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प्रतीकात्मक तस्वीर : ब्लूमबर्ग
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आरक्षण की बहस में अक्सर ये तर्क आता है कि आरक्षण का आधार जाति नहीं गरीबी को होना चाहिए क्योंकि असमानता का कारण गरीबी है. लेकिन अब एक नया शोध सामने आया है, जिससे जाति और असमानता के बीच के रिश्ते का पता चला है. ये शोध बताता है कि भारत में ऊंची जातियां तेज़ी से अमीर हो रही हैं, जबकि नीचे की जातियां या तो अपनी जगह स्थिर हैं या फिर गरीब हो रही हैं. इस शोध में ये भी बताया गया है कि ऊंची जातियों का तेज़ी से अमीर होना क्यों संभव हो रहा है और निचली जातियां क्यों गरीब होती जा रही हैं?

बढ़ती हुई आर्थिक असमानता को जबसे वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम ने इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी समस्या घोषित किया है, तब से इस समस्या को लेकर दुनियाभर में काफी शोध हो रहा हैं. भारत में भी इस बारे में लगातार शोध हो रहे हैं और ये बात अब विवादों से परे है कि भारत में भी आर्थिक असमानता बढ़ रही हैं. आर्थिक असमानता को दुनिया में बहस के केंद्र में लाने में फ्रांसिसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी का बड़ा योगदान है.

थॉमस पिकेटी के ही छात्र नितिन कुमार भारती ने अभी हाल ही में एक पेपर प्रकाशित किया है जिसमें इन्होंने 1951 से 2012 तक भारत में आई आर्थिक असमानता के वर्गीय और जातीय चरित्र का अध्ययन किया है. इस अध्ययन में यह बात निकलकर आई है कि आर्थिक असमानता और जातीय असमानता साथ साथ बड़ रही है, जिसकी वजह से भारत में निचली जातियों का विकास या तो स्थिर हो गया है या फिर वे गरीब हो रहे हैं.

यह अध्ययन निचली जातियों की खराब शिक्षा पर चिंता व्यक्त करते हुए भारत के नीति निर्माताओं को आगाह करता है कि अगर इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में हालात और खराब हो जाएंगे. एक तरफ शिक्षा के निजीकरण ने शिक्षा की कीमत बढ़ा दी है, वहीं दूसरी तरफ नौकरियों के लिए दिन ब दिन तरह तरह की स्किल की मांग भी बढ़ती जा रही है. इसका परिणाम यह हो रहा है कि लोगों को शिक्षा पर ज़्यादा खर्च करना पड़ रहा है. चूंकि ज़्यादातर निचली जाति के लोग शिक्षा पर खर्च नहीं कर पा रहे हैं, इसलिए उनको अच्छी नौकरी नहीं मिल पा रही है.

तेज़ी से बढ़ रही आर्थिक असमानता को जाति के आधार पर दिया जाने वाला आरक्षण भी रोक पाने में कारगर नहीं हो पा रहा है.

शिक्षा के अलावा स्वास्थ्य दूसरा ऐसा क्षेत्र है, जोकि आर्थिक असमानता को बढ़ा रहा है.  दरअसल, स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण की वजह से आम लोगों को सेहत पर ज़्यादा खर्च करना पड़ रहा है, जिससे उनकी आय प्रभावित हो रही है. स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण से एक समस्या और निकलकर आ रही है, जो है जीवन प्रत्याशा यानी लाइफ एक्सपेक्टेंसी में फर्क. आजकल विभिन्न मंचों पर इस बात पर बहस चल रही है कि क्यों भारत में उच्च जाति के लोग ज़्यादा उम्र तक जिंदा रहते हैं, जबकि निचली जाति के लोग कम उम्र ही पूरी कर पाते हैं? एक शोध से पता चला है कि एक औसत दलित महिला सवर्ण महिला की तुलना में 14 साल पहले मर जाती है. जीवन प्रत्याशा में असमानता एक नए किस्म की असमानता है जोकि कहीं ना कहीं आर्थिक असमानता से जुड़ी हुई है.

असमानता बढ़ने के तीन प्रमुख कारण

वैश्वीकरण, जनसंख्या वृद्धि और तकनीकी क्रांति बढ़ती आर्थिक असमानता के तीन प्रमुख कारण के तौर पर चिन्हित किए गए हैं. भारत में ये तीनों कारण अपने तरीके से काम कर रहे हैं.

वैश्वीकरण ने निजीकरण को बढ़ावा दिया, जिससे 1980 के बाद बड़े पैमाने पर सार्वजनिक संपत्ति का ट्रान्सफर निजी क्षेत्र को हुआ है, जिससे टॉप एक प्रतिशत आबादी की संपत्ति में बेहताशा वृद्धि हुई है. उक्त सार्वजनिक संपत्ति का निर्माण सरकारों नें आज़ादी के बाद  आदिवासियों, किसानों, दलितों, पिछड़ों आदि को विस्थापित करके किया था.

