हेमंत सोरेन के लिए भी इतना आसान नहीं होगा क्योंकि ये विधायक उन्हीं मुद्दों पर अपने सरकार को घेर रहे हैं, जिन मुद्दों को लेकर जेएमएम चुनाव के वक्त जनता के बीच गई थी.
सुनील ओझा ने 2007 में भाजपा छोड़ दी थी. लेकिन साल 2011 में वह फिर से पार्टी में शामिल हो गए. प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें 2014 में अपनी सीट वाराणसी की जिम्मेदारी देने के लिए चुना था। तब से वह परदे के पीछे रहकर काम करते आए हैं और अपनी चतुराई के लिए जाने जाते हैं.
अनंत पटेल और हार्दिक पटेल कांग्रेस के सदस्य हैं, जबकि जिग्नेश मेवाणी निर्दलीय उम्मीदवार हैं, जो कांग्रेस पार्टी का समर्थन कर रहे हैं. गुजरात में कांग्रेस 1995 से सत्ता से बाहर है.
ठाकरे ने यहां पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा, 'मैं नमाज के खिलाफ नहीं हूं, आप अपने घर पर नमाज पढ़ सकते हैं, लेकिन सरकार को मस्जिद के लाउडस्पीकर हटाने पर फैसला लेना चाहिए. मैं अभी चेतावनी दे रहा हूं... लाउडस्पीकर हटाओ वरना लाउडस्पीकर लगा देंगे.'
2018 की हार के बाद से, राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सुर्खियों से बाहर रहीं हैं और राज्य भाजपा प्रमुख सतीश पूनिया के साथ उनकी खींच-तान बराबर जारी रही है. लेकिन पार्टी अध्यक्ष नड्डा और पीएम मोदी के साथ उनकी हालिया मुलाकातों ने उनके बारे में चर्चा का बाजार गर्म कर दिया है.
आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल के सदस्य और बहुजन समाज पार्टी के इकलौते विधायक इस प्रस्ताव के समर्थन में आए और केंद्र के कदम को ‘तानाशाही और निरंकुश’ करार दिया.