Sunday, 3 July, 2022
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‘और कड़ी मेहनत करें, राजस्थान को फिर से जीतने में मदद करें’- वसुंधरा राजे को मनाने में लगी BJP का उनके लिए संदेश

2018 की हार के बाद से, राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सुर्खियों से बाहर रहीं हैं और राज्य भाजपा प्रमुख सतीश पूनिया के साथ उनकी खींच-तान बराबर जारी रही है. लेकिन पार्टी अध्यक्ष नड्डा और पीएम मोदी के साथ उनकी हालिया मुलाकातों ने उनके बारे में चर्चा का बाजार गर्म कर दिया है.

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नई दिल्ली: जैसा कि भाजपा के कुछ सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया पार्टी ने राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से कहा है कि वे राजनीति में और अधिक सक्रिय हों कड़ी मेहनत करें तथा कांग्रेस के पांच साल के शासन के बाद भाजपा को राज्य की सत्ता में लौटने में मदद करें.

2018 के बाद से, जब भाजपा कांग्रेस से यह राज्य हार गई थी, राजे सुर्खियों से बाहर रही हैं और ज्यादातर समय राज्य भाजपा अध्यक्ष सतीश पूनिया के साथ अपनी प्रतिद्वंद्विता के लिए ही खबरें में बनीं रहीं हैं.

लेकिन हाल-फ़िलहाल में भाजपा आलाकमान के साथ उनकी एक के बाद एक बैठकों तथा उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड में पार्टी के मुख्यमंत्रियों के शपथ ग्रहण समारोहों में उनके भाग लेने से राजस्थान की राजनीति में उनकी नई भूमिका के बारे में चर्चाएं तेज हो गईं हैं.

भाजपा के सूत्रों के अनुसार, पिछले मंगलवार को उन्होंने पार्टी प्रमुख जेपी नड्डा और उससे भी एक सप्ताह पहले पीएम नरेंद्र मोदी से मुलाकात की, ताकि उन्हें राज्य की स्थिति से अवगत कराया जा सके और साथ ही पूनिया खेमे के बारे में शिकायत भी की जा सके.

पार्टी के एक सूत्र ने कहा, ‘पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ राजे की बैठक कोई एकतरफा प्रयास नहीं था. आलाकमान ने उन्हें राजस्थान की जमीनी स्थिति के बारे में जानने और राज्य इकाई में चल रही प्रतिद्वंद्विता को लेकर उन्हें मनाने के लिए बुलाया था. उन्होंने चुनाव से पहले उनसे और अधिक भागीदारी के लिए भी कहा.’ साथ ही, इस सूत्र बे यह भी कहा कि यह मोदी ही थे जिन्होंने राजे के साथ दिल्ली में मुलाकात के लिए उत्तराखंड में संकेत दिया था.

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सूत्र ने कहा, ‘नड्डा ने उन्हें राज्य में और अधिक सक्रिय होने के लिए कहा, जबकि पीएम ने उनकी शिकायतों को धैर्यपूर्वक सुना और फिर सुझाव दिया कि वह राज्य में भाजपा की वापसी के लिए कड़ी मेहनत करें.’

भाजपा 2023 के अंत में होने वाले राजस्थान विधानसभा चुनावों के लिए पहले से ही अपने कैडर को और अधिक मजबूत करने की कोशिश कर रही है, और इस बात को उजागर करते हुए मतदाताओं को अपनी एकता का संदेश देने का प्रयास कर रही है कि दो बार की मुख्यमंत्री रहीं राजे अशोक गहलोत सरकार को हटाने के प्रयासों में सक्रिय रूप से शामिल हैं.

नड्डा पूर्वी राजस्थान के सवाई माधोपुर में भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा के एक समारोह में भाग लेने के लिए शनिवार को राज्य का दौरा कर रहे हैं. यह वह इलाका है जहां भाजपा को 2018 के विधानसभा चुनावों के दौरान सबसे भारी झटका लगा था और उसने इस इलाके की 39 में से केवल चार ही सीटें जीती थीं. साल 2013 में भाजपा ने इनमें से 28 सीटें जीती थीं.


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सुलह के प्रयास

राजस्थान में कांग्रेस सरकार को सत्ता से हटाने के लिए भाजपा को राजे की उतनी ही जरूरत है जितनी की राजे को भाजपा की. भाजपा के एक महासचिव ने उनका नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि राजे ही राज्य में एकमात्र ऐसी स्वीकार्य जन नेता हैं जिन्होंने 2003 और 2013 में भाजपा की जीत को संभव बनाया था.’

नड्डा और शाह भी इस राज्य पर अधिक ध्यान दे रहे हैं, खासकर यह देखते हुए कि 2020 में कांग्रेसी उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट द्वारा मुख्यमंत्री गहलोत के खिलाफ विद्रोह किये जाने के वक्त उन्हें अपने मौन समर्थन देने के बावजूद वे राजस्थान की कांग्रेस सरकार को नहीं गिरा सके थे. भाजपा ने पूनिया को भी खुली छूट दे रखी है, लेकिन इसके बावजूद राजस्थान में 2018 के बाद से हुए सात विधानसभा उपचुनावों में से वह केवल एक में ही जीत पाई है.

