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अर्धकुंभ में सफाईकर्मियों के पैर धोते नरेंद्र मोदी | नरेंद्र मोदी के फेसबुक पेज से.
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कुंभ में अनेक राजनीतिक दलों के नेता अक्सर स्नान करने जाते रहे हैं. उसी कड़ी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्नान किया गया. लेकिन यह इसलिए विशेष रहा, क्योंकि उन्होंने वहां पांच सफाईकर्मियों के पैर धोये और उनके पैर तौलिये से पोंछा भी. इस प्रोग्राम की जानकारी पहले से नहीं थी. जिन पांच लोगों के उन्होंने पैर धोये, उनमें से तीन पुरुष और दो महिलाएं हैं. उन्हें भी इस बात का अहसास नहीं था कि प्रधान मंत्री उनके पैर धोयेंगे. इस तरह उनको भी बहुत सुखद आश्चर्य हुआ.

प्रधानमंत्री के इस काम के कई राजनीतिक अर्थ लगाए जा रहे हैं. एक बड़ा तर्क जो आ रहा है, वह यह है कि ऐसा नहीं हो सकता कि प्रधानमंत्री बिना ठोस कारणों से ऐसा करेंगे. राजनीतिक रूप से यह कदम इसलिए उठाया गया है कि ताकि वे दिखा सके कि वे दलितों की बहुत इज्जत करते हैं, सम्मान करते हैं. राजनीतिक गलियारों में यह कयास लगाए रहे हैं कि उन्होंने दलितों का वोट लेने के लिए ऐसा किया है. इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं है.


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यहां कई प्रश्न हैं. सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या पैर छूने से दलित बीजेपी के पक्ष में वोट करेंगे?

नरेंद्र मोदी ने जो किया है, उसे राजनीति शास्त्र की भाषा में टोकेनिज़्म पॉलिटिक्स यानी प्रतीकवाद की राजनीति माना जाता है. यह कोई नई पॉलिटिक्स नहीं है. दलितों के घर खाना खाना भी इसी रणनीति का हिस्सा है. भाजपा के कई नेता प्रचार के लिए दलितों के घर खाना खा चुके हैं. आरएसएस इसके लिए पूरा अभियान चला चुका है. ऐसा करने वालों का मानना है कि इससे अछूतपन दूर होता है और दलित समाज हिन्दू समाज से जुड़ता है. आरएसएस एक ऐसी समाज व्यवस्था चाहता है जिसमें जातिभेद कायम रहे, लेकिन सभी जातियां मिल जुलकर रहें. यही समरसता है. आरएसएस का मानना है कि दलितों के साथ बैठने, खाना खाने जैसे प्रोग्राम से हिन्दू समाज में समरसता आएगी.

इसी के तहत नरेंद्र मोदी ने दलितों के पांव धोए हैं. लेकिन ये समझना जरूरी है कि समरसता से जातियां कमजोर नहीं होंगी, क्योंकि यह जाति उन्मूलन का कार्यक्रम नहीं है. ये जातियों के बीच टकराव को टालकर जातियों को मजबूत करने का कार्यक्रम है.

वैसे यह टोकेनिज़्म केवल भाजपा नेताओं ने ही नहीं किया, बल्कि दलितों के घर खाना खाने का काम कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी किया है. खाना-पीना तो होता रहता है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पैर धोना अपने में एक नई घटना है.

यहां प्रश्न है कि कि इससे क्या होगा? क्या दलितों को सम्मान मिल जायेगा?

कुछ साल पहले उज्जैन में कुंभ मेला के दौरान भी ऐसा ही प्रोग्राम रखा गया था, जिसमें एक घाट पर सवर्णों और दलितों को नहाना था. बाद में जब यह प्रोग्राम मीडिया में चर्चा में आया तो भाजपा प्रवक्ता ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि भाजपा ने ऐसा कोई प्रोग्राम नहीं रखा था.

सवाल उठता है कि मोदी को चुनाव आते ही ऐसी टॉकेनिज़्म पॉलिटिक्स करने की जरूरत क्यों पड़ गयी? बात ऐसी है कि मोदी सरकार से दलित समाज बहुत नाखुश है. यह बात उस वक्त ही पता चल गयी थी जब पिछले साल अनुसूचित जाति – जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के मसले पर 2 अप्रैल को भारत बंद हुआ था और पूरे देश में प्रदर्शन हुए थे. अभी पिछले महीने सरकार और कोर्ट ने 13 पॉइंट रिजर्वेशन रोस्टर लागू कर दिया है, जिससे एससी, एसटी, ओबीसी के उम्मीदवारों के लिए यूनिवर्सिटी-कॉलेज में फैकल्टी यानी टीचर बनने की संभावना लगभग खत्म हो गयी है.

