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Saturday, 2 May, 2026
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अर्थव्यवस्था में मुक्त उद्यम के बिना हम लोकतंत्र को बनाए नहीं रख सकते: मीनू मसानी

पेशेवर व्यक्ति, मुक्त अर्थव्यवस्था में व्यवसायी, ज़मीनदार किसान, कारीगर और स्वरोज़गार करने वाला व्यक्ति अपने पैरों पर खड़े होते हैं और सरकार से असहमत हो सकते हैं.

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मैं दो प्रमुख कारण प्रस्तुत करूंगा कि क्यों यह महत्वपूर्ण है कि मुक्त उद्यम हमारे आर्थिक जीवन का एक प्रमुख तत्व बना रहे. मेरा पहला तर्क विशुद्ध रूप से आर्थिक आधार पर है कि मुक्त उद्यम जीवन जीने का अधिक उत्पादक तरीका है. यह किसी भी अन्य प्रणाली की तुलना में अधिक लाभ प्रदान करता है. जहां तक उद्योग का संबंध है, हम तथ्यों को जानते हैं. ऐसे कई क्षेत्र हैं जहां हम इसका परीक्षण कर सकते हैं.

ब्रिटिश उदारवादी लेखक मिस्टर ग्राहम हटन ने एक अच्छा उदाहरण दिया. वे कहते हैं कि जब सरकार उत्पादन के क्षेत्र में प्रवेश करती है, तो वह आंगन में एक कुत्ते की तरह होती है—वह खुद अंडे नहीं दे सकती और मुर्गियों को अंडे देने से भी रोकती है. उद्योग में राज्य उद्यम की अक्षमता का यह अनुभव देशों को, यहां तक कि युगोस्लाविया और कुछ समय के लिए पोलैंड जैसे साम्यवादी देशों को भी, राज्य पूंजीवादी प्रणाली से दूर जाने की कोशिश करने के लिए प्रेरित कर रहा है.

युगोस्लाव लोगों ने “श्रमिक नियंत्रण” का एक सिद्धांत विकसित किया है ताकि वे सोवियत प्रकार के राज्य पूंजीवाद को समाप्त कर सकें. वे यह स्वीकार नहीं करते कि रूस किसी भी तरह से साम्यवादी या समाजवादी है. वे कहते हैं कि यह मार्क्सवाद और समाजवाद का विकृत रूप है. रूस एक बुरे प्रकार का राज्य पूंजीवाद है और इसलिए युगोस्लाव कम्युनिस्ट इस राज्यवादी ढांचे से दूर जाने की कोशिश कर रहे हैं, कारखानों को श्रमिकों को वापस देकर.

यह आंशिक रूप से सैद्धांतिक है, लेकिन एक बात होती है—उद्यम अधिक स्वायत्त हो जाता है और प्रतिस्पर्धा के नियम लागू होने लगते हैं. मैंने 1955 में प्रमुख युगोस्लाव कम्युनिस्टों से सुना है: “हमें बाजार के नियमों की ओर वापस जाना चाहिए.” और वे इस बारे में काफी स्पष्ट और कठोर हैं.

यदि आप उनसे पूछें कि क्या होगा अगर कोई जूता कारखाना अपने जूते नहीं बेच पाता, क्योंकि कीमत अधिक है या उत्पाद स्वीकार्य नहीं हैं; तो वे कहते हैं कि कारखाने को बंद होना चाहिए. उसे प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाना चाहिए क्योंकि उपभोक्ता उसके उत्पाद नहीं चाहते. उपभोक्ता की पसंद वापस आती है, न कि योजना आयोग का आदेश.

यदि आप पूछें कि मजदूरों का क्या होगा, तो वे कहते हैं कि वे बेरोजगार हो जाएंगे और उन्हें अन्य काम ढूंढना होगा. प्रबंधकों को दंडित किया जाता है—उन्हें कुछ वर्षों तक प्रबंधक बनने की अनुमति नहीं दी जाती और उन्हें वापस सामान्य काम पर भेज दिया जाता है क्योंकि उन्होंने अपने उद्यम को खराब कर दिया.

इस प्रकार, वे बाजार के नियमों की ओर लौटते हैं, वह भी एक कठोर तरीके से, यहां तक कि एक साम्यवादी अर्थव्यवस्था में भी, जब उसे राज्य पूंजीवाद की अलाभकारी प्रणाली से दूर जाने का अवसर मिलता है.

