कन्हैया कुमार पर प्रोफेसर अपूर्वानंद की टिप्पणी और सामाजिक न्याय के विभ्रम और सच को उधेड़ता ये लेख उन सवालों से टकरा रहा है, जो भारतीय समाज में सुधार आंदोलनों की आगे की दिशा के लिए महत्वपूर्ण हैं.
शायर अमीर कजलबाश को ये लिखते समय अंदाजा नहीं रहा होगा की ये शेर आगे जाकर भारतीय न्यायपालिका की दास्तां बयां करेगा. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पर लगे विवादों को सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह हल किया, उसने एक बड़े विवाद को जन्म दिया है.
उत्तर प्रदेश में सामंतवाद के गढ़ प्रतापगढ़ में अखिलेश यादव ने ‘राजशाही’ को चुनौती दी और तमाम जातियों को अधिकार देने की बात कही. लेकिन क्या उनके बदले तेवर का लाभ समाजवादी पार्टी को होगा?
नरेंद्र मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को भ्रष्टाचार के प्रतीक के तौर पर पेश किया. लेकिन किसी के भी जीवन को समग्रता में देखा जाना चाहिए और इस क्रम में राजीव गांधी की स्कूल शिक्षा नीति को भी याद किया जाना चाहिए.
भारतीय लोकतंत्र और पसमांदा मुसलमानों की नुमाइंदगी का प्रश्न अब सतह पर है. अगर लोकतंत्र को पूरी आबादी तक ले जाना है, तो ऐसे सवालों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए.
चुनाव शुरू होने से लेकर तीन चरणों तक तो कांग्रेस और सपा अलग-अलग खेल खेल रहे थे लेकिन इधर यूपी में सपा और कांग्रेस के बीच तू तू मैं मैं कुछ बढ़ती दिख रही है.
यूपी में बीएसपी ने चार बार सत्ता हासिल की है, जिसमें एक बार वह पूर्ण बहुमत से आई. फुले-आंबेडकर से प्रभावित इस आंदोलन की वैचारिकता की नींव उत्तर प्रदेश में स्वामी अछूतानंद ने डाली थी.
खतरा यह है कि नई सरकार संतुलित मुद्रास्फीति को देखते हुए महंगे चुनावी वादों को पूरा करने या आर्थिक वृद्धि के अवास्तविक लक्ष्यों के चक्कर में विस्तारवादी नीतियों को न अपना ले.
एक पक्ष सोचता है कि आज भारत अपनी हैसियत से ज्यादा आगे बढ़कर कदम उठा रहा है, जबकि दूसरा पक्ष सोचता है कि मोदी ने भारत की हैसियत कमजोर कर दी है और भारत अपनी हैसियत से कम कदम उठा रहा है. सच यह है कि दोनों ही गलत हैं.