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Monday, 27 May, 2024
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भारतीय राजनीति में कैसे ‘मान्यवर’ बन गए कांशीराम

कांशीराम आधुनिक भारतीय राजनीति के सबसे बड़े चमत्कार हैं. बेहद साधारण परिवार का एक शख्स आखिर कैसे देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनाने में सफल रहा?

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आज़ाद भारत में बहुजन राजनीति के माध्यम से आंबेडकरवाद को नयी बुलंदियों तक ले जाने वाले कांशीराम का उदय राजनीति में एक पहेली की तरह रहा. उनके परिनिर्वाण पर आंबेडकरवादी राजनीति के समालोचक समाजविज्ञानी आनंद तेलतुम्बड़े ने ‘इकोनोमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’ में श्रद्धांजलि देते हुए उन्हें ‘एन एनिग्मा कॉल्ड कांशीराम’ (कांशीराम :एक अबूझ पहेली) कहा था. तेलतुम्बड़े ने कांशीराम को एनिग्मा इसलिए कहा था क्योंकि उन्होंने सतह से उठते हुए मात्र चन्द साल में दलितों एवं वंचितों की न केवल एक राष्ट्रीय पार्टी खड़ी कर दी थी, बल्कि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में अपनी पार्टी की सरकार भी बना दी. हज़ारों साल से सताई गयी जनता को कांशीराम ने कैसे अपने बहुजन आंदोलन से जोड़ लिया, यह समकालीन भारतीय राजनीति के अध्येताओं के लिए एक पहेली है.

राजनीति विज्ञानियों की नज़र में कांशीराम

कांशीराम की राजनीति का अध्ययन कर चुकी राजनीतिविज्ञानी प्रो. कंचन चंद्रा के अनुसार ऐसा इसलिए हो पाया था क्योंकि भारतीय लोकतंत्र में अवसरों एवं संसाधनों का वितरण ‘पैट्रोनेज सिस्टम’ (सरपरस्ती की व्यवस्था) के द्वारा होता है. लेकिन सत्ता के शीर्ष पर दलितों के न होने से उनको इसमें हिस्सा नहीं मिल पा रहा था. कांशीराम ने प्रतिनिधित्व की राजनीति के माध्यम से दलितों के आगे बढ़े हुए तबके को यह भरोसा दिलाया कि सत्ता मिलने पर उसी पैट्रोनेज के द्वारा वह उनको अवसरों एवं संसाधनों में हिस्सेदारी दिलाएंगे.

कांशीराम के इस आश्वासन की वजह से पहले दलितों का इलीट तबक़ा ‘स्ट्रेटेजिक वोटिंग’ के तहत उनसे जुड़ा और बाद में उनकी देखा-देखी दलितों का आम जनमानस भी उनसे जुड़ गया.

दलित आंदोलन और बहुजन समाज पार्टी पर शोध करने वाली राजनीतिविज्ञानी प्रो सुधा पाई के अनुसार उत्तर भारत ख़ासकर उत्तर प्रदेश में कांशीराम को सफलता इसलिए मिली, क्योंकि यहां एक स्वतंत्र दलित आंदोलन पहले से मौजूद था. आगरा, मेरठ, अलीगढ़, कानपुर आदि शहरों में बसे दलितों ख़ासकर चमार/जाटवों की अपेक्षाकृत मज़बूत आर्थिक स्थिति की वजह से ये संभव हो पाया था. इन शहरों में बसे दलितों की आर्थिक स्थिति में मज़बूती चमड़े के सामान की क़ीमत में वृद्धि की वजह से आयी थी. दरअसल द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन की समुद्र मार्ग की सप्लाई चेन टूट गयी थी, जिसकी वजह से सैनिकों के इस्तेमाल में आने वाला चमड़े का सामान ब्रिटेन से आयातित नहीं हो सकता था. पूर्वी मोर्चे पर जापान से लड़ने के लिए सेना को इन सामानों की ज़रूरत थी, जिसकी पूर्ति इन शहरों से बने सामानों ने की.


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चमड़े के सामान की क़ीमत में आयी वृद्धि की वजह से इन शहरों के आस-पास रहने वाला दलित समाज पहले की तुलना में मज़बूत हुआ और उसने छोटे-छोटे स्वतंत्र आंदोलन चलाए. प्रो. पाई का आकलन है कि कांशीराम ने उन्हीं छोटे-छोटे आंदोलनों को समाहित करते हुए बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया था.

उपरोक्त विश्लेषण कांशीराम को समझने में उपयोगी तो हैं लेकिन ये जिस एक सवाल का जवाब देने में असमर्थ हैं वो ये कि कांशीराम के नेतृत्व को लोगों ने स्वीकार क्यों कर लिया. ऐसा क्या कारण था कि दलितों ने कांशीराम की ही बात पर विश्वास किया, किसी और नेता की बात पर नहीं? इन सवालों का जवाब जानने के लिए हमें नेतृत्व की अवधारणा के सिद्धांतों की ओर देखना होगा.

