स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे हिंसक शासन के खिलाफ असाधारण चुनाव होने जा रहे हैं . इस हालत में बहुत रणनीतिक तरीके से यानी टेक्टीकल तरीके से वोटिंग करनी होगी.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को समाचार चैनलों ने 722 घंटों से अधिक समय तक दिखाया गया. वहीं इस दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को बहुत कम 252 घंटे का समय मिला.
नोटबंदी ने बुनकरों की कमर तोड़ दी क्योंकि उनका पूरा काम कैश में था. बाकी कसर जीएसटी ने पूरी कर दी, जिसकी पेचीदगियों से निपटने में वे अक्षम हैं. सबसे बुरी बात ये है कि सांप्रदायिकता की राजनीति ने उनकी आवाज भी छीन ली है.
ग्राम्शी इटली के वंचितों, गरीबों, सबऑल्टर्न के सवालों पर लगातार मुखर रहे और जेल में भी उनकी आवाज कमजोर नहीं पड़ी. उसी तरह लालू प्रसाद भी भारत में दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के सवाल पर लगातार मुखर रहे हैं.
बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ख़ुद एक मुसलमान नहीं हैं लेकिन वो नमाज पढ़ती हैं और रोजा भी रखती हैं. बहुतों का कहना है कि वो इस सच्चे दिल से नहीं करतीं और वो ये सब सिर्फ मुस्लिम वोटों के लिए करती हैं.
भारत में वामपंथ के नेतृत्व पर उच्च जातियों का क़ब्ज़ा रहा. जिसकी वजह से उनको जाति की समस्या को न देख पाने की बीमारी लग गयी है. यही वजह है कि जो पार्टी आजादी से लेकर 1962 तक देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी थी, वह विलोप की ओर बढ़ रही है.