सुनील अरोड़ा और अशोक लवासा के बीच विवाद ने चुनाव आयोग को सुर्खियों में ला खड़ा किया है. पर ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. 1995 में जब टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे तब विवाद सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा था.
पूरे कुंए में इस कदर भांग पड़ गयी है कि किसी को भी अपनी जिम्मेदारी का भान नहीं, तो क्या आश्चर्य कि जो ईश्वरचंद विद्यासागर बंगाल की पुनर्जागरण काल की प्रमुख हस्तियों में से एक हैं.
ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी एक तबके ने भारतीय राष्ट्रीयता पर अपने एकाधिकार का दावा किया हो और गांधी की नीति पर भी चलने का छद्म भी. इसलिए मोदी अगर प्रज्ञा ठाकुर को अपने मन से कभी माफ न करें तो भी क्या फर्क पड़ जाएगा?
गोडसे के समर्थन में बयान अचानक नहीं आया है. आरएसएस वर्षों से शाखाओं में बच्चों को यही सब बातें सिखा रहा है, इसके असर में आए बच्चे, बड़े होने के बाद भी इस ज़हरीले प्रचार से मुक्त नहीं हो पाते.
दबंग जातियां शादी के दौरान घोड़ी पर चढ़ना अपना विशेषाधिकार समझती हैं, इसलिए दलितों द्वारा ऐसा करना उन्हें बगावत या सामाजिक ताने-बाने का टूटना लगता है. लेकिन ऐसी शादी करके दलितों को मिलेगा क्या?
फिल्मकार, पत्रकार और लेखक इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं देश के 20 करोड़ दलितों में एक अच्छा-खासा मिडिल क्लास पैदा हो चुका है, जो सूअर टहलाने वाला आदमी नहीं है!
एक पक्ष सोचता है कि आज भारत अपनी हैसियत से ज्यादा आगे बढ़कर कदम उठा रहा है, जबकि दूसरा पक्ष सोचता है कि मोदी ने भारत की हैसियत कमजोर कर दी है और भारत अपनी हैसियत से कम कदम उठा रहा है. सच यह है कि दोनों ही गलत हैं.