2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में कई पहली बार देखने वाली चीज़ें सामने आईं. इसमें ऐसे कई पल दर्ज हुए जो भारतीय चुनावी इतिहास में बहुत कम देखे गए हैं, खासकर सुरक्षा के मोर्चे पर.
इस बार केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) के 2.4 लाख से ज्यादा जवान तैनात किए गए, जो 2021 के विधानसभा चुनाव में इस्तेमाल की गई संख्या से लगभग तीन गुना है. सीएपीएफ, जिसमें बीएसएफ, सीआईएसएफ, सीआरपीएफ, आईटीबीपी, एनएसजी और एसएसबी जैसे सशस्त्र बल शामिल हैं, ने सीधे निगरानी के लिए अपना कंट्रोल रूम भी बनाया, जबकि क्विक रिस्पॉन्स टीम्स को बड़े पैमाने पर तैनात किया गया.
पिछले डेढ़ महीने में जवानों को मतदान केंद्रों के 100 मीटर के दायरे में सुरक्षा देने की जिम्मेदारी दी गई. डिजिटल निगरानी के लिए ड्रोन का इस्तेमाल किया गया और बुलेटप्रूफ आर्मर्ड वाहन छत्तीसगढ़ और जम्मू-कश्मीर से मंगाए गए.
आवागमन पर पाबंदियां लगाई गईं, जिसमें मोटरसाइकिल पर भी रोक शामिल थी. बेहतर समन्वय दिखाते हुए, सभी सीएपीएफ यूनिट्स के प्रमुख 18 अप्रैल को कोलकाता के साइंस सिटी में कानून-व्यवस्था की स्थिति की समीक्षा के लिए मिले. यहां तक कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की टीमें, जिसका काम कानून-व्यवस्था संभालना नहीं है, भी संवेदनशील इलाकों में तैनात की गईं.
और यह सूची अभी पूरी नहीं है.
एक और पहली बार हुई चीज़, कोलकाता की एक रैली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा की कि मतदान खत्म होने के बाद भी लगभग 70,000 सीएपीएफ जवान पश्चिम बंगाल में “अगले आदेश तक” तैनात रहेंगे.
आमतौर पर, मतदान खत्म होते ही सीएपीएफ की बटालियनें अपनी मूल तैनाती पर लौटने लगती हैं और बाद में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए संवेदनशील इलाकों में आम तौर पर सिर्फ 30 से 40 बटालियन ही रखी जाती हैं, क्योंकि इन बलों को देश भर में ज़रूरी जिम्मेदारियों से अस्थायी रूप से हटाकर लाया जाता है.
सीएपीएफ की तैनाती को लेकर दो तरह की बातें सामने हैं—एक तरफ तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि यह “केंद्र का दखल” है और “डराने की कोशिश” है, वहीं दूसरी तरफ केंद्र का कहना है कि यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए ज़रूरी कदम है. चुनाव के बाद होने वाली हिंसा से प्रभावित इस राज्य में एक बात साफ है: इस तरह की निगरानी और सुरक्षा पहले कभी नहीं देखी गई.
और यही वजह है कि पश्चिम बंगाल में सीएपीएफ की तैनाती इस हफ्ते दिप्रिंट का न्यूज़मेकर है.
‘पैमाने में अभूतपूर्व, रणनीति में नहीं’
दिप्रिंट से बात करते हुए, सीआरपीएफ के एक पूर्व अधिकारी, जो पहले कई राज्यों में चुनावी तैयारी से जुड़े रहे हैं, ने कहा कि पश्चिम बंगाल में तैनाती का पैमाना सिर्फ इसलिए अभूतपूर्व लगता है क्योंकि इसमें संख्या बहुत ज्यादा है. उन्होंने कहा कि यह चुनाव के नतीजों को प्रभावित करने की कोई रणनीति नहीं है.
“हर चुनाव में, खतरे की आशंका और किसी इलाके की संवेदनशीलता के हिसाब से एक सुरक्षा योजना बनाई जाती है और जो भी ज़रूरी व्यवस्थाएं होती हैं, उन्हें लागू किया जाता है. पश्चिम बंगाल में भी यही किया गया है.” उन्होंने आगे कहा कि विशेष सुरक्षा इंतजाम भी नए नहीं हैं; सिर्फ तकनीक बदलती है.
अधिकारी ने कहा, उदाहरण के तौर पर, छत्तीसगढ़ में चुनाव के दौरान, जहां-जहां मतदान दल जाते थे, वहां लैंडमाइन के खतरे की वजह से ड्रोन से निगरानी की जाती थी, “तो यह पहली बार नहीं हो रहा है, लेकिन हां, एआई और कंट्रोल रूम का इस्तेमाल नया है.”
