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13 पॉइंट रोस्टर के खिलाफ संसद परिसर में प्रदर्शन करते धर्मेंद्र यादव (बीचे में) | फेसबुक
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संसद भारतीय जनता की सबसे बड़ी पंचायत है. यहां से होने वाली चर्चाओं से देश की नीतियां बनती हैं और कई बार यहीं पर नीतियां बदलती भी हैं. इनका असर करोड़ों लोगों पर पड़ता है. इसलिए खासकर लोकसभा में किसने क्या बोला और कितने जोरदार तरीके से बोला, इसका काफी महत्व होता है.

इस मामले में अगर मई 2014 में गठित हुई 16वीं लोकसभा की चर्चाओं की ओर पलटकर देखें, तो कुछ चेहरे अलग से ही नजर आते हैं. सामाजिक न्याय के विभिन्न बिंदुओं को पिछले कुछ वर्षों में जिस एक नेता ने मजबूती से उठाया है, धर्मेंद्र यादव उनमें से प्रमुख हैं. वर्तमान में वे बदायूं से सांसद हैं. 2004 में वे पहली बार मैनपुरी से सांसद बने थे. उसके बाद 2009 और 2014 में वे बदायूं से चुने गए. इनकी गिनती समाजवादी पार्टी के प्रमुख नेताओ में होती है. इनका एक परिचय यह भी है कि वे मुलायम सिंह यादव के सगे भतीजे हैं.


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16वीं लोकसभा इस मामले में भी अलग रही है कि अरसे बाद इसमें एक दल का बहुमत आया. विपक्ष इसमें काफी कमजोर रहा. इसकी वजह एक तो ये थी कि विपक्षी दलों के सांसदों की संख्या काफी कम थी और दूसरी बात ये कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सत्ताधारी बीजेपी बहुत अाक्रामक रही. बीजेपी ने लगातार कोशिश की कि लोकसभा की बहसें उन मुद्दों पर हों, जो उसे प्रिय हैं. ऐसे में सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के मुद्दों को उठा पाना आसान नहीं था.

यह काम जिस एक सांसद ने जोरदार तरीके से किया वे हैं धर्मेंद्र यादव. लोक सभा डिबेट में भाषण देना हो हो या प्रश्न-उत्तर सेशन हो, इन्होंने हर जगह सामाजिक न्याय और दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों तथा अल्पसंख्यकों के मुद्दे जोरदार तरीके से उठाया. धर्मेंद्र यादव ने दलितों-पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के पक्ष में जिन मुद्दों को जोरदार तरीके से रखा, उनमें प्रमुख हैं – जाति जनगणना, रिजर्वेशन, राजकाज में सभी समुदायों की भागीदारी, 13 पॉइंट रोस्टर, एससी-एसटी एक्ट, अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न आदि.

जातिगत जनगणना के बारे में इनका कहना है कि ‘सरकार किसी की रही हो – चाहे भाजपा हो या कांग्रेस – इनमें से किसी सरकार ने पिछड़ी जातियों की जातिगत जनगणना में कोई रुचि नहीं दिखाई है.’ कांग्रेस की सरकार ने 2011 में पिछड़ी जातियों की जातिगत जनगणना कराई, किन्तु वे आंकड़े जारी नहीं किये गए. उनके अनुसार इसका कारण यह है कि यदि ओबीसी के जातिगत आंकड़े जारी हुए, तो फिर ओबीसी के लोग अपनी आबादी के हिसाब से देश के संसाधनों पर अपना हक मांगेंगे. धर्मेंद्र यादव का मानना है कि मोदी सरकार चाहे तो जातिगत जनगणना दो महीने में हो सकती है, लेकिन सरकार ने भी इसमें कोई दिलचस्पी नहीं ली.

इनका कहना है कि ‘1990 में जब जनता दल की सरकार बनी तो मंडल आयोग की सिफारिशें लागू हुयीं, जिसके तहत पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत रिजर्वेशन सुनिश्चित किया गया. ऐसा इसलिए सम्भव हो पाया, क्योंकि उस सरकार में समाजवादी – लोहियावादी लोगों की मुख्य भूमिका थी.’

लोक सभा में एक भाषण में धर्मेंद्र यादव ने कहा कि ‘मंडल आयोग को लागू हुए 28 साल हो चुके हैं. किन्तु दुर्भाग्य की बात है कि अभी सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गों की संख्या केवल 9 प्रतिशत है.’

रिजर्वेशन पर एक नया प्रस्ताव देते हुए उन्होंने कहा कि रिजर्वेशन की पुरानी व्यवस्था खत्म होनी चाहिए और जिस जाति की जितनी आबादी है, उसको उसकी आबादी के अनुपात में रिजर्वेशन मिलना चाहिए. रिजर्वेशन पूरा 100 प्रतिशत होना चाहिए. वे कहते हैं कि एससी-एसटी-ओबीसी समुदाय के लोग किसी से कुछ छीन नहीं रहे, वे केवल अपना हक मांग रहे हैं.


