जन्म से ठाकुर, और यादव परिवार में शादी करने वाली डिंपल यादव जब एक प्रभावशाली दलित नेता के चरण स्पर्श करती हैं तो दरअसल वो उस वर्ण व्यवस्था को चुनौती देती हैं, जिसने हर जाति की महिलाओं और वंचित जातियों को निम्न बताया है.
आर्थिक क्षेत्र में जो गति हासिल की गई थी उसका दम निकल गया है और अर्थव्यवस्ता का हर पहलु मंदी दिखा रहा है क्योंकि पिछले 15 वर्षों में बहुत कम सुधार किए गए है.
सुनील अरोड़ा और अशोक लवासा के बीच विवाद ने चुनाव आयोग को सुर्खियों में ला खड़ा किया है. पर ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. 1995 में जब टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे तब विवाद सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा था.
पूरे कुंए में इस कदर भांग पड़ गयी है कि किसी को भी अपनी जिम्मेदारी का भान नहीं, तो क्या आश्चर्य कि जो ईश्वरचंद विद्यासागर बंगाल की पुनर्जागरण काल की प्रमुख हस्तियों में से एक हैं.
ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी एक तबके ने भारतीय राष्ट्रीयता पर अपने एकाधिकार का दावा किया हो और गांधी की नीति पर भी चलने का छद्म भी. इसलिए मोदी अगर प्रज्ञा ठाकुर को अपने मन से कभी माफ न करें तो भी क्या फर्क पड़ जाएगा?
गोडसे के समर्थन में बयान अचानक नहीं आया है. आरएसएस वर्षों से शाखाओं में बच्चों को यही सब बातें सिखा रहा है, इसके असर में आए बच्चे, बड़े होने के बाद भी इस ज़हरीले प्रचार से मुक्त नहीं हो पाते.
दबंग जातियां शादी के दौरान घोड़ी पर चढ़ना अपना विशेषाधिकार समझती हैं, इसलिए दलितों द्वारा ऐसा करना उन्हें बगावत या सामाजिक ताने-बाने का टूटना लगता है. लेकिन ऐसी शादी करके दलितों को मिलेगा क्या?
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण चुनाव जीतने की संभावना बढ़ाने के लिए किया गया लगता है, लेकिन एक बड़ा कानूनी सवाल है: क्या इससे उन पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है?