पश्चिम बंगाल में लंबे समय से चुनावी हिंसा का इतिहास रहा है, इसलिए उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी तैनाती ज़रूरी थी.
2021 के विधानसभा चुनाव के दौरान, राज्य में कम से कम 50 चुनाव से जुड़ी मौतें और 300 हिंसा की घटनाएं हुई थीं, जिसमें सत्तारूढ़ टीएमसी और विपक्षी बीजेपी दोनों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाए थे. हालांकि इस बार, उन्होंने कहा कि सिर्फ एक मौत की खबर आई और वह भी राजनीतिक हिंसा से जुड़ी नहीं थी.
एक अन्य वरिष्ठ सीआरपीएफ अधिकारी ने भी यही बात दोहराई और कहा कि तैनाती भले ही बहुत बड़ी थी, लेकिन पहले पांच चरणों के बजाय सिर्फ दो चरणों में मतदान होने की वजह से बल की संख्या बढ़ानी पड़ी.
उन्होंने कहा, “इस बार सिर्फ दो चरणों में मतदान हुआ, इसलिए ज्यादा से ज्यादा बूथों की एक साथ सुरक्षा करनी पड़ी, जिसके लिए स्वाभाविक रूप से ज्यादा बल की ज़रूरत महसूस हुई. बंगाल के चुनावी हिंसा के इतिहास को देखते हुए, यह जरूरी था.”
तकनीक के इस्तेमाल पर अधिकारी ने कहा कि निगरानी और मॉनिटरिंग सिस्टम में हुई प्रगति, जिसमें एआई टूल्स, कंट्रोल रूम और हाई-टेक ड्रोन शामिल हैं, का उपयोग कानून-व्यवस्था को मजबूत करने और स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए किया जाना चाहिए.
उन्होंने कहा, “नतीजे आपके सामने हैं. इस बार हिंसा की वजह से चुनाव से जुड़ी कोई मौत नहीं हुई, जो बंगाल के खून-खराबे वाले चुनावी इतिहास को देखते हुए अपने आप में अभूतपूर्व है.”
पूर्व केंद्रीय सचिव और रिटायर्ड आईएएस अधिकारी ईएएस सरमा ने इस तैनाती को केंद्र द्वारा “डराने की कोशिश” बताया और कहा कि चुनाव आयोग द्वारा इतनी बड़ी सुरक्षा तैनाती को मंजूरी देना “चिंताजनक” है.
सरमा ने कहा, “पश्चिम बंगाल में जिस तरह चुनाव कराए गए, वह स्वीकार करने लायक नहीं है. यह देखना चिंताजनक है कि ईसीआई इतनी बड़ी संख्या में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को तैनात कर रहा है, जिससे आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं.”
उन्होंने आगे कहा, “राज्य में मतदान के दौरान कुछ केंद्रीय अर्धसैनिक बल के जवानों द्वारा महिलाओं के साथ सख्ती से पेश आने के दृश्य कुछ टीवी चैनलों पर दिखाए गए, जिन्हें देखकर मुझे चिंता हुई. इसकी पूरी जांच होनी चाहिए.”
उन्होंने तर्क दिया कि जहां ईसीआई ने राज्य की पुलिस और प्रशासनिक मशीनरी को राजनीतिक प्रभाव से अलग रखने के लिए अपने नियंत्रण में ले लिया, वहीं वह केंद्रीय एजेंसियों पर वही मानक लागू करने में विफल रहा.
उन्होंने सवाल किया, “ईसीआई ने केंद्रीय जांच एजेंसियों पर वैसा ही नियंत्रण क्यों नहीं रखा, खासकर जब उन्होंने पहले और दूसरे चरण के मतदान के बीच विपक्षी नेताओं के खिलाफ छापेमारी की?”
‘कंपनियों का रुकना नया नहीं’
शाह के यह कहने के तुरंत बाद—“दीदी के गुंडों से डरने की ज़रूरत नहीं है. चुनाव आयोग ने हर कोने में सीएपीएफ तैनात कर दी है”—इस पर प्रतिक्रियाओं की एक और लहर उठी.
हालांकि, अधिकारियों ने कहा कि यह कदम नया नहीं है. उनका कहना था कि जहां ज्यादातर बल आखिरकार वापस लौट जाएंगे, वहीं कुछ बटालियनें आम तौर पर चुनाव के बाद की ड्यूटी के लिए रखी जाती हैं, जो क्षेत्र की संवेदनशीलता पर निर्भर करता है.
एक अधिकारी ने कहा, कितनी बटालियनें पीछे रहेंगी, यह खतरे के आकलन पर तय होता है. उदाहरण के लिए, कश्मीर में मतदान के बाद भी 50-60 बटालियनें रखी गई थीं क्योंकि मतदाताओं के खिलाफ बदले की कार्रवाई का डर था.
