Monday, 24 January, 2022
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जब शेषन के काल में चुनाव आयोग के सदस्यों का झगड़ा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था

सुनील अरोड़ा और अशोक लवासा के बीच विवाद ने चुनाव आयोग को सुर्खियों में ला खड़ा किया है. पर ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. 1995 में जब टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे तब विवाद सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा था.

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निर्वाचन आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा और चुनाव आयुक्त अशोक लवासा के बीच छिड़ा विवाद कोई नया नहीं है. करीब 25 साल पहले इसी तरह की जंग तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन और चुनाव आयुक्त जीवीजी कृष्णामूर्ति के बीच छिड़ी थी.

देश के 10वें मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर 12 दिसंबर 1990 को नियुक्त पूर्व नौकरशाह टीएन शेषन ने पदभार ग्रहण करने के साथ ही संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत दिए अधिकारों का इस्तेमाल और चुनाव के दौरान आदर्श आचार संहिता को अधिक सख्ती से लागू करना शुरू किया. शेषन के कठोर रवैये से राजनीतिक दलों में हड़कंप मच गया था. राजनीतिक दल शेषन पर महाभियोग चलाकर उन्हें पद से हटाना भी चाहते थे.


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इसी दौरान, नरसिंह राव सरकार ने विवाद थामने के इरादे से 1 अक्तूबर, 1993 को एक रास्ता निकाला और चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय बना दिया. राष्ट्रपति ने 1 अक्तूबर, 1993 को ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों: सेवा शर्तः संशोधन अध्यादेश जारी करके इससे संबंधित 1991 के कानून में संशोधन कर दिया. इसके साथ ही एक अधिसूचना के ज़रिये जीवीजी कृष्णामूर्ति और मनोहर सिंह गिल को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था.
चुनाव आयोग 1950 से 15 अक्तूबर, 1989 तक एक सदस्यीय था. लेकिन वीपी सिंह सरकार ने 16 अक्तूबर, 1989 को पहली बार एक अधिसूचना के माध्यम से इसे बहुसदस्यीय बना दिया था. इस अधिसूचना के अंतर्गत मुख्य चुनाव आयुक्त आरवीएस पेरी शास्त्री के तहत दो चुनाव आयुक्तों एसएस धनोवा और वीएस सैगल की नियुक्ति की गयी थी. नयी व्यवस्था के सुचारू ढंग से काम करने से पहले ही राष्ट्रपति ने 1 नवंबर 1990 को इसे भंग कर दिया था.

नरसिंह राव सरकार के कार्यकाल में जारी इस अध्यादेश के माध्यम से मूल कानून चुनाव आयोग के कामकाज से संबंधित अध्याय में धारा नौ और 10 जोड़ी गई. इसमें प्रावधान था कि चुनाव आयोग मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों के बीच कामकाज के आबंटन और इसे करने की प्रक्रिया के बारे में सर्वसम्मति से निर्णय करेगा और यथासंभव सारे कामकाज सर्वसम्मति से किये जाएंगे लेकिन किसी मामले में मतैक्य नहीं होने पर बहुमत की राय से फैसला किया जायेगा.

अब तो आयोग में कामकाज और अधिकारों को लेकर महाभारत छिड़ गयी और मुख्य निर्वाचन आयुक्त टीएन शेषन के चेंबर में 11 अक्तूबर, 1993 को जीवीजी कृष्णामूर्ति के साथ उनकी तीखी नोंक-झोंक भी हुयी. यह मामला जब उच्चतम न्यायालय पहुंचा तो शेषन ने अपनी याचिका में कृष्णामूर्ति पर उन्हें गाली देने का भी आरोप लगाया. कृष्णामूर्ति ने इस आरोप का सिरे से खंडन किया और दूसरे चुनाव आयुक्त गिल ने भी शेषन के इस दावे का समर्थन नहीं किया.

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उच्चतम न्यायालय में प्रधान न्यायाधीश एएम अहमदी की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने इस मामले में 14 जुलाई, 1995 को अपना फैसला सुनाया. पीठ ने 1991 के कानून में संशोधन करने संबंधी अध्यादेश और दो चुनाव आयुक्त नियुक्त करने की अधिसूचना को वैध करार दिया था.

शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय बनाने के निर्णय को लेकर उठाये गये विभिन्न बिन्दुओं पर सिलसिलेवार व्यवस्था दी थी. यही नहीं, 1993-95 के दौरान शेषन और कृष्णामूर्ति के बीच छिड़े विवाद के आरोप प्रत्यारोप प्रेस की सुर्खियां बनने के बारे में भी न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि इस तरह से अपने मतभेद सार्वजनिक करने से कोई फायदा नहीं होगा बल्कि इससे मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त की छवि ही खराब होगी.

संविधान पीठ ने इस बात पर दुख व्यक्त किया था कि वे एक टीम की तरह काम नहीं कर रहे हैं और दोनों के बीच पुराने मतभेदों को भुला कर एकजुट होकर काम करने के गिल के प्रयास भी कारगर नहीं हो रहे हैं.

संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था कि इस कानून की धारा 10 की उपधारा एक और दो में आम सहमति का प्रावधान है और यदि आमसहमति नहीं होती है तो ऐसी स्थिति में धारा 10 की उपधारा 3 के तहत बहुमत से निर्णय का प्रावधान है.

न्यायालय ने कहा था कि यदि हम यह मान भी लें कि सिर्फ आयोग ही अपने कामकाज की प्रक्रिया निर्धारित करने के लिये सक्षम है तो भी उसे धारा 10 में प्रदत्त प्रक्रिया के अनुसार ही काम करना होगा.


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कुछ ऐसी ही स्थिति इस समय उत्पन्न हो गयी है. चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में क्लीन चिट देने के मामले में असहमति व्यक्त की थी. आयोग ने इस बारे में बहुमत से निर्णय लिया था.

लवासा ने इस पर आपत्ति करते हुये मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा को पत्र लिखा जिसमें असहमति को भी फैसले में दर्ज कराने का अनुरोध किया. हालांकि, सुनील अरोड़ा ने भी इस पत्र का जवाब देकर मामला खत्म करने का प्रयास किया है लेकिन लगता नहीं कि यह विवाद आसानी से खत्म होगा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं जो तीन दशकों से शीर्ष अदालत की कार्यवाही का संकलन कर रहे हैं.)

 

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