इस तरह रिजर्वेशन पर लगातार हमला किया जा रहा है. रिजर्वेशन खत्म करने की बात गाहे-बगाहे भाजपा नेता बोल भी देते हैं. पब्लिक सेक्टर प्राइवेट हाथो में बेचे जा रहे हैं, जिससे वहां आरक्षण खत्म हो रहा है. नौकरशाही में उच्च स्तर पर दलित न के बराबर हैं. कैबिनेट में भी दलित अपनी आबादी के अनुपात में नहीं हैं. यहां तक कि भाजपा अपने सहयोगी दलित नेताओं, जो उसके साथ रहे हैं, को भी नजरअंदाज कर रही है. रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष रामदास आठवले इसके उदहारण हैं.

अब बात सफाईकर्मी की आती है. पूरे शहर की गंदगी दूर करने की जिम्मेदारी सफाईकर्मी की होती है, जो अक्सर वाल्मीकि समाज से आते हैं. सफाई करने के लिए इनको कई बार सीवर में उतरना पड़ता है जो कि बेहद जोखिम भरा कार्य है. जहरीली गैस से आये दिन उनमें से कई की मृत्यु हो जाती है. सफाई करने के लिए आधुनिक व्यवस्था नहीं है. जमाना इतना आगे बढ़ गया और विज्ञान ने इतना विकास कर लिया किन्तु सीवर में घुसकर सफाई करने की व्यवस्था वही सैकड़ों साल पुरानी है. उसमें कोई विकास नहीं हुआ. इस तरह से उनके मानवाधिकार का हनन प्रतिदिन हो रहा है.

नरेंद्र मोदी सरकार और बाकी राज्य सरकारों की नीति उनको स्थायी नौकरी देने की नहीं है. सामाजिक सुरक्षा की गारंटी उन्हें नहीं है. जिन सफाईकर्मी की सीवर में मौत हो जाती है उनके आश्रितों को कोई नौकरी नहीं दी जाती है, और न उनके बच्चो को पढ़ाई-लिखाई की व्यवस्था प्रदान की जाती है. वे कॉन्ट्रैक्ट (ठेका) पर कम सैलरी पर काम करने को मज़बूर हैं. यदि सरकार उनके लिए चिंतित होती तो उनको सरकारी नौकरी प्रदान करती. नरेंद्र मोदी ने ऐसा कुछ भी नहीं किया है.

सफाईकर्मियों के लिए लम्बे समय से आंदोलन कर रहे बेज़वाड़ा विल्सन ने इस संबंध में सवाल उठाया है कि ‘क्या सफाईकर्मी इतने तुच्छ हैं कि उनका पांव धोकर सम्मान किया गया है? इससे किसका महिमामंडन हो रहा है? जिसका पांव धोया गया या जिसने पांव धोया है? अगर पांव धोना ही सम्मान है तो फिर संविधान में संशोधन कर पांव धोने और धुलवाने का अधिकार जोड़ दिया जाना चाहिए.’


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नरेंद्र मोदी द्वारा सफाईकर्मियों के पैर धोने के खिलाफ दिल्ली में वाल्मीकि समाज द्वारा एक धरना प्रदर्शन किया किया. उसमें सफाईकर्मियों ने कहा कि, ‘हमें पूजने से पहले, जीवन का अधिकार चाहिए.’ सफाईकर्मी मनुष्य हैं, उन्हें पूजा नहीं जाना चाहिए, बल्कि उन्हें मानवीय अधिकार चाहिए. देश की सरकार उनके साथ सम्मान करने का दिखावा कर रही है.

जाति भारतीय आदमी के दिमाग में हैं, और मोदी पैर धो रहे हैं

दलितों को आज समरसता और इस टोकेनिज़्म पॉलिटक्स से ज्यादा जरूरत इस बात की है कि उनके सामाजिक-आर्थिक उन्नति के लिए कुछ ठोस प्रोग्राम चलाये जायें, उनके आर्थिक सशक्तीकरण के लिए रोजगारपरक योजनाएं चलाई जायें. दलितों को जरूरत समानता की है. जब समाज में समानता आ जाएगी, समरसता अपने आप आ जाएगी.

(लेखक फिलॉसफी में पीएचडी हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी में शिक्षक रहे हैं.)


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