भारत में यह संपत्ति उच्च जातियों के कुछ मुट्ठीभर लोगों को हस्तांतरित हुई. अर्थव्यवस्था के निजीकरण से उच्च जातियों के व्यवसायियों को वित्तीय संस्थाओं ने बड़ी मात्रा में कर्ज़ दिया, और उस कर्ज़ को बाद में सरकारों ने माफ कर दिया. निचली जातियों का इन संस्थाओं में कोई नेटवर्क नहीं था, इसलिए इनको कर्ज़ नहीं मिला या कम मिला. इसके अलावा नयी अर्थव्यवस्था में हुए शहरीकरण ने भी उच्च जातियों को हाउसिंग कालोनी आदि के माध्यम से काफी फायदा पहुंचाया है. बड़े शहरों में रियल एस्टेट मे आई तेज़ी ने मुख्य रूप से उच्च जातियों को ही लाभ पहुंचाया है.

निजीकरण की वजह से ठेकेदारी प्रथा का तेज़ी से विस्तार हो रहा है. साफ-सफाई से लेकर लिपिकीय कार्य जैसे छोटे-छोटे काम जहां निचली जाति के लोग बहुतायत संख्या में नौकरी करते थे, को अब उच्च जातियों की फर्मों/कंपनियों को सौंप दिया जा रहा है, जोकि नेटवर्क और कनेक्शन के आधार पर लोगों को नौकरी पर रख रही हैं. ये फर्म/कंपनी न्यूनतम मज़दूरी जैसे क़ानूनों की सारे आम धज्जियां उड़ा रही है, जिसका भुक्तभोगी ज़्यादातर निचली जाति के लोग हैं.

वैश्वीकरण ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को संचालित करने के लिए, एक ग्लोबल मार्केट का निर्माण किया. ग्लोबल मार्केट दुनियाभर के देशों की सरकारों पर अपनी अर्थव्यवस्था को खोलकर वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ने का दबाव बना रही है, लेकिन सरकारों के ऐसा करते ही, उनकी अर्थव्यवस्था उनके अपने कंट्रोल से धीरे-धीरे बाहर होती चली जा रही है. ऐसी स्थिति में कोई सरकार चाहकर भी आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए अपनी मर्ज़ी से नीतियां नहीं बना पा रही है.

जनसंख्या में बढ़ोतरी

वैश्वीकरण के बाद, जनसंख्या वृद्धि ऐसा दूसरा महत्वपूर्ण कारक है, जिसकी वजह से दुनियाभर में आर्थिक असमानता तेज़ी से बढ़ रही है. लेकिन जनसंख्या वृद्धि, विकसित देशों और विकाशसील देशों में अलग-अलग तरीके से आर्थिक असमानता को बढ़ा रही है. दरअसल, विकसित देशों में जनसंख्या वृद्धि या तो बहुत ही कम है, और कहीं-कहीं तो नकारात्मक भी है, जिसकी वजह से इन देशों में धन एवं संपत्ति का बंटवारा नहीं हो पा रहा है, जिससे वहां धन एवं संपत्ति चंद लोगों के हाथ में ही सिमटती जा रही है. ऐसे में जिन लोगों के पास लंदन, पेरिस, न्यूयॉर्क जैसे शहरों में पुश्तैनी ज़मीन है, वो अपने आप बिना मेहनत किए हुए ही सुपर अमीर की श्रेणी में शामिल होते जा रहे हैं. ऐसे सुपर अमीर अपनी बेहतरीन ज़िंदगी केवल अपनी पुश्तैनी संपत्ति से मिल रहे किराए की बदौलत हासिल कर पा रहे हैं. आजकल भारत के प्रमुख शहरों में भी एक ऐसा वर्ग देखने को मिल रहा है जोकि मुख्यतः उच्च जातियों से है.

विकसित देशों के विपरीत भारत जैसे विकासशील देश तेज़ी से हो रही जनसंख्या वृद्धि की चपेट में हैं. यह जनसंख्या वृद्धि इन देशों में बड़ी संख्या में कामगारों का सृजन कर रही है, परंतु ये कामगार, जोकि अमूमन निचली जातियों से हैं, बिना कौशल और स्किल के हैं.  विकासशील देशों के पास इतना संसाधन नहीं है कि वो अपनी पूरी जनसंख्या को तकनीकी शिक्षा दिलवा सकें. इस वजह से यह जनसंख्या बिना किसी स्किल के जॉब मार्केट में आ रही है, और कम वेतन पर काम कर रही है. अर्थव्यवस्था के तकनीकीकरण नें असंगठित क्षेत्र का भी विस्तार हो रहा है, जहां काम करने वाले मुख्यत निचली जातियों के लोग ही हैं.

