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फोटो- बाएं से अजित सिंह, मायावती और अखिलेश यादव/फेसबुक से
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लोकसभा चुनाव के लिए मतदान जारी है. ऐसे समय में देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में, जहां लोकसभा की 80 सीटें हैं, मुकाबला दिलचस्प हो गया है. यहां तीन राजनीतिक गठबंधन मैदान में हैं. एक तरफ सपा-बसपा-रालोद हैं, दूसरी तरफ भाजपा-अपना दल हैं और इसके अलावा कांग्रेस और अपना दल के कृष्णा पटेल गुट तथा जनाधिकार पार्टी का गठबंधन भी मैदान में है.

इस तरह से देखा जाए तो सपा-बसपा-रालोद और दूसरी तरफ कांग्रेस का गठबंधन दोनों ही बीजेपी विरोधी वोटों पर अपनी दावेदारी कर रहे हैं. कहने को ये दोनों गठबंधन बीजेपी से लड़ रहे हैं, लेकिन वास्तव में इनकी आपसी होड़ काफी तीखी है. जो गठबंधन बीजेपी विरोध का बड़ा चैंपियन साबित होगा, वह चुनाव में फायदे में रहेगा. इसलिए दोनों विपक्षी गठबंधन इस समय खुद को ज्यादा मजबूत बता रहे हैं और साबित करने में लगे हैं कि बीजेपी को रोकने में वही सक्षम हैं. यह होड़ राज्य स्तर से कहीं ज्यादा, हर सीट पर है.


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जनवरी 2019 में ही सपा-बसपा और रालोद का गठबंधन औपचारिक रूप से बना. जब इस गठबंधन में कांग्रेस को शामिल नहीं किया गया, तो कांग्रेस ने अलग चुनाव लड़ने के लिए अपनी तैयारी की. इसी तैयारी में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश संगठन में व्यापक हेर फेर किया. पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान प्रियंका गांधी को सौंपी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कमान ज्योतिरादित्य सिंधिया को. प्रियंका गांधी ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में कई जगह रोड शो किए, ताकि पार्टी को बल मिल सके. किन्तु यह जनता को कितना प्रभावित कर पाया है, अभी तय होना है.

हर चुनाव में कांग्रेस अपने पक्ष में एक माहौल तैयार करती है कि वह जीतेगी. लेकिन ऐसा होता नहीं है. हां, पिछले 30 साल में उत्तर प्रदेश में उसे एक बार 2009 के लोकसभा चुनाव में जरूर अच्छी सफलता मिली थी, जब उसके 21 सांसद जीत गए थे.

उत्तर प्रदेश कभी कांग्रेस का मजबूत गढ़ हुआ करता था. इसलिए उसे उत्तर प्रदेश में पुनर्वापसी का हमेशा भरोसा रहता है. किन्तु यह होती नहीं है. हर चुनाव में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी उतरते हैं, भरपूर प्रचार करते हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस सभी सीटों पर खड़ी हुई, उसका वोट प्रतिशत केवल 7.5% रहा, उसने दो सीटें जीतीं. वहीं, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को क्रमशः 22.2% और 19.6% वोट मिले. एनडीए का वोट 42.3% रहा, जो सपा और बसपा के कुल वोट से थोड़ा सा अधिक है. सपा ने पांच सीटों पर जीत हासिल की थी. बसपा कोई सीट नहीं जीत सकी.

उसके बाद 2017 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी से गठबंधन किया. सपा ने 298 सीटों पर जबकि कांग्रेस ने 105 सीटों पर चुनाव लड़ा. इसमें कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत ख़राब रहा. उसके मुकाबले में समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन ठीक रहा. सपा ने 47 और कांग्रेस ने 7 सीटें जीतीं. सीटों के बंटवारे के हिसाब से कांग्रेस को सपा के मुकाबले एक तिहाई सीट जीतनी चाहिए थी, किन्तु ऐसा नहीं हुआ. जनता ने जिस तरह कांग्रेस को नकारा, उस तरह सपा को नहीं नकारा. हो सकता है कि सपा को कांग्रेस से गठबंधन करने से नुकसान ही हुआ हो.

उसके बाद उत्तर प्रदेश में लोकसभा उपचुनाव हुए जिसमें सपा-बसपा-रालोद के बीच एक सहमति बनी जिसने आगे चलकर गठबंधन का रूप ले लिया. गोरखपुर और फूलपुर सीट क्रमशः मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की सीट थी. जब सपा ने इन पर अपने उम्मीदवार खड़े किये तो बसपा ने उन्हें समर्थन किया. इन दोनों सीटों पर भाजपा को करारी पराजय मिली. यही स्थिति कैराना में रही, जहां रालोद प्रत्याशी को जीत मिली जिसे सपा-बसपा ने समर्थन दिया था. कैराना सीट पर चुनाव जीतना बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि यहां भाजपा ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का पूरा प्रयास किया था.

इन उपचुनाव में दो सीटों- गोरखपुर और फूलपुर- पर कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार खड़े किये, किन्तु कांग्रेस प्रत्याशियों को बहुत कम वोट मिल पाए. शायद इसका कारण यह है कि भाजपा विरोधी वोटर अपने मतों में बिखराव नहीं चाहते. उसने भाजपा के विल्कप के तौर पर सपा-बसपा-रालोद गठबंधन को चुन लिया है.


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उपचुनाव के परिणाम बताते हैं कि 2017 के यूपी विधानसभा चुना के बाद मोदी-योगी की लोकप्रियता तेजी से गिर रही है. इन सीटों पर सपा-बसपा-रालोद के संयुक्त उम्मीदवारों को को जो वोट मिले हैं, वे सपा और बसपा को 2014 में अलग-अलग मिले वोटों के कुल से भी ज्यादा थे. सपा-बसपा कभी अकेले अकेले सत्ता में रही हैं, वे आज भाजपा को हराने के लिए हाथ मिला चुकी हैं.

सवाल उठता है कि कांग्रेस किस दम पर चुनाव लड़ रही है? उसके पास कौन सा वोट है? कांग्रेस के पक्ष में ऐसा कुछ हुआ भी नहीं, जिससे यह कहा जा सके कि उसके वोट में अचानक से बढ़ोत्तरी हुई हो. उपचुनावों के नतीजों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा का मुकबला स्पष्ट रूप से सपा-बसपा गठबंधन से है. अगर कोई जादू न हुआ तो कांग्रेस खेल से बाहर है. ऐसे में कहा जा रहा है कि यदि सेकुलर और सामाजिक न्याय के समर्थक वोटों को बिखराव से रोकना है, तो भाजपा विरोधी वोट एकमुश्त होकर सपा-बसपा गठबंधन को जाना होगा. 5-6 सीटों को छोड़कर कांग्रेस मजबूत हालत में नहीं है. बाकी सीटों पर वोट बंटवारा हुआ तो इसका फायदा भाजपा को हो सकता है.

(लेखक दिल्ली यूनिवर्सिटी में शिक्षक रहे हैं.)


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