देश के आर्थिक भविष्य पर खुले विचार रखने वाले उस बड़े विचारक गांधी को कांग्रेस ने ‘सत्य व अहिंसा’ का पुजारी बनाकर किसी देवता की तरह फोटो फ्रेम के संकुचित दायरे में सिमटा दिया.
यह संकट का साल है इसलिए वित्तीय तार्किकता के सामान्य नियमों से अलग हट कर भी काम करने पड़ेंगे लेकिन खर्चों के वर्तमान स्तर से बेहतर नतीजे हासिल करने की कोशिश भी करनी होगी.
मुस्लिम एंगल ये बात तो सुनिश्चित कर देता है कि मूक बने रहने वाले मंत्री रातोंरात सामाजिक कार्यकर्ता बन जाएं और बहुसंख्यकों को एक नया मुद्दा मिल जाए ताकि कट्टरता की खुराक में कोई कमी ना आने पाए.
बड़े-बड़े इरादे रखने के बावजूद आर्थिक सुधारों के मोर्चे पर मोदी इसलिए पिछड़ते दिख रहे हैं क्योंकि उनके नौकरशाहों में सुधारों को आगे बढ़ाने का जज्बा नहीं है बल्कि वे तो इस लॉकडाउन के बहाने निरंकुश सत्ता का मज़ा लेने में मगन हैं.
स्पेन, इटली, जर्मनी, ब्रिटेन जैसे प्रमुख यूरोपीय देशों ने अपने यहां लॉकडाउन में पहले फ़ेज़ की रियायत तभी देना शुरू किया जब उनके यहां इस महामारी से जुड़े नए मामलों का ग्राफ़ अपने शीर्ष बिंदु पर पहुंच कर नीचे गिर गया था.
आर्थिक गतिविधियां शुरू होंगी तो लॉकडाउन में जितने लोग कोरोनावायरस से बीमार हुए थे उससे ज्यादा संख्या में लोग बीमार हो सकते हैं इसलिए सरकार को भारतीय डेटा पर आधारित नीति बनाने की जरूरत पड़ेगी
क्या दोनों मुल्कों को टिड्डी में एक आम दुश्मन मिल गया है? क्या टिड्डियां बड़े पैमाने पर तबाही के वो हथियार हैं जिन्हें अब तक छिपाकर रखा गया था? शायद अर्णब गोस्वामी को पता होगा.
अब समय आ गया है कि क्विट इंडिया पार्ट टू अपनाया जाए और मेड इन इंडिया की कोशिश की जाये. कोविड ने देश की जनता को स्वावलंबन का एक और मौका दिया है- क्या हम इसके लिए तैयार हैं?
प्रधानमंत्री को आरोपों की सूली पर टांगना ठीक नहीं, चाहे वे ऐसे नरम बरताव के हकदार हों या नहीं क्योंकि अगर ऐसा ना किया गया तो दरअसल चोट हम सब पर साझे में पड़ेगी.
दीन दयाल उपाध्याय की हत्या और माधवराव सिंधिया के प्लेन क्रैश से लेकर गांधी परिवार की हत्याओं तक, राजनीति में जो कुछ भी होता है, उसका हिसाब-किताब से कम और किस्मत से ज़्यादा लेना-देना होता है.