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अखिलेश यादव, सतीश मिश्रा और अजित सिंह के साथ आकाश आनंद/ट्विटर
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बहुजन समाज पार्टी के शुभचिंतकों में यह खुसर-फुसर शुरू हो गई थी कि अगर चुनाव आयोग ने बहनजी पर बैन लगा दिया है तो ऐसे मौके पर उन्हें अपने भतीजे आकाश आनंद को मंच पर उतार कर चुनाव आयोग को मुंहतोड़ जवाब देना चाहिए. खुद पर 48 घंटे का बैन लगाए जाने के बाद से ही बहनजी गुस्से में थीं. 15 अप्रैल को चुनाव प्रचार खत्म कर वापस लौटने के बाद उन्होंने मीडिया के सामने अपनी बात भी रखी थी. उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा ‘अगर ऐसा ही भेदभाव व बीजेपी नेताओं के प्रति चुनाव आयोग की अनदेखी व गलत मेहरबानी जारी रहेगी तो फिर इस चुनाव का स्वतंत्र व निष्पक्ष होना असंभव है. इन मामलों मे जनता की बेचैनी का समाधान कैसे होगा?’

ऐसे में सबका ध्यान इस ओर था कि बिना बसपा प्रमुख के आगरा में महागठबंधन की 16 अप्रैल की रैली कैसी होती है. आगरा के आस-पास के शहरों से स्वेच्छा से रैली में जाने की तैयारी में जुटे कई लोग ऐसे भी थे, जिन्होंने रैली में जाने का अपना कार्यक्रम भी रद्द कर दिया था. ऐसे में बसपा के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती थी कि बिना पार्टी की मुखिया के रैली कैसी रहती है.


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उसके सामने कार्यकर्ताओं का उत्साह बनाए रखने की भी चुनौती थी. यूं तो रैली महागठबंधन की थी, लेकिन बसपा की जिम्मेदारी इसलिए ज्यादा थी क्योंकि यहां से गठबंधन के प्रत्याशी (मनोज सोनी) मैदान में थे और आखिरकार वही हुआ, जिसकी अटकलें लग रही थी. बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को मंच पर उतार दिया.

जाहिर है कि आकाश का संबोधन वैसा ही था; जैसा कोई पहली बार मंच से बोलता है. लेकिन अपने इन कुछ मिनटों के संबोधन में ही वह लोगों से जुड़ने की कोशिश करते दिखे. मंच से अपने पहले संबोधन में 4 मिनट में तीन बार लोगों से सीधा संवाद, उनके उल्लास पर ठहरना एक अच्छी कोशिश थी. उनके बोलने के तरीके में एक उतार-चढ़ाव था, जो एक वक्ता के लिए जरूरी है.

आकाश के भाषण को हम तीन हिस्सों में देख सकते हैं. वह तकरीबन 4 मिनट के आस-पास बोले. एक-एक शब्द पर जोर देकर उन्होंने पार्टी अध्यक्ष का संदेश पढ़ा. शुरुआत बसपा की परंपरा के मुताबिक ‘जय भीम’ से हुई. लेकिन जय भीम का यह संबोधन जोश में लोगों को संबोधित करता हुआ था. आकाश के ‘जय भीम’ बोलने में एक उत्साह था. शुरुआती पहले मिनट में वह मंचासीन अतिथियों को संबोधित करते रहे. उसके बाद जैसे ही उन्होंने पार्टी अध्यक्ष की बात की, भीड़ से एक शोर उठा. तब आकाश बोलते नहीं रहे, बल्कि ठहरकर उस ऊर्जा को सम्मान दिया.


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दूसरे हिस्से में 2.35-2.45 के वक्त को रखा जा सकता है. उस दौरान उन्होंने अपनी अपील करते हुए लोगों से सीधा संवाद करने की कोशिश की. सामने बैठे समर्थकों के हुजूम से आंख से आंख मिलाकर बात की. जब आकाश ने बसपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों से पूछा कि क्या आप लोग मेरी बात मानेंगे? भीड़ से आवाज आई. उन्होंने ठहर कर फिर पूछा- ‘सुनाई नहीं दिया, क्या आप लोग मेरी बात मानेंगे’? भीड़ ने और तेज ‘हां’ में जवाब दिया. ऐसा कर आकाश ने लोगों से जुड़ने की अच्छी कोशिश की.

अपने भाषण के आखिरी हिस्से में गठबंधन के प्रत्याशियों के लिए वोट की अपील करते हुए वह सामने वाले प्रत्याशी की जमानत जब्त कराने को लेकर अपील की. उन्होंने सामने बैठे कार्यकर्ताओं से पूछा- ‘सामने वाले प्रत्याशी की जमानत जब्त कराएंगे न’? भीड़ ने सकारात्मक जवाब दिया. कहा जा सकता है कि वह अपनी पहली परीक्षा में पास हुए.

