मोदी का सफर ‘एक सपने से दूसरे सपने तक’ का सफर कहा जा सकता है. अब इस नये नारे से मोदी ने अपनी सबसे बड़ी कमजोरी, अर्थव्यवस्था से निपटने के लिए अपनी सबसे मजबूत राजनीतिक पूंजी, राष्ट्रवाद का इस्तेमाल किया है
1987 के असहभागिता और/या बहिष्कार के आह्वान की तुलना किसानों की 2021 की परेड के साथ नहीं की जा सकती. हालांकि, इन दोनों प्रकