जब मैंने पहली बार सुना कि चिकन टिक्का मसाला एक स्कॉटिश डिश है, तो मुझे हंसी आई, लेकिन जब मैं स्कॉटलैंड पहुंची, तो मुझे इसे ट्राई करना ही पड़ा.
1964 में शुरू हुआ शीश महल, जो ग्लासगो, स्कॉटलैंड में है, दावा करता है कि चिकन टिक्का मसाला की शुरुआत वहीं से हुई थी. इसका श्रेय शेफ अली अहमद असलम को दिया जाता है. कहानी 1960 के दशक की है: जब एक ग्राहक को चिकन टिक्का बहुत सूखा लगा, तो असलम ने उसमें क्रीमी टमाटर सॉस मिला दी और यह मशहूर डिश बन गई.
चिकन टिक्का (बिना सॉस/मसाला) बहुत अच्छा था. जब बिना मांगे मुझे एक्स्ट्रा हरी मिर्च दी गई, तो लगा कि सब सही दिशा में जा रहा है.
मैंने रेस्टोरेंट स्टाफ और एक बुजुर्ग व्यक्ति के बीच बातचीत सुनी, जिसमें उन्हें सलाह दी जा रही थी कि वह “बहुत माइल्ड” वाला वर्जन लें, जबकि मैंने तीन मिर्च वाला ऑर्डर किया था.
मेरा “एक्स्ट्रा स्पाइसी” खाना भी भारतीय मानकों के हिसाब से काफी माइल्ड निकला. इससे यह याद आया कि खाना चाहे कितना भी “ऑथेंटिक” क्यों न हो, उसे ब्रिटिश लोगों के स्वाद के हिसाब से बनाया गया है, लेकिन चिकन टिक्का मसाला स्कॉटलैंड के दूसरे खाने जैसे हैगिस, फिश एंड चिप्स या नमकीन पाई जैसा भी नहीं लगता; और न ही यह पूरी तरह देसी लगता है. यह अपनी ही तरह की डिश है, स्थानीय खाने में थोड़ा अलग रंग.
चिकन टिक्का के अलावा, भारत और स्कॉटलैंड में UNESCO वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स भी एक समान हैं.
मैं जयपुर से हूं, जिसे 2019 में UNESCO वर्ल्ड हेरिटेज सिटी का दर्जा मिला था, इसलिए मुझे एक और ऐसी जगह देखने का खास उत्साह था जिसे यह दर्जा मिला हुआ है.
एडिनबर्ग की गलियों में एक सफर
एडिनबर्ग के ओल्ड और न्यू टाउन में एक अलग ही माहौल है, जो शहर में चलते ही तुरंत महसूस हो जाता है.
ट्रेन स्टेशन से एडिनबर्ग कैसल तक की वॉक लगभग किसी फिल्म जैसी लगी—संकरी मध्यकालीन गलियां, गॉथिक आर्किटेक्चर और हर मोड़ पर इतिहास का एहसास. शहर साफ-सुथरा और पैदल चलने के लिए आसान लगा, जहां ज्यादातर लोग पैदल चलते हैं—यह राजस्थान की राजधानी के टूटे फुटपाथों से बिल्कुल अलग है, जहां गाड़ी से उतरना भी अक्सर मुश्किल होता है.
बस एक समानता दिखी—किले तक जाते रास्ते में कई स्मृति-चिह्न (सुवेनियर) की दुकानें, जो पर्यटकों को आकर्षित करती हैं, जैसे जयपुर के हवा महल के रास्ते में स्थानीय चीज़ें बेचने वाले.
अगर आप हैरी पॉटर के फैन हैं, तो एडिनबर्ग का अपना आकर्षण है—यहां जादू-टोना थीम वाली दुकानें हैं और अक्सर कहा जाता है कि इस शहर ने लेखिका जेके रोलिंग को किताबें लिखते समय प्रेरित किया.
लेकिन जो सबसे दिलचस्प लगा, वो थे यहां के लोग—गरमजोशी से भरे, स्वागत करने वाले और बातचीत के लिए खुले. यह उस छवि से बिल्कुल अलग था कि स्कॉटलैंड के लोग दूर या ठंडे स्वभाव के होते हैं. कुछ मायनों में यह मुझे अपने घर जैसा लगा.
साथ ही, कुछ फर्क भी थे. यहां कोई आक्रामक दुकानदार नहीं था जो जबरदस्ती कुछ खरीदने के लिए कहे. इसके बजाय, आप आराम से दुकान में जा सकते हैं, देख सकते हैं और अपना समय ले सकते हैं.
दुनिया भर से लोग, जिनमें मैं भी शामिल हूं, इस UNESCO हेरिटेज साइट की ओर आकर्षित होते हैं. मुझे उम्मीद नहीं थी कि 600 साल पुराना किला इतनी अच्छी हालत में होगा. इसलिए समझ आता है कि यह ब्रिटेन के सबसे ज्यादा देखे जाने वाले किलों में से एक क्यों है.
फिर भी, यह सब देखते हुए मुझे अपने घर की याद आई. हवा महल पर जाकर दीवारों पर लोगों के नाम लिखे देखना, साफ चेतावनी के बावजूद. छोटी-छोटी जगहों पर पान के दाग. यह फर्क नज़रअंदाज़ करना मुश्किल था.
हम राष्ट्रवाद और समाज की बात करते हैं, लेकिन इन शब्दों का क्या मतलब है, अगर यह इस बात में नहीं दिखता कि हम अपनी चीज़ों—अपनी विरासत, अपने आस-पास और अपनी साझा जगहों—के साथ कैसा व्यवहार करते हैं?