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यह बात महत्वपूर्ण है कि रिजर्वेशन पर समाजवादी पार्टी की भी यही नीति है और पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव भी लगातार ये बात कह रहे हैं.

जब पिछले साल एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने अग्रिम जमानत का प्रावधान किया था, तब इस बारे में लोकसभा में हुई बहस में धर्मेंद्र यादव ने कहा कि यह सच है कि कुछ झूठे मुकदमे दर्ज होते हैं, लेकिन यह भी सच है कि जातिगत उत्पीड़न करने वालों को सज़ा नहीं मिलती है. समाज में दबदबा होने के कारण वे बच निकलते हैं. उनका मानना है कि जब तक एससी-एसटी-ओबीसी को सहयोग व सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक राष्ट्र का निर्माण नहीं हो सकता. इससे ही देश समर्थ और विकसित होगा.

एक अन्य भाषण में उन्होंने राजकाज में वंचितो की हिस्सेदारी का सवाल जोरदार तरीके से उठाया. उनका कहना है कि देश के शीर्ष नेतृत्व और संस्थाओं में, जहां नीतियां बनती हैं, वहां दलित-पिछड़े-अल्पसंख्यक न के बराबर हैं. गवर्नर, केंद्रीय सचिवालय, न्यायपालिका में भी इन समुदायों का प्रतिनिधित्व बहुत ही कम है. उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी कैबिनेट में केवल 4 ओबीसी मंत्री हैं, जबकि इनकी आबादी 55 फीसदी है. अपने भाषण में आंकड़ों के आधार पर उन्होंने कहा कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में इन समुदायों का बुरा हाल है. वहां 2,371 प्रोफेसर में से केवल 1 ओबीसी से नियुक्त हुआ है. 4,708 एसोसिएट प्रोफेसर में से केवल 6 ओबीसी के हैं. 9,721 असिस्टेंट प्रोफेसर में से केवल 1745 ओबीसी हैं. जबकि पिछड़ों का हक 27 फीसदी है.

जब गत वर्ष 5 मार्च को यूजीसी ने आरक्षण को निरस्त करने वाला 13 पॉइंट रोस्टर का सर्कुलर जारी किया था, तभी से धर्मेंद्र यादव ने 13 पॉइंट रोस्टर खत्म कराने के लिए लोकसभा में जोरदार तरीके से अपनी बात रखी और बाहर संघर्ष में भी खड़े हुए. उन्होंने कहा कि यदि 13 पॉइंट रोस्टर लागू हो गया तो 200 साल तक एससी-एसटी-ओबीसी समुदाय के लोग प्रोफेसर नहीं बन पाएंगे.

रोस्टर विवाद का एक बहुत ही दिलचस्प समाधान सुझाते हुए उन्होंने लोकसभा में कहा कि सरकार अगर चाहती है कि 13 पॉइंट रोस्टर लागू हो तो वो ऐसा ही करे. लेकिन रिजर्वेशन का क्रम उलट दे. अभी पहले तीन पोस्ट अनरिजर्व हैं. ऐसी व्यवस्था बने कि पहला पद आदिवासी को जाए, दूसरा पद दलित को और तीसरे पर ओबीसी को, इसके बाद जो चौथा पद आए, वह अनरिजर्व हो.

उन्होंने कहा कि देश में एक फीसदी लोगों के पास 73 प्रतिशत सम्पत्ति है. सम्पत्ति का यह असमान वितरण जल्दी ही दूर करना होगा. साथ ही, दलित उत्पीड़न के विरुद्ध और मुस्लिम समुदाय की सुरक्षा के पक्ष में भी उन्होंने आवाज़ उठायी है.


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इन सभी मांगों में समाजवादी पार्टी की पूरी तरह सहमति रही है. सपा खुद सामाजिक न्याय के मुद्दों को जोर शोर से उठा रही है. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने जातियों की आबादी के अनुपात में रिजर्वेशन देने की बात की है. धर्मेंद्र ने लोकसभा में पार्टी की नीतियों को ही जोरदार तरीके से रखा.

खासकर फूलपुर, गोरखपुर और कैराना के लोकसभा चुनाव में सपा उम्मीदवार को बसपा का समर्थन मिलने और सपा-बसपा के करीब आने के बाद उन्होंने दलितों के मुद्दों को ज्यादा प्रखरता से उठाया. चूंकि लोकसभा में बसपा का कोई प्रतिनिधि नहीं है, इसलिए इस कमी को भी धर्मेंद्र यादव ने काफी हद तक पूरा किया.

(लेखक दिल्ली यूनिवर्सिटी में शिक्षक रहे हैं.)


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