सूचना एवं तकनीकी क्रांति

1990 के बाद आई सूचना एवं तकनीकी क्रांति के तमाम फायदे हैं, लेकिन आर्थिक असमानता को बढ़ाने में ये भी एक भूमिका अदा कर रही है. सूचना क्रांति के कारण अर्थव्यवस्था अब स्किल और ज्ञान आधारित बनती जा रही है. इस अर्थव्यवस्था में जिन लोगों के पास तकनीकी ज्ञान है, वो काफी ज़्यादा वेतन पा रहे हैं, जैसे कि विश्व की सुपर अमीर आबादी में भी जो टॉप 0.1 प्रतिशत आबादी है, वो बड़े बैंकों के मैनेजर, इंजीनियर, कंपनियों के सीएसओ हैं, जोकि तकनीकी परक नौकरी है. लेकिन जिन लोगों के पास कोई तकनीकी ज्ञान नहीं हैं, उनके लिए नई अर्थव्यवस्था में ना के बराबर काम है.

स्किल कामगार की कमी की सूरत में नॉलेज इकोनोमी में कामगारों को आउटसोर्स कर लिया जा रहा है. चूंकि ऐसे कामगार कभी एक दूसरे से मिलते नहीं हैं, तो ट्रेड यूनियन नहीं बन पाता. आउटसोर्स से ट्रेड यूनियन की गतिविधि में भी काफी कमी आई है, जोकि मज़दूरों का वेतन ना बढ़ने का एक प्रमुख कारण है. इस वजह से अन्तर्राष्ट्रीय लेबर संगठन ने 2008 की अपनी वर्ल्ड वर्क रिपोर्ट में ट्रेड यूनियन की संख्या में आई कमी को आर्थिक असमानता बढ़ने का एक प्रमुख कारण बताया है. आउटसोर्स किए जाने वाले कामों का फायदा भी विदेशों में बैठा उच्च जाति का प्रवासी भारतीय ही उठा रहा है. निचली जातियों के लोग यहां भी पीछे रह जा रहे हैं, जिससे इनकी आमदनी में फर्क पड़ रहा है.

नॉलेज इकॉनोमी में जिन कामगारों के पास कोई स्किल नहीं हैं, वो असंगठित क्षेत्र में धकेल दिये जा रहे हैं. इस वजह से पिछले कुछ वर्षों में असंगठित क्षेत्र का काफी विकास हुआ है, विकासशील देशों में तकनीकी रहित जनसंख्या ज़्यादा है, इसलिए वहां असंगठित क्षेत्र का ज़्यादा तेज़ी से विकास हो रहा है. असंगठित क्षेत्र में नौकरी का कोई संरक्षण नहीं है, जिससे सैलरी भी काफी कम मिलती है. इसके अलावा सरकार की स्वास्थ्य, बीमा, पेंशन की सुरक्षा योजनाएं भी अमूमन इस क्षेत्र के मज़दूरों पर लागू नहीं होती. ऐसे में इन कामगारों को ये सुविधाएं लेने के लिए अपनी वेतन का बड़ा हिस्सा ज़्यादा खर्च करना पड़ता है, जिससे इनकी आमदनी कम होती जाती है.

भारत में असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले ज़्यादातर निचली जाति के ही लोग मिलते हैं.

यदि जाति को केंद्र में रखकर भारत की तकनीकि और प्रबंधन शिक्षा की पड़ताल की जाये तो सरकारों की ऐसी नीति रही है कि निचली जाति के लोग इन संस्थाओं में पहुंच ही नहीं पाएं. इसके लिए सरकारों की दोहरी शिक्षा नीति ज़िम्मेदार है, जिसके तहत आम जनमानस के लिए केवल साक्षरता का प्रावधान किया गया था, जबकि इलीट के लिए उच्च शिक्षा का.

चूंकि भारत में ज़्यादातर इलीट उच्च जाति से ही आते रहे हैं, इसलिए यहां तकनीकी और प्रबंधन की शिक्षा का सबसे पहले फायदा उन्हीं को मिला. कमोबेश यही हालत खेल, फिल्म जगत, पत्रकारिता आदि मे भी रहा. नितिन भारती का अध्ययन निजीकरण और उसमें बने नेटवर्क समाज का असमानता बढ़ाने में योगदान तो बताता है, लेकिन सरकारों को दोहरी नीतियों को गहराई ने नहीं उजागर कर पाता.

इन स्थितियों के कायम रहते हुए तय है कि भारत में उच्च जातियां लगातार अमीर होती जाएंगी और निचली जातियों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हो पाएगा. इस नियम के व्यक्तिगत अपवाद होंगे, लेकिन समूह के तौर पर असमानता बढ़ती रहेगी.

(लेखक जेएनयू में शोधार्थी हैं, जोकि दुनियाभर में बढ़ रही आर्थिक असमानता पर शोध कर रहे हैं)


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