भाजपा महासचिव ने कहा, ‘पूनिया अच्छे संगठनात्मक व्यक्ति हैं लेकिन वह भीड़ और वोट नहीं जुटा सकते. केंद्र यह भी समझता है कि लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव अलग प्रवृति के होते हैं तथा राजस्थान कांग्रेस शासित अन्य राज्यों की तरह नहीं है जहां वह पार्टी कमजोर और क्षेत्रीय नेतृत्व के बिना है.‘

इस बीच, राजे के समर्थक लगातार मांग कर रहे हैं कि उन्हें मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किया जाए, और यही ऐसी चीज है जिसे पार्टी ने करने से इनकार कर दिया है.

स्वयं राजे ने 8 मार्च को अपने जन्मदिन के अवसर पर बूंदी जिले के केशोरईपाटन में एक धार्मिक-राजनीतिक रैली निकाली, जिसमें भारी भीड़ उमड़ी. राज्य भाजपा इकाई की ओर से दबे स्वर में दी गई चेतावनी के बावजूद पार्टी के 42 विधायक और 10 से अधिक सांसद इस जन्मदिन के कार्यक्रम में शामिल हुए थे.

ऊपर उल्लेख किये गए भाजपा नेता ने कहा, ‘भाजपा के लिए यह स्पष्ट है कि राजे की अनदेखी करने से पार्टी की सत्ता में वापसी की संभावना कम काफी हो जाएगी, इसलिए दिल्ली उन्हें अच्छे मनमिजाज के साथ रखने की कोशिश कर रही है. राजे भी यह जानती हैं कि अब 2012 जैसी बात नहीं है जब उनके द्वारा पार्टी छोड़ने की धमकी देने के बाद गुलाबचंद कटारिया को अपनी यात्रा रद्द करनी पड़ी थी.’

कटारिया, जो 2012 में राजस्थान चुनावों से पहले खुद को मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में पेश कर रहे थे, को भाजपा की एक कोर कमेटी की बैठक में मतभेदों के उभरने के बाद अपनी 28-दिवसीय ‘लोक जागरण यात्रा’ रद्द करनी पड़ी थी, कयोंकि राजे ने इस बैठक में तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष कटारिया द्वारा अपनी यात्रा की योजना को वापस नहीं लिए जाने पर पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा देने की धमकी दी थी. इसक बाद, उन्होंने 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को भारी बहुमत से जीत दिलाई थी.

साल 2018 में भी, राजे का इतना दबदबा था कि तत्कालीन पार्टी प्रमुख अमित शाह गजेंद्र शेखावत को राज्य भाजपा अध्यक्ष के रूप में नियुक्त नहीं कर सके थे, क्योंकि राजे इसके लिए तैयार नहीं थीं. उनके बीच यह कड़वाहट भरी लड़ाई चार महीने तक चली थी.

भाजपा नेता ने कहा, ‘लेकिन पिछले नौ सालों में स्थिति काफी बदल गई है.’

एकजुट मोर्चा बनाने का प्रयास

पिछले साल दिसंबर में, शाह ने जयपुर में भाजपा की राज्य कार्यकारिणी की बैठक को संबोधित करते हुए राजे और पूनिया के नेतृत्व वाले गुटों को साथ मिलकर काम करने का संकेत दिया था. उन्होंने कथित तौर पर सभा में उपस्थित लोगों से कहा था कि भाजपा को प्रधानमंत्री के नेतृत्व में ही सामूहिक रूप से चुनाव लड़ना चाहिए. राजस्थान भाजपा भी सामूहिक नेतृत्व की छवि पेश करने के लिए ‘टीम राजस्थान’ को 2023 के लिए अपने मूलमंत्र के रूप में प्रचारित कर रही है.

एक अन्य भाजपा नेता, जो गुमनाम रहना चाहते हैं, ने कहा, ‘फ़िलहाल राजे आलाकमान को अपनी शर्तों पर राजी करवा पाने की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन वह यह भी जानती हैं कि अगर पार्टी राजस्थान चुनाव जीतती है, तो उनके फिर से मुख्यमंत्री बनने की संभावना बहुत कम है. इसलिए, उनके लिए अपना राजनीतिक कद और बड़ा करने हेतु मोलभाव करने का यही सबसे अच्छा समय है क्योंकि दिल्ली स्थित नेतृत्व को राज्य में जीत हासिल करने के लिए उनकी मदद की जरूरत है.’

हालांकि, इस नेता ने कहा कि ‘यह अभी तक भी स्पष्ट नहीं है कि अगर भाजपा आलाकमान राजे को मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं दे सकता तो फिर वह उनके लिए और क्या पेशकश कर सकता है?’

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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