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Monday, 2 March, 2026
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‘मेरा नाम चौरसिया है और मैं असमानता को चौरस करके ही दम लूंगा’

सामाजिक न्याय आंदोलन के उज्ज्वल सितारों में शिवदयाल चौरसिया का नाम अग्रणी है. पिछड़ी जातियों को राजनीतिक पहचान दिलाने से लेकर पिछड़ी जाति की महिलाओं के सवाल उठाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान है.

यस बैंक मामले का सार: पैसा आपसे वो करवाता है जो आप करना नहीं चाहते

भारत के वित्तीय सेक्टर की समस्याओं का कोई रामबाण समाधान नहीं है. विश्वास बढ़ाने के लिए उबाऊ लगने वाले सुधारों को लागू करने की आवश्यकता है. रिज़र्व बैंक को इस बारे में सोचना चाहिए.

भारतीय राजनीति में कैसे ‘मान्यवर’ बन गए कांशीराम

कांशीराम आधुनिक भारतीय राजनीति के सबसे बड़े चमत्कार हैं. बेहद साधारण परिवार का एक शख्स आखिर कैसे देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनाने में सफल रहा?

भारत का अभिजात समाजवाद सिंधिया सरीखे नेताओं को फकीरी दिखाने पर मजबूर करता है

सिंधिया का ‘एसी-रहित’ रेंज रोवर इस बात को उजागर करता है कि एक खास तरह का पाखंडपूर्ण और आत्मघाती- सामाजिक-लोकलुभावनवाद हमारी राष्ट्रीय विचारधारा है और यही कारण है कि हिंदू विकास दर भारत की नियति है.

हक्सर की इंदिरा गांधी को दी गई सलाह कांग्रेस को पटरी पर लाने में सोनिया की मदद कर सकती है

बैंकों के राष्ट्रीयकरण से लेकर बांग्लादेश की मुक्ति तक, इंदिरा के प्रधान निजी सचिव पीएन हक्सर की भूमिका वाले बड़े परिवर्तनों के जयराम रमेश के विश्लेषणों में जो छोटी-छोटी गौण बातें सामने आती हैं उनसे कांग्रेस के बेहद विचारशील नेतृत्व की झलक मिलती है.

सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान पर अदालत संज्ञान लेती तो यूपी सरकार को पोस्टर लगाने की जरूरत नहीं पड़ती

उच्चतम न्यायालय ने अप्रैल 2009 में अपने एक फैसले में प्रतिपादित दिशा निर्देशों में कहा था कि जब कभी भी विरोध प्रदर्शन की वजह से बड़े पैमाने पर संपत्ति को नुकसान पहुंचता है तो उच्च न्यायालय स्वतः कार्रवाई कर सकता है.

राहुल और सिंधिया से महज 6 साल ही तो बड़े हैं अमित शाह पर कोई उन्हें युवा नेता क्यों नहीं कहता

भारतीय राजनीतिक में सियासी परिवारों की विरासत देखकर लगता है कि यहां इन परिवारों से संबंध रखने वाले नेता ही युवा कहला सकते हैं, फिर वो चाहे 40 साल के हों या फिर 50 के.

कांग्रेस अपने ऐतिहासिक कर्तव्य में विफल हो रही है वहीं भाजपा को हराने के रास्ते में भी अड़चन बनकर खड़ी है

असली सवाल यह नहीं है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस को धोखा दिया या नेहरू-गांधी पार्टी ने उनकी नहीं सुनी. संकट इससे ज्यादा गहरा है.

भारत के शहरों में भी ज़िंदा है जाति, अलग-अलग रह रहे हैं सवर्ण और दलित

गुजरात में ये देखा जाना चाहिए कि जिस राज्य के बारे में ये मिथक है कि यहां हिंदू और मुसलमान अलग-अलग रहते हैं, उस राज्य में दलितों को शहरी मोहल्ले से दूर रखने का चलन सबसे ज्यादा क्यों हैं. गुजरात का जातिवाद इतने लंबे समय से छिपा हुआ क्यों रहा?

नदी बहे या नहीं इसपर भी सत्ता का नियंत्रण, इवांका ट्रंप और आत्मबोधानंद उसकी पहली तस्वीरें हैं

गंगा के कई तटों के जीर्णोद्धार का काम निजी कंपनियों को दिया गया है. सहज गणित का ज्ञान बता देगा कि आम आदमी को नदी से कैसे दूर किया जा रहा है.

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जयपुर, दो मार्च (भाषा) रजस्थान के सवाई माधोपुर जिले के वजीरपुर उपखंड के मीना बड़ौदा गांव में सोमवार को एक घर में बने...

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सुप्रीम कोर्ट का सही फैसला और बिलकिस बानो की जीत

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