इसी बीच, मुझे पता चला कि UNESCO ने जयपुर के वर्ल्ड हेरिटेज स्टेटस पर दोबारा विचार करने की चेतावनी दी है. अगर यह दर्जा भी हमें अपनी चीज़ों को बचाने के लिए प्रेरित नहीं करता, तो फिर क्या करेगा?
जयपुर अकेला शहर नहीं है जो इस समस्या से जूझ रहा है. अहमदाबाद भी UNESCO की नज़र में है. कारण लगभग एक जैसे हैं—अनियंत्रित विकास, नई इमारतें, शहर के अंदर और बाहर विस्तार. समय के साथ जयपुर में करीब 400 ऐतिहासिक हवेलियां और कई अन्य संरचनाएं तोड़ी जा चुकी हैं.
यह साफ है कि हमारी विरासत को बचाने में सरकार कहीं न कहीं पीछे रह रही है. केंद्र और राज्य सरकार—दोनों की तरफ से कोई साफ और लगातार कोशिश नहीं दिखती.
क्या यह सच में इतना मुश्किल है? दूसरे देश यह काम इतनी अच्छी तरह कैसे कर रहे हैं?
स्कॉटलैंड में संरक्षण सिर्फ एक नीति नहीं है, बल्कि लोग इसे दिल से मानते हैं. ऐसे विकास के खिलाफ विरोध होता है जो नुकसानदायक माना जाता है. एडिनबर्ग सिटी काउंसिल अपनी प्लानिंग प्रक्रिया में उन प्रोजेक्ट्स को खारिज कर देती है जो “शहर के चरित्र” से मेल नहीं खाते.
यहां तक कि स्कॉटलैंड सरकार ने भी कई बार दखल दिया है, जैसे ओल्ड रॉयल हाई स्कूल को लक्ज़री होटल में बदलने के प्रस्ताव को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इससे ऐतिहासिक माहौल को नुकसान होगा.
स्कॉटलैंड की औपनिवेशिक सोच
अपनी विरासत को संभालकर रखने में स्कॉटलैंड के लोगों को जो खास खुशी मिलती है, उसके अलावा उनके इतिहास का एक और पहलू साफ दिखा. एक भारतीय होने के नाते यह अजीब लगा कि स्कॉटलैंड के लोग ईस्ट इंडिया कंपनी और भारत में ब्रिटिश साम्राज्य बनाने में कितने गहराई से शामिल थे, जबकि वे खुद भी इंग्लैंड के ताज के अधीन थे.
आज भी उसका असर दिखता है. लंदन के उलट, यहां आपको ब्रिटिश झंडा बहुत कम दिखेगा. स्कॉटलैंड की आज़ादी का विचार अब भी जिंदा है—सर्वे के मुताबिक, आबादी का एक बड़ा हिस्सा चाहता है कि स्कॉटलैंड यूनाइटेड किंगडम से अलग हो जाए.
एडिनबर्ग कैसल में घूमते हुए मैंने टीपू सुल्तान से जुड़ी चीजें देखीं—उनके हथियार और खजाने की वस्तुएं. इससे यह सवाल उठता है कि एक देश, जो खुद को कभी अंग्रेजी दबदबे के नीचे मानता था, वह भारत में औपनिवेशिक प्रोजेक्ट का हिस्सा होने को कैसे देखता है?
औपनिवेशिकता इस कहानी का हिस्सा जरूर है. एडिनबर्ग की शानदार इमारतें कम से कम कुछ हद तक भारत से निकाले गए मुनाफे से बनी हैं.
हम बार-बार सुनते आए हैं कि हमारे पास अपनी विरासत बचाने के लिए संसाधन नहीं हैं, कि उपनिवेशवाद ने हमें इतना कमजोर कर दिया कि हम ज्यादा कुछ नहीं कर सकते. लेकिन यह कहना जरूरी है: आजादी को 75 साल से ज्यादा हो चुके हैं, हम कब तक ऐसे बहाने देते रहेंगे?
इन सड़कों पर मैंने सिर्फ संसाधन नहीं, बल्कि देखभाल भी देखी. ऐसे लोग जो अपने शहर को खूबसूरत बनाए रखने की बहुत ज्यादा चिंता करते हैं—इतनी कि हर चीज को बारीकी से देखते हैं. ऐसे लोग जो समय निकालकर इस बात पर चर्चा करते हैं कि उनका शहर कैसा दिखता है, इसके लिए खड़े होते हैं, और जरूरत पड़े तो ताकतवर लोगों के खिलाफ भी जाते हैं जो इसे खराब करना चाहते हैं. ऐसे लोग जो सिर्फ अपने घर को ही सुंदर नहीं बनाना चाहते, बल्कि सबके लिए एक सुंदर सार्वजनिक जगह बनाना चाहते हैं.
मुझे नहीं लगता कि मैं चिकन टिक्का मसाला की रेसिपी अपने साथ लेकर जाऊंगी. यह चीज स्कॉटलैंड में ही अच्छी लगती है. लेकिन मैं अपने साथ यह जरूर लेकर जाऊंगी—विरासत को बचाने की सोच, उसकी देखभाल और उसके लिए कुछ करने की इच्छा. यह ऐसी चीज है जिसे हमें सिर्फ दूर से देखना नहीं, बल्कि अपने घर में अपनाना चाहिए.
आमना बेगम अंसारी एक स्तंभकार और टीवी समाचार पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय आमना एंड खालिद’ नाम से एक साप्ताहिक यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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