चीन दुनिया को यक़ीन दिलाना चाहता है, कि उसके ‘राज्य के नेतृत्व में विकास’ ने ग़रीबी को ख़त्म कर दिया है. लेकिन, जैसा कि हर चीनी चीज़ के साथ होता है, सच्चाई उससे कहीं ज़्यादा जटिल है, जितनी लगती है.
इंदिरा ने 1969 और 1978 में, कांग्रेस के दिग्गजों को चुनौती दी थी और पार्टी को विभाजित कर दिया था. राहुल या प्रियंका के पास अपनी दादी वाला करिश्मा नहीं है.
मातृसदन के साधुओं ने एकबार फिर प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है.जीडी अग्रवाल की मांगों और उन मांगों पर सरकारी दावों – वादों की याद दिलाया है. जबकि प्रधानमंत्री विकास की नई इबारत लिखने के लिए अफगानिस्तान के साथ शहतूत एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किया है.
भले ही आज हर कोई ओआरएस जानता है, जिसे मेडिकल जर्नल लांसेट ने 20वीं शताब्दी में 'चिकित्सा क्षेत्र की संभवत: सबसे महत्वपूर्ण प्रगति' कहा है लेकिन डॉ. दिलीप महालनबिस को याद करने वाले कम ही लोग होंगे.
भारत के लिए प्रगति की रफ्तार में गिरावट ही चिंता की बात नहीं है, वह उन दूसरे देशों से आगे निकलने में भी सुस्त हो गया है जो आर्थिक वृद्धि और विकास के मामले में चीन की दूर-दूर तक बराबरी नहीं करते
जब वरिष्ठ नागरिकों और कोमोर्बिडिटी के शिकार 45 से 60 वर्ष की उम्र के लोगों को वैक्सीन लगेगी तो टीके लगने के बाद इसके प्रतिकूल असर का संभावित खतरा बढ़ सकता है.
मोदी सरकार के पिछले छह-सात सालों में बढ़ते गये उसके राजनीतिक व सांप्रदायिक दुरुपयोग ने उसे न सिर्फ बुरी तरह डिमॉरलाइज किया है बल्कि उसके प्रोफेशनलिज्म को भी बहुत धक्का पहुंचाया है.
भारत की संसदीय शक्ति कभी पूरी तरह संख्यात्मक नहीं रही. क्षेत्रों को आवाज़ देकर संघवाद ने भारत को एक राष्ट्र बनाया. अब जब केवल संख्यात्मक सिद्धांत को प्राथमिकता दी जा रही है, तो राष्ट्रीय एकता खतरे में है.