भारत के परिपेक्ष्य में नेतृत्व की अवधारणा की सैद्धांतिकी

किसी भी समाज में नेतृत्व को समझने के लिए समाजविज्ञानी मैक्स वेबर ने तीन तरह के नेतृत्व के बारे में बताया- लीगल/रेशनल, चमत्कारिक और पारम्परिक. वेबर के अनुसार विकसित देशों में लोग लीगल/रेशनल अथॉरिटी को मानते हैं, जिसकी वजह से वहां संस्थानों यानी इंस्टिट्यूशंस को तरजीह मिलती है. विकासशील देशों में लोग चमत्कारिक अथॉरिटी में नेतृत्व खोजते हैं, जिसके तहत वो किसी व्यक्ति में प्राकृतिक/दैवीय शक्ति की तलाश करते हैं. इन सबके इतर पारम्परिक समाज में प्रायः सबसे बड़े/बुज़ुर्ग को ही नेता के तौर पर स्वीकार किया जाता है. चूंकि भारतीय समाज इन तीनों ही प्रकार के समाजों से मिलकर बना है, इसलिए वेबर की यह अवधारण यहां के नेतृत्व को समझने में ख़ास मदद नहीं करती.

वेबर की नेतृत्व की अवधारणा की इस कमी को देखते हुए समाजविज्ञानी मोरिस जोंस ने 1963 में भारतीय नेताओं को समझने के लिए एक नयी अवधारणा विकसित की थी, जिसे वो ‘थ्री इडियम्स ऑफ इंडियन पॉलिटिक्स’ का नाम देते हैं. मोरिस जोंस के मुताबिक़ भारतीय राजनेताओं को थ्री इडियम यानी तीन भाषा विन्यासों- आधुनिक, पारम्परिक और सधुक्कड़ी भाषा में संवाद करने वालों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है. इस सिद्धांत के अनुसार जवाहरलाल नेहरू को आधुनिक भाषा, अकाली दल से जुड़े नेता मास्टर तारा सिंह को पारम्परिक भाषा और महात्मा गांधी को सधुक्कड़ी भाषा का प्रयोग करने वालों के तौर पर जाना जाता है. आज़ादी के बाद भारत में इन तीनों ही भाषाओं का प्रयोग करने वाले विभिन्न नेता बड़ी संख्या में जनता को अपनी ओर आकर्षित करते रहे.

कांशीराम और भारतीय राजनीति की भाषाएं

अगर भारतीय राजनीति में जनता को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए प्रयोग में लायी जाने वाली उक्त तीन भाषाओं को देखें तो कांशीराम आज़ाद भारत में एक ऐसे नेता दिखाई देते हैं, जिन्होंने तीनों ही भाषाओं का प्रयोग किया. कांशीराम के बारे में यह आम बात आम तौर पर प्रचलित थी कि वह पेशे से एक वैज्ञानिक थे. उनके द्वारा लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनाव लड़ कर संवैधानिक संस्थाओं में हिस्सेदारी लेने और अपने अधिकार हासिल करने की बात भी आधुनिक भाषा के उनके प्रयोग को दर्शाता है.

कांशीराम अपने भाषणों में जाति और धर्म के नाम पर लोगों को संगठित होने की बात करते हैं, वो छोटी-छोटी जातियों को संगठित करके उनको प्रतिनिधित्व देकर अपना संगठन बनाते हैं. तमाम ग़ैर ब्राह्मणवादी भाषा तथा प्रतीक चिन्हों का उपयोग भी वो अपने मोबिलिज़ेशन में करते हैं. वे अक्सर बौद्ध प्रतीकों का भी इस्तेमाल करते नजर आते हैं. यह सब उनके परम्परागत भाषा के उपयोग का सबूत देता है.


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इन दोनों भाषाओं के अलावा कांशीराम सधुक्कड़ी भाषा और प्रतीकों का प्रयोग भी करते हैं. बल्कि उन्होंने अपने जीवन को ही इस तरह प्रस्तुत कर दिया कि मानो किसी साधु ने जनकल्याण के लिए घर-परिवार छोड़ दिया हो. उनका शादी न करने, परिवार छोड़ देने, कोई रुपया, पैसा, ज़मीन, जायदाद, बैंक एकाउंट न रखने की शपथ आदि उनको भारतीय राजनीति में प्रयोग की जाने वाली सधुक्कड़ी भाषा के बेहद नज़दीक ले जाती है. इसके अलावा बेहद ही साधारण तरीक़े से बातचीत करने, खान-पान, कपड़े पहने के उनके तरीक़ों ने सधुक्कड़ी की उनकी छवि को मजबूत किया.

यह दिलचस्प बात है कि जहां आंबेडकर को अपनी प्रेरणा बताने वाले वाली कई दलित नेता आंबेडकर जैसी ही ड्रेस पहन कर उनको कॉपी करने में गर्व महसूस करते हैं. उनके उलट कांशीराम ने बेहद ही साधारण तरीक़े का अपना पहनावा रखा और उन्होंने इस मामले में कभी भी आंबेडकर की नक़ल नहीं की.

कांशीराम भारतीय राजनीति की तीनों भाषाओं का सफलता पूर्वक उपयोग कर पाए. इसी वजह से जनता में उनके प्रति आकर्षण और विश्वास पैदा हुआ. अन्य दलित नेता ऐसा करने में असफल रहे, इसलिए उनके प्रति जनता का विश्वास नहीं पैदा हो पाया.

(लेखक रॉयल हालवे, लंदन विश्वविद्यालय से पीएचडी स्क़ॉलर हैं .ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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