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Friday, 1 May, 2026
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बंगाल में 60 दिन CAPF रखने पर उठे संवैधानिक सवाल, यह कोई कब्ज़ा करने वाली फोर्स नहीं

अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव तक ही केंद्रीय बलों की भूमिका, वोटिंग खत्म होते ही अधिकार सीमित होने लगते हैं.

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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे और अंतिम चरण की वोटिंग अभी खत्म भी नहीं हुई थी कि बुधवार शाम 5:12 बजे सीआरपीएफ के डीजी आईपीएस जीपी सिंह ने एक्स पर पोस्ट कर दिया कि 500 कंपनियां सीएपीएफ की राज्य में रहेंगी, अगले आदेश तक.

ये 500 कंपनियां—सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, आईटीबीपी और एसएसबी से मिलाकर करीब 50,000 जवान—गिनती के दिन 4 मई तक कानून-व्यवस्था के लिए राज्य में तैनात रहेंगे. इससे पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी कह चुके हैं कि बंगाल में केंद्रीय बल 60 दिन तक रहेंगे. अगर ऑपरेशन की ज़रूरत को अलग रखें, तो संवैधानिक सवाल साफ नहीं है.

बंगाल में सतर्कता की वजह

बंगाल में चुनाव के बाद हिंसा की घटनाएं सिर्फ धारणा नहीं, रिकॉर्ड में हैं. 2021 विधानसभा चुनाव के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) को 1,979 शिकायतें मिलीं, जिनमें करीब 15,000 पीड़ित 23 जिलों से थे.

कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने हत्या और असामान्य मौत के 52 मामले दर्ज किए थे. 2018 पंचायत चुनाव में टीएमसी ने करीब 34 प्रतिशत सीटें बिना मुकाबले जीती थीं, जैसा कि राज्य चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में बताया था.

इसलिए 4 मई तक 50,000 सीएपीएफ जवानों की तैनाती को ज्यादा नहीं कहा जा सकता.

संवैधानिक ढांचा क्या कहता है

लेकिन सवाल यह है कि चुनाव खत्म होने के बाद ये 50,000 जवान क्या कर सकते हैं. संविधान की सातवीं अनुसूची के राज्य सूची में कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है. सीएपीएफ को सिर्फ तैनात कर देने से उन्हें अपने आप अधिकार नहीं मिल जाते. यह अधिकार राज्य सरकार देती है.

केंद्र सरकार दो आधारों पर बल तैनात करती है. पहला, अनुच्छेद 355, जो केंद्र को राज्यों को बाहरी हमले और आंतरिक अशांति से बचाने की जिम्मेदारी देता है—यह कब्जे का अधिकार नहीं है.

दूसरा, अनुच्छेद 324, जिसके तहत चुनाव आयोग निष्पक्ष चुनाव के लिए केंद्रीय बल बुलाता है, लेकिन यह अधिकार चुनाव तक ही सीमित है. वोटिंग खत्म होते ही इसकी ताकत कम होने लगती है.

बल क्या कर सकते हैं और क्या नहीं

जब तक अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) या AFSPA लागू नहीं होता—जो बंगाल में नहीं है—तब तक सीएपीएफ की भूमिका सीमित रहती है.

CRPF Act, 1949 के तहत जवान वही काम करते हैं जो उन्हें दिया जाता है. सामान्य स्थिति में वे जिला मजिस्ट्रेट, पुलिस कमिश्नर या राज्य के डीजीपी के निर्देश में काम करते हैं. सीएपीएफ एक सहायक बल है, उसका विकल्प नहीं.

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023, जो 1 जुलाई 2024 से लागू हुई, भी यही ढांचा बनाए रखती है. इसके सेक्शन 163 के तहत अवैध भीड़ को हटाने का अधिकार मजिस्ट्रेट या थाने के प्रभारी के पास होता है, सीएपीएफ कमांडर के पास नहीं.

