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प्रतीकात्मक तस्वीर | गेटी इमेजेज
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कुछ दिनों पहले की बात है. चुनाव घोषित हो चुके थे. उन्हीं दिनों एक भाजपाई साथी मिले. बताने लगे कि पार्टी ने उन्हें जिले में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है. मेरे मुंह से बरबस निकल पड़ा, ‘मैं आपकी पार्टी का समर्थन नहीं करता.’

‘कोई बात नहीं.’ उन्होंने सहज भाव से कहा. लेकिन जैसे मैं अपना आक्रोश छिपाने में नाकाम रहा था, वे भी पार्टी मोह छिपाने में असमर्थ रहे. बोले, ‘पार्टी के कारण ही आज शहर में ‘समाज’ के छह-सात पार्षद हैं.’

भारत में ‘समाज’ का मतलब जाति से होता है. हिंदुओं में 3000 जातियां और उससे कई गुना ज्यादा उपजातियां हैं. इनमें से मुट्ठी-भर ऐसी हैं, जिनका समाज में मान-सम्मान है. जो समस्त सुख-सुविधाओं, संसाधनों तथा अधिकारों से संपन्न हैं. बाकी लगभग 85 प्रतिशत में अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, जनजाति सम्मिलित हैं. उनके पास न अधिकार हैं, न संसाधन और न ही मान-सम्मान.


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जाति से मुक्ति के लिए जाति की शरण में चले गए लोग

लोकतंत्र ने हालांकि काफी कुछ बदला है. लेकिन उनमें से अधिकांश के हालात आज भी पहले जैसे हैं. खास कर जाति को लेकर. आजादी से पहले माना जाता था कि जातिवाद की कैद में फंसे हिंदू समाज के लिए लोकतंत्र मुक्ति का संदेश लेकर आयेगा. लेकिन सुधरने के बजाय हालात और ज्यादा खराब हुए हैं. इससे हताश-निराश लोग जातिवाद की काट के लिए, जाति की ही शरणागत होने लगे हैं.

जाति-व्यवस्था की खूबी है कि प्रत्येक जाति अपने संतोष के लिए, अपने से निचली जाति को खोज लेती है. इसी कारण देश का 70 साल पुराना लोकतंत्र सामंती संस्कारों से उबर नहीं पाया है. आज भी जाति के नाम पर संस्थाएं बनती हैं, वोट मांगे जाते हैं; गांव-देहात में तो मुहल्ले तक बंटे होते हैं. मंदिर-मस्जिद के नाम पर सरकारें बनती-गिरती रहती हैं. आदमी से ज्यादा अहमियत गाय की जान की मानी जाती है.

जातियों में लोकतांत्रिक चेतना का अभाव

लोग भावनात्मक मुद्दों पर मतदान करते हैं. न्याय और अधिकारों के लिए होने वाले आंदोलन बहुत कम होते हैं. जो होते हैं, उनकी बागडोर प्राय: शिखरस्थ जातियों के अधीन होती है. इसलिए हालात में एक सीमा से अधिक परिवर्तन संभव नहीं हो पाता. लोकतांत्रिक समझ के अभाव में जनसाधारण अपने अधिकांश फैसले परंपरा और संस्कृति के आधार पर लेता है, इसलिए आधुनिक भावबोध से दूर बना रहता है.

जिस समाज की दुहाई मेरे वे मित्र दे रहे हैं, उसकी विपन्नता और दैन्य के अन्यान्य कारणों में से एक लोकतांत्रिक चेतना का अभाव भी है. लोग मतदान करते समय अक्सर भावनाओं में बह जाते हैं. इसलिए उनकी गिनती देश के सबसे चलायमान मतदाताओं में होती है. मामूली प्रलोभन से उनके फैसले बदल जाते हैं. भावावेश में लिया गया मतदान का निर्णय स्थायी नहीं होता. यही कारण है कि वोट देने के बाद वे नेता को भूल जाते हैं, नेता उन्हें. उम्मीद के हिसाब से न हो तो किस्मत को दोष देने लगते हैं.