बहुजन समाज पार्टी ने 17वीं लोकसभा के लिए जब अपनी पार्टी के स्टार प्रचारकों की सूची जारी की तो उसमें उनका नाम पार्टी अध्यक्ष मायावती और राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा के बाद तीसरे नंबर पर था. यह थोड़ा अजीब था, क्योंकि बसपा में दशकों से लगे कई नेताओं का नाम युवा आकाश के नीचे था. ऐसे में जब मायावती चुनाव प्रचार के लिए मैदान में उतरीं तो हर रैली में उनके साथ आकाश मौजूद रहे. इससे पहले अखिलेश यादव से लेकर भीम आर्मी के चंद्रेशेखर आजाद ने मायावती को अपनी बुआ कहा, लेकिन हर बार बहनजी ने निर्ममता से उनके दावे को खारिज किया. मगर आकाश मायावती के आधिकारिक भतीजे के तौर पर मैदान में उतरे थे. मायावती हर रैली में लोगों से उनका परिचय करा रही थीं. उन्हें पता था कि आकाश को कब और किस तरह लोगों के सामने लाना है.

हालांकि वह बसपा के नेताओं के लिए कोई नया चेहरा नहीं थे. वो तकरीबन एक साल से लगातार बसपा की बैठकों में पार्टी अध्यक्ष के आस-पास देखे जा रहे थे. वह उन महत्वपूर्ण बैठकों में भी मौजूद रहते थे, जिसमें देशभर के पदाधिकारियों को बुलाया जाता था.

लेकिन भीम आर्मी और चंद्रशेखर आजाद की युवाओं के बीच बढ़ती लोकप्रियता ने मायावती पर भी एक युवा चेहरे को सामने लाने का दबाव जरूर बनाया होगा. यही वजह रही थी कि सहारनपुर जाते वक्त मायावती अपने साथ भतीजे आकाश को भी ले गईं. यह पहली बार था जब आकाश के नाम की चर्चा हुई. मीडिया में उनकी तस्वीरें घूमने लगीं. उनको लेकर कयास लगने लगे. ऐसे में जब मायावती के जन्मदिन पर आकाश बुआ के साथ दिखे तो उनको लेकर अटकलें तेज हो गईं. मीडिया ने मामले को और तूल दिया तो मायावती ने भी अपने चिर परिचित स्वभाव के मुताबिक आकाश को राजनीति में लाने की घोषणा कर दी.

तब से लेकर अब तक आकाश के राजनीति में उतारे जाने और मायावती के परिवारवादी होने को लेकर तमाम बहस हो चुकी है, लेकिन बसपा कार्यकर्ताओं को देखकर लगता है कि उन्होंने आकाश को अब पार्टी के नए चेहरे के रूप में स्वीकार कर लिया है. मायावती पर चुनाव आयोग के 48 घंटे के प्रतिबंध और आगरा में आकाश के द्वारा मंच से संबोधन ने बसपा कार्यकर्ताओं और आकाश के बीच मौजूद दीवार को भी गिरा दिया है. आकाश जिस तरह से कार्यकर्ताओं के सामने आए, संभव है कि मायावती खुश होंगी.


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कहा जा सकता है कि मायावती के छोटे भाई आनंद के बेटे आकाश ने अपनी नई पारी आधिकारिक तौर पर शुरू कर दी है. आगे की राह बहुत आसान नहीं है. वह जैसे-जैसे पुराने होंगे, उनके सामने खुद को स्थापित करने की चुनौती होगी. उनके सामने बसपा कार्यकर्ताओं से संवाद और उनसे भावानात्मक तौर पर जुड़ने की चुनौती होगी और यहां उनकी मदद के लिए बुआ नहीं होंगी, बल्कि यह उनकी काबिलियत पर निर्भर करेगा. यह इस पर भी निर्भर होगा कि मायावती आकाश को कितनी छूट देती हैं. सारा घटनाक्रम जिस तरह घटित हुआ, अब कहा जा सकता है कि आकाश के रूप में बसपा के भीतर एक नया दौर शुरू हो चुका है.

(लेखक मासिक पत्रिका ‘दलित दस्तक’ के संपादक और प्रकाशक हैं. दलित दस्तक के नाम से ही ‘यू-ट्यूब चैनल’ चलाते हैं और ‘दास पब्लिकेशन’ के जरिए प्रकाशन के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं.)


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