सीआरपीएफ के महानिदेशक जीपी सिंह ने कहा कि पश्चिम बंगाल में 500 कंपनियां रहेंगी, जिनमें 200 सीआरपीएफ, 150 बीएसएफ, 50 सीआईएसएफ, 50 आईटीबीपी और 50 एसएसबी कंपनियां शामिल हैं. चुनाव आयोग के अधिकारियों ने पुष्टि की कि अतिरिक्त 200 कंपनियों को उन स्ट्रॉन्ग रूम्स की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई है जहां इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें रखी जाती हैं.
अधिकारी ने कहा, “चुनाव के दौरान हमेशा मतदान से पहले और बाद में तैनाती होती है. कश्मीर या छत्तीसगढ़ जैसे इलाकों में, शांति बनाए रखने के लिए मतदान के बाद भी बटालियनें रखी गई हैं. इसका पैमाना पूरी तरह खतरे के आकलन पर निर्भर करता है.”
उन्होंने कहा, “कश्मीर में पूरी तरह वापसी शायद ही कभी हुई क्योंकि यह चिंता रहती थी कि जिन्होंने वोट दिया है, उन्हें निशाना बनाया जा सकता है. नक्सल प्रभावित इलाकों में भी अक्सर कानून-व्यवस्था बिगड़ने का खतरा रहता है. ये सिर्फ दो उदाहरण हैं, लेकिन आम तौर पर ऐसी तैनाती पहले से ही अच्छी तरह योजना बनाकर की जाती है, जिसमें यह भी तय होता है कि चुनाव से पहले कितनी बटालियनें भेजी जाएंगी और बाद में कितनी रहेंगी.”
चुनाव प्रक्रिया खत्म होने और नई सरकार के सत्ता में आने के बाद, केंद्रीय बलों को रखना या हटाना उस सरकार का अधिकार होता है, जो मौजूदा सुरक्षा स्थिति के आधार पर फैसला लेती है.
‘बढ़ा हुआ वोटर टर्नआउट एक कहानी बताता है’
विपक्षी दलों ने सीएपीएफ की भारी तैनाती की आलोचना की, जिसमें टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा और अभिषेक बनर्जी ने इन बलों को शाह की “निजी सेना” बताया. अभिषेक ने यह भी आरोप लगाया कि केंद्रीय बल “आम लोगों को डरा रहे हैं, महिलाओं को थप्पड़ मार रहे हैं, बुजुर्गों पर हमला कर रहे हैं और यहां तक कि बच्चों को भी निशाना बना रहे हैं.”
लेकिन एक तीसरे वरिष्ठ सीआरपीएफ अधिकारी ने इस राजनीतिक नजरिए को खारिज करते हुए कहा कि सुरक्षा बल किसी पार्टी को जीत या हार नहीं दिला सकते. उनका काम सिर्फ यह सुनिश्चित करना है कि मतदाता बिना डर के अपने वोट का अधिकार इस्तेमाल कर सकें.
अधिकारी ने कहा, “ऐसी स्थिति में, बल सिर्फ उपद्रव करने वालों को रोकने के लिए होते हैं, जो हमेशा ऐसा करते आए हैं. अगर किसी को इससे समस्या है, तो वह सिर्फ वही लोग हो सकते हैं जो गड़बड़ी करना चाहते हैं.”
उन्होंने वोटिंग प्रतिशत को सबूत बताते हुए कहा, “सिर्फ गलत काम करने वालों को ही सुरक्षा बलों से डरना चाहिए. उनका काम लोगों के लिए सुरक्षित और अनुकूल माहौल बनाना है ताकि वे बाहर निकलकर वोट कर सकें, न कि किसी पार्टी के पक्ष में नतीजों को प्रभावित करना.”
इस चुनाव में वोटिंग प्रतिशत बढ़कर 92.49 प्रतिशत हो गया, जो 2021 में 81 प्रतिशत था.
अधिकारी ने कहा, “आंकड़े सबके सामने हैं. इस बार राजनीतिक हिंसा से जुड़ी कोई मौत नहीं हुई और वोटिंग ज्यादा हुई क्योंकि लोग वोट देने से नहीं डरे.”
यह तैनाती केंद्र का दखल थी या जरूरी हस्तक्षेप, इस पर राजनीतिक बहस जारी रहेगी, लेकिन सुरक्षा के लिहाज से इतनी बड़ी निगरानी और सैन्य स्तर की तैयारी ने एक नया मानक तय कर दिया है.
हालांकि, यह पश्चिम बंगाल के लिए एक बार की बात थी या भविष्य के चुनावों के लिए एक मॉडल बनेगी, यह अभी देखना बाकी है.
(व्यक्त किए गए विचार निजी हैं)
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