जाति की राजनीति में समाज के मुद्दे पीछे छूटे

बहरहाल, वह उन मित्र महोदय से पूछना चाहते थे कि ऐसे समाज को लोकतांत्रिक रूप से जाग्रत करने के लिए ‘समाज’ के उन नेताओं ने क्या किया है? उनके पास ऐसी कोई योजना है भी या नहीं? मैं उनसे यह भी कहना चाहता था कि जब सुरक्षित सीटों से चुनकर संसद भवन पहुंचे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के 131 जनप्रतिनिधियों के आगे आरक्षण पर हमला होता है, दलित और पिछड़े वर्गों के विद्यार्थियों को मिलने वाली छात्रवृत्ति में कटौती कर दी जाती है, असंवैधानिक सवर्ण आरक्षण को उनके देखते ही देखते लागू कर दिया जाता है; और वे मेज थपथपाकर सरकार को शाबाशी देने से ज्यादा कुछ नहीं कर पाते- तो छह-सात पार्षदों से क्या उम्मीद की जाए!

खासकर उनसे जो वर्ण व्यवस्था और जाति को आदर्श मानने वाली पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतकर संसद तक पहुंचे हों. मैं उनसे यह भी पूछना चाहता था कि बिना सामाजिक-सांस्कृतिक बराबरी के क्या राजनीतिक बराबरी का स्वप्न देखा जा सकता है? विशेषकर उस दल के सहयोग और समर्थन के जिसका चरित्र फासीवादी हो. जो हर परिवर्तन को संदेह की दृष्टि से देखता हो.

कमी उन मित्र की भी नहीं थी. आजादी के बाद से ही भारतीय राजनीति केंद्राभिमुखी रही है. जाति, धर्म और संप्रदाय के नाम पर विभाजित समाज में वैसी अधिकार चेतना पनप ही नहीं पाई जो जनप्रतिनिधियों पर दबाव डालकर उन्हें विचलन से बचा सके. ठीक है, लोकतांत्रिक चेतना की कमी सवर्णों में भी है. अगर वे लोकतांत्रिक रूप में परिपक्व होते या लोकतंत्र के प्रति उनकी निष्ठा असंद्धिग्ध होती तो जातिवाद से कभी के मुक्त हो चुके होते. लोकतंत्र से ज्यादा उनकी निष्ठा जातिवाद और परंपरा में है. उन्हीं के कारण विशिष्ट सुख-सुविधाएं तथा मान-सम्मान उन्हें बैठे-बैठाए प्राप्त हैं. लोकतंत्र की असली महत्ता और जरूरत तो दलितों और पिछड़ों के लिए है. जाति और धर्म के नाम पर बार-बार छ्ले गए दलित और पिछड़े, संगठित होकर ही अपने अधिकारों की लड़ाई को आगे बढ़ा सकते हैं.

जातिवाद से मुक्त का क्या है सही रास्ता?

जातिवाद, जिसे हिंदू धर्म और मानव-सभ्यता का कलंक भी कह सकते हैं, के विरोध में समय-समय पर आंदोलन भी हुए हैं. राजा राममोहन राय, केशवचंद सेन, स्वामी दयानंद, विवेकानंद, ईश्वरचंद विद्यासागर से लेकर डॉ. आंबेडकर और हाल में मान्यवर कांशीराम तक, सभी ने अपनी-अपनी तरह से जातिवाद के विरोध में आवाज उठाई है. लेकिन शताब्दियों लंबे आंदोलन के बावजूद कामयाबी आंशिक ही रही है.

जाति-उन्मूलन की दिशा में काम करने वालों को हम मुख्य रूप से दो वर्गों में बांट सकते हैं.

