी. 25 अप्रैल को IAF के दो हेलीकॉप्टर बाम्बी बकेट के साथ कई बार उड़ान भरकर आग वाले इलाकों में पानी गिराते रहे.

DFO कश्यप ने कहा, “कुछ जगहों तक पहुंचना मुश्किल था, इसलिए हमने IAF की मदद से हवाई तरीके से आग बुझाई. पास के जलाशयों से पानी लेकर कुछ इलाकों में डाला गया.”

वन विभाग ने शाम के समय थर्मल ड्रोन से निगरानी की और एक पैटर्न देखा. रात में बुझाई गई आग अक्सर दिन में 11 बजे से 4 बजे के बीच गर्मी और हवा की वजह से फिर से जल उठती थी.

बुधवार को एक बयान में पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और वन विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव सुप्रिया साहू ने कहा कि विभाग ने चेन्नई में स्टेट फॉरेस्ट फायर कंट्रोल सेंटर और NABARD योजना के तहत आईटी सुविधा वाले जिला स्तर के कंट्रोल सेंटर बनाए हैं. ये सेंटर 24 घंटे आग के अलर्ट पर नजर रखते हैं, जिससे तुरंत कार्रवाई हो सके. नीलगिरि फॉरेस्ट डिवीजन में इस ऑपरेशन के दौरान पानी छिड़कने के लिए सात आधुनिक फायर रिस्पॉन्स वाहन लगाए गए.

सुप्रिया साहू, प्रिंसिपल चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने भी जगहों का दौरा कर यह सुनिश्चित किया कि आग पूरी तरह बुझ चुकी है. हालांकि टीमें अब भी इलाके में गश्त कर रही हैं ताकि दोबारा आग न लगे.

Forest officials clear land patches to prevent the spread of fire | By special arrangement
वन अधिकारियों ने आग फैलने से रोकने के लिए ज़मीन के कुछ हिस्सों को साफ़ किया | विशेष व्यवस्था

आग के बाद की स्थिति

अच्छी बात यह रही कि किसी इंसान या बड़े वन्यजीव की मौत की खबर नहीं आई. अधिकारियों ने देखा कि जानवरों पर ज्यादा असर नहीं पड़ा, क्योंकि वे खुद ही सुरक्षित जगहों पर चले गए.

DFO कश्यप ने कहा, “शोला जंगल के हिस्सों ने प्राकृतिक फायरब्रेक का काम किया और आग को रोक दिया. आग के कुल असर का आकलन किया जा रहा है. इंसानी बस्तियों पर कोई असर नहीं पड़ा.”

शोला इलाके की वनस्पति में पानी ज्यादा होता है, इसलिए वह आसानी से नहीं जलती.

प्रभावित इलाके की रहने वाली पद्ममा ने कहा कि आग उनके गांव तक पहुंचने वाली थी और कई रास्ते बंद कर दिए गए थे.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “हम जंगल के पास रहते हैं, इसलिए हमें डर था कि आग हमारे घर तक पहुंच जाएगी. यहां बहुत सारे जानवर हैं, लेकिन हमारे लिए कोई सुरक्षा नहीं है. हाल के समय में हमने इतनी भयानक आग नहीं देखी. अब जंगली जानवरों के गांव में आने की संभावना ज्यादा है. हम सिर्फ अपने घर के अंदर सुरक्षित हैं, बाहर नहीं.”

कंजरवेशन साइंटिस्ट ए. कुमारगुरु अरुमुगम ने कहा कि इस आपदा के पीछे इंसानी गतिविधियां भी एक कारण हो सकती हैं.

उन्होंने कहा, “चराई के लिए जमीन साफ करने या कब्जा करने के लिए भी आग लगाई जाती है. इंसान और जानवरों के बीच बढ़ते संघर्ष से भी गांव वाले नाराज रहते हैं और ऐसे तरीके अपनाते हैं. लेकिन इतनी बड़ी आग की उम्मीद नहीं थी.”

हालांकि पद्ममा ने जानबूझकर आग लगाने की बात से इनकार किया और कहा कि इससे उनकी जान को ही खतरा बढ़ता है.

अब जब ऑपरेशन आग बुझाने से हटकर नुकसान का आकलन, पुनर्वास और लगातार निगरानी पर आ गया है, तो यह जरूरी हो गया है कि भविष्य में जंगल की आग को रोकने के लिए प्रभावी रणनीति बनाई जाए.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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