भूमि के संदर्भ में भी यह स्पष्ट है कि केवल निजी उद्यम ही परिणाम देता है और जहां भी सरकार भूमि का सामूहिकीकरण करके उसे राज्य नियंत्रण में खेती करने की कोशिश करती है, वहां उत्पादन घट जाता है. खेत जितना छोटा होता है, प्रति एकड़ उत्पादकता उतनी अधिक होती है—जो दिल्ली की प्रचलित सोच के विपरीत है.

मुझे कुछ समय पहले यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि दिल्ली के अखबारों ने बड़े गर्व के साथ यह घोषणा की कि खेत जितना बड़ा होता है, उत्पादन उतना कम होता है, मानो प्रकृति का कोई नया नियम खोज लिया गया हो. यह एक सरकारी अधिकारी के अध्ययन पर आधारित था, जिसे कृषि अनुसंधान संस्थान की ओर से जांच करने के लिए नियुक्त किया गया था, और जिसे अब कृषि मंत्रालय ने प्रकाशित किया है—जो संसद में सहकारी खेती पर हुई बहसों के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा कही गई बातों का पूर्णतः खंडन करता है.

यह एक ऐतिहासिक और सार्वभौमिक सत्य है. उदाहरण के लिए— यू.एस.एस.आर. में, जहां अत्यधिक यंत्रीकृत सामूहिक खेती होती है, उत्पादन 9.3 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है; यू.एस.ए. में, जहां बड़े निजी खेत हैं, 12.2 क्विंटल; ब्रिटेन में, जहां खेत छोटे और निजी हैं, 28.5 क्विंटल; डेनमार्क में, जहां खेत और भी छोटे हैं, 34.4 क्विंटल; और जापान में, जहां खेत बहुत छोटे हैं (आधा एकड़ से दो एकड़), 22.6 क्विंटल.

दूसरे शब्दों में, जापान—जहां खेत भारत से भी छोटे हैं—यू.एस.ए. की तुलना में दोगुना और यू.एस.एस.आर. की तुलना में ढाई गुना अधिक उत्पादन करता है. चावल के मामले में भी यही स्थिति है—यू.एस.एस.आर. में 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर यू.एस.ए. में 28.3 और जापान व फॉर्मोसा में 48.5 क्विंटल.

मेरा दूसरा कारण, कि मुक्त उद्यम का बने रहना आवश्यक है, उसके राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव हैं. यदि आर्थिक जीवन में पर्याप्त मात्रा में मुक्त उद्यम नहीं होगा, तो हम एक स्वतंत्र समाज बनाए नहीं रख सकते; हम लोकतांत्रिक संविधान या सरकार को बनाए नहीं रख सकते.

अब तक दुनिया में ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जहां राज्य सब कुछ—भूमि, कारखाने और व्यापार का मालिक हो और फिर भी वहां संसदीय लोकतंत्र या व्यक्तिगत स्वतंत्रता हो. भविष्य में शायद ऐसा हो सके, लेकिन वर्तमान में, मानव स्वभाव को देखते हुए, यदि निजी उद्यम नहीं होगा तो राजनीतिक लोकतंत्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी नहीं होगी.

इस तथ्य के अलावा कि यह अब तक कहीं भी किया नहीं गया है, जो अपने आप में काफी निर्णायक है, तार्किक रूप से भी यह ऐसा ही होना चाहिए. हम यह कहकर शुरुआत करें कि जब तक किसी समाज में वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा विपक्ष की स्वतंत्रता नहीं होगी, तब तक हम राजनीतिक लोकतंत्र, लोकतांत्रिक सरकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं रख सकते. इसलिए विपक्ष की आवश्यकता लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल में है; यदि हम विपक्ष को सहन नहीं कर सकते, तो स्पष्ट है कि सरकार स्थायी हो जाएगी और उसे जनता की इच्छा से बदला या प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकेगा.

