'पठान' अगर रूढ़िवादियों और उदारवादियों, दोनों को मुंह छिपाने की जगह मुहैया कराती है, तो ‘धुरंधर’ ऐसी कोई कृपा नहीं करती. आदित्य धर ने आडंबर के चंदोवे को फाड़ डाला है और चाकू को घुमा भी दिया है.
आरटीआई के एक आवेदन से सामने आया है कि जारी SIR 2.0 प्रक्रिया में, भारत के 90 लाख पंजीकृत दिव्यांग (पीडब्ल्यूडी) मतदाताओं में से लगभग आधे प्रभावित हुए हैं.
नफरत के दुष्चक्र में पड़े बिना हम यह साफ कह सकते हैं कि हम किससे जूझ रहे हैं—ISIS की वह विचारधारा, जिसमें दुनिया को सिर्फ आस्थावान और गैर-आस्थावान में बांट दिया जाता है.
यह एक ऐसा दुर्लभ मामला था जिसमें एक अधिकारी की निजी धार्मिक आस्था और सेना की धार्मिक परंपराओं के बीच टकराव हो गया. धर्म के राजनीतिकरण के मौजूदा वातावरण, और सेना की अधिकारी जमात द्वारा इसे बढ़ावा देने के मद्देनजर अब समय आ गया है कि आत्म-निरीक्षण और सुधार किए जाएं.
शायद अख़बार रोज़ाना होने वाले सड़क हादसों और मौतों की रिपोर्टिंग के लिए एक अलग कॉलम बना सकते हैं, जैसा कि कोविड-19 महामारी के दौरान मौतों के आंकड़ों की रिपोर्टिंग की जाती थी.
1925 में प्रकाशित गांधी की आत्मकथा बचपन से सार्वजनिक जीवन तक की कथा कहती है, लेकिन स्त्री-संसर्ग, ब्रह्मचर्य और नैतिक संघर्षों पर उनके आत्मस्वीकार एक अलग, असहज गांधी को सामने लाते हैं.
जो बात साफ दिखती है, वह वही है जो हम में से कई लोग पहले से जानते थे: डिग्रियां आपको नस्लवाद से नहीं बचा सकतीं और “मॉडल माइनॉरिटी” का टैग तो बिल्कुल भी नहीं.
ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में भारतीय विश्वविद्यालयों का योगदान अब भी कम है, खासकर जब इसकी तुलना एमआईटी और इम्पीरियल कॉलेज जैसे विदेशी संस्थानों से की जाती है.