सेक्शन 164 के तहत बल प्रयोग भी मजिस्ट्रेट के आदेश से ही हो सकता है. और सेक्शन 218 के तहत कानूनी सुरक्षा सिर्फ उन्हीं को मिलती है जो आदेश के तहत काम करते हैं—अपने मन से कार्रवाई करने पर सीएपीएफ जवान को वैसी सुरक्षा नहीं मिलती जैसी AFSPA में मिलती है.

सीमित स्वतंत्र भूमिका

सीएपीएफ अपने स्तर पर संवेदनशील इलाकों में फ्लैग मार्च कर सकती है, महत्वपूर्ण जगहों पर तैनाती कर सकती है और एस्कॉर्ट ड्यूटी कर सकती है, लेकिन बिना आदेश के घेराबंदी करना, गिरफ्तारी करना या बल प्रयोग करना—आत्मरक्षा के अलावा—उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है.

फेडरल खाई

यहीं असली राजनीतिक और संवैधानिक दबाव की स्थिति बनती है. केंद्र द्वारा 500 कंपनियां बनाए रखना कानूनी तौर पर सही ठहराया जा सकता है—19 मार्च के चुनाव आयोग के आदेश और सीआरपीएफ एक्ट इसके आधार देते हैं. लेकिन कानूनी आधार और असल काम में फर्क होता है. अगर ममता बनर्जी सरकार, अपने डीजीपी के जरिए, सीएपीएफ को सही तरीके से इस्तेमाल करने से मना कर देती है, तो केंद्र के पास अनुच्छेद 356 के अलावा कोई तरीका नहीं बचता. तब ये बल वही बन जाएंगे जैसा टीएमसी हमेशा कहती रही है—बिना बुलाए मौजूदगी, वर्दी में एक राजनीतिक संदेश, लेकिन संवैधानिक तौर पर निष्क्रिय. सुप्रीम कोर्ट के फैसले, खासकर एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) के बाद से, कानून-व्यवस्था पर राज्य के अधिकार को संघीय ढांचे में लगभग अटूट माना गया है. अगर केंद्र किसी राज्य में 50,000 जवान तैनात करता है, और वह राज्य की चुनी हुई सरकार की इच्छा के खिलाफ है—तो स्थिति संवैधानिक रूप से असहज हो जाती है, चाहे सावधानी सही ही क्यों न हो.

यह व्यवस्था तब तक चलती है जब तक राज्य सरकार सहयोग करती है. जैसे ही वह सहयोग नहीं करती, संघीय संतुलन की नाजुकता साफ दिखने लगती है. आईपीएस अधिकारी का एक्स पोस्ट इसलिए आया क्योंकि बंगाल का इतिहास ऐसा है कि इंतजार करने की गुंजाइश कम है. यह सोच सही है, लेकिन 50,000 सीएपीएफ जवान सिर्फ एक सावधानी हैं, कोई गारंटी नहीं.

उनकी मौजूदगी तभी असर करती है जब राज्य प्रशासन उन्हें इस्तेमाल करने को तैयार हो. उनके अधिकार तभी लागू होते हैं जब मजिस्ट्रेट का आदेश मिले. संविधान ने सीएपीएफ को किसी कब्जा करने वाली फोर्स के रूप में नहीं बनाया है, और इसे ऐसा बनाया भी नहीं जा सकता, बिना संघीय ढांचे को नुकसान पहुंचाए. इन बलों को रखना सही हो सकता है, लेकिन 4 मई तक उनका असली असर पूरी तरह राज्य सरकार के रवैये पर निर्भर करेगा—जो केंद्रीय बलों के प्रति अपनी नाराज़गी कभी छिपाती नहीं रही है.

लेखक पंजाब कैडर के रिटायर्ड IAS अधिकारी और पंजाब सरकार के पूर्व स्पेशल चीफ सेक्रेटरी हैं. वह गवर्नेंस, पब्लिक पॉलिसी और संवैधानिक मामलों पर लिखते हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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