सिराज जैसा नाम राष्ट्रीय गर्व के साथ लिया जाना अपने आप में एक हल्की-सी क्रांति है. उनकी सफलता इस बात का सबूत मानी जा रही है कि मज़दूर वर्ग से जुड़े पासमांदा बैकग्राउंड के लोग भी इस मुकाम तक पहुंच सकते हैं.
भारत के रणनीतिक फैसलों से संकेत मिलता है कि अमेरिका के दोहरेपन के बारे में भारत व्यावहारिक समझ रखता है. अमेरिका-भारत रक्षा सहयोग में तेजी आई है लेकिन भारत कई सैन्य सप्लायरों को चुन रहा है.
भारत बार-बार ‘महाशक्ति’ के भ्रमजाल में फंस जाता है. सोचिए 1950 का दशक, जब नई दिल्ली ने अपनी असल संभावनाओं को वास्तविक शक्ति समझ लिया और 1962 में चीन ने उसे ज़मीन पर ला दिया.
ट्रंपियन कूटनीति से अपनी रक्षा करने के लिए सबसे पहले हमें अपने सत्तातंत्र के अंदर के विमर्श में जो विरोधाभास हैं उनका विश्लेषण करना होगा. आप तब से शुरू कर सकते हैं जब 2014 की गर्मियों में मोदी सत्तासीन हुए थे.