मुक्त उद्यम के बिना स्वतंत्र या प्रभावी विपक्ष संभव नहीं है. आइए विचार करें कि विपक्ष प्रदान कौन करेगा. ऐसे समाज में, जहां हर व्यक्ति या तो सरकारी अधिकारी है या सरकार का कर्मचारी—जैसा कि आज रूस और चीन में है—जहां लगभग हर कोई सरकार का कर्मचारी है—वहां विपक्ष कहां से आएगा? स्पष्ट है कि एक सरकारी कर्मचारी उस सरकार के सामने विपक्ष खड़ा करके संसद में निर्वाचित नहीं हो सकता, जिसके पास सब कुछ है. इसलिए, चूंकि कोई व्यक्ति अपनी नौकरी और राशन कार्ड खोए बिना विपक्ष में नहीं जा सकता, वह विपक्ष में जाता ही नहीं. परिणामस्वरूप, कोई विपक्ष होता ही नहीं.

स्टालिन द्वारा हत्या किए जाने तक कम्युनिस्ट रहे ट्रॉट्स्की ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में इस सत्य की प्रकृति को काफी देर से समझा, जब उन्होंने कहा कि पुराने नारे “जो काम नहीं करेगा, उसे खाने को नहीं मिलेगा” के स्थान पर कम्युनिस्ट समाज में नया नारा है “जो आज्ञा का पालन नहीं करेगा, उसे खाने को नहीं मिलेगा”. वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यही राज्य स्वामित्व की प्रकृति है. जब राज्य सार्वभौमिक नियोक्ता बन जाता है, तब उस सार्वभौमिक नियोक्ता, अर्थात् सरकार के प्रति आज्ञाकारिता, इस बात की कसौटी बन जाती है कि कोई व्यक्ति जीविका कमा सकता है और खा सकता है या नहीं.

समाज में जो एकमात्र वर्ग विपक्ष प्रदान कर सकते हैं या विपक्ष का आधार बन सकते हैं, वे वे हैं जिन्हें 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध के एक इतालवी राजनीतिक चिंतक ने “स्वायत्त सामाजिक शक्तियां” कहा. ये स्वायत्त सामाजिक शक्तियां हैं—व्यवसायी, कारखाने के मालिक, दुकानदार, वे किसान जो भूमि के स्वामी हैं, वे कारीगर जो अपने हाथों से सृजन करते हैं, स्व-रोज़गार वाले लोग, और पेशेवर (जैसे वकील, डॉक्टर, वास्तुकार, लेखा परीक्षक आदि).

इन्हें “स्वायत्त सामाजिक शक्तियां” इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये अपने पैरों पर खड़े होते हैं. ये अपने जीवनयापन के लिए सरकार पर निर्भर नहीं होते. एक स्वतंत्र अर्थव्यवस्था में पेशेवर व्यक्ति, व्यवसायी, भूमि का स्वामी किसान, कारीगर और स्व-रोज़गार व्यक्ति अपने बल पर खड़े होते हैं और सरकार से कह सकते हैं कि वे उससे सहमत नहीं हैं. यही वे वर्ग हैं जो विपक्ष में जा सकते हैं. यही वे वर्ग हैं जो एक स्वतंत्र प्रेस बनाए रख सकते हैं. यही वे वर्ग हैं जो किसी भी प्रकार का स्वैच्छिक समाज या संगठन बना सकते हैं जो सरकारी संरक्षण पर निर्भर नहीं होता.

यदि इन वर्गों को निजी संपत्ति, भूमि और उद्योग के राष्ट्रीयकरण द्वारा समाप्त कर दिया जाए, तो आप हर स्वायत्त सामाजिक शक्ति को नष्ट कर देंगे. तब हर व्यक्ति राज्य की दया पर निर्भर हो जाएगा. यही कारण है कि एक आदेशात्मक अर्थव्यवस्था (कमांड इकॉनमी) न केवल बाजार के मतदान को समाप्त करती है, बल्कि एक सर्वसत्तावादी सरकार लोकतांत्रिक सरकार का स्थान ले लेती है, जो संविधान द्वारा प्रदान की गई होती है.

ये दो बहुत बुनियादी कारण हैं जिनके आधार पर हर वह व्यक्ति, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक सरकार या भारतीय गणराज्य के संविधान में विश्वास करता है, इस निष्कर्ष पर पहुंचे बिना नहीं रह सकता कि कृषि और उद्योग में मुक्त उद्यम का बना रहना भारत के स्वतंत्र संविधान को बनाए रखने के लिए अनिवार्य शर्त (sine qua non) है.

यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इसे “फोरम ऑफ फ्री एंटरप्राइज़” से लिया गया है जिसका प्रकाशन मूलरुप से जून 1961 में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

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