पहले वर्ग में उन लोगों को शामिल किया जा सकता है, जो जातीय सोपान में उच्च क्रम में थे. जिन्हें उससे सीधे कोई नुकसान न था. अपितु जाति की मौजूदगी उन्हें विशेषाधिकार संपन्न बनाती थी. वे जातिवाद का विरोध केवल इसलिए कर रहे थे क्योंकि तत्कालीन परिस्थितियों में वह हिंदूधर्म के लिए खतरा बन चुका था. इस्लाम और ईसाई धर्म से उसे भारी चुनौती मिल रही थी. वे मान चुके थे कि हिंदुओं को धार्मिक अल्पसंख्यक बनाने से रोकने के लिए उसमें थोड़े-बहुत सुधार अपरिहार्य हैं. गौरतलब है कि शिक्षा को हर किसी के लिए सुलभ बनाने के प्रश्न पर राममोहन राय जैसे समाज सुधारक की सोच भी संकीर्ण थी. राय चाहते थे कि सीमित संसाधनों का उपयोग पहले समाज की उच्च जातियों को शिक्षित करने के लिए किया जाए. जैसे-जैसे उच्च जातियों में शिक्षा का विस्तार होगा, उसका लाभ निचली जातियों को भी मिलेगा.


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जाति विनाश का फुले-आंबेडकरी पथ

जातिवाद का विरोध करने वालों में दूसरे वे लोग थे जिन्होंने जातिवाद के दंश को स्वयं झेला था. उनमें फुले की गिनती सबसे पहले की जाती है. शिक्षा के मामले में फुले की दृष्टि अपने पूर्ववर्ती समाज सुधारकों से एकदम अलग थी. उनका मानना था कि ब्राह्मण और उच्च जाति के लोग कभी नहीं चाहेंगे कि शूद्रों, अति शूद्रों में शिक्षा का प्रचार-प्रसार हो. इसलिए लड़कियों तथा शूद्रों-अति शूद्रों को शिक्षित करने के लिए उन्होंने स्वयं स्कूल खोले. सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए नियमित अभियान चलाए. लोगों को संगठित करने के लिए जगह-जगह सभाएं कीं.

फुले के बाद डॉ. आंबेडकर ने शूद्रों और अति शूद्रों के अस्मिता के संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए लगातार काम किया. उसके फलस्वरूप आज हालात कुछ सुधरे हैं, मगर सामाजिक, आर्थिक और राजनीति के क्षेत्र में दलितों, शूद्रों और अति शूद्रों की आनुपातिक हिस्सेदारी आज भी बहुत कम है. लंबे समय तक ज्ञान की दावेदारी से वंचित रहने के कारण उनमें साहस और आत्मविश्वास की कमी है. ढाई हजार जातियों तथा उससे 10 गुना उपजातियों में बंटे होने के कारण उनकी शक्ति निष्प्रभावी हो जाती है. जाति-आधारित स्तरीकरण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यादि में भी होता है. मगर सत्ता में बने रहने की कोशिश उन्हें एक-दूसरे से जोड़े रखती है.

उनकी कोशिश रहती है कि राजनीति में चाहे जितनी जोड़-तोड़ करनी पड़े, मगर सामाजिक यथास्थिति बनी रहे. लोकतांत्रिक प्रक्रिया कि मजबूरी के चलते ब्राह्मण शूद्र के राजनीतिक-सामाजिक अधिकारों का समर्थन कर सकता है. लेकिन समाज में रहते हुए मनुस्मृति के दायरे को लांघने की हिम्मत नहीं होती. सामाजिक व्यवस्था में आमूल बदलाव का सपना देखने वालों के लिए यह बड़ी चुनौती है. बिना दलितों और पिछड़ों की अस्मिता को जगाए इसकी काट मुश्किल है.

लोकतंत्र की रक्षा केवल वंचितों तथा उत्पीड़न का शिकार रहे लोगों की एकता के भरोसे संभव है.

(साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन करने वाले ओमप्रकाश कश्यप की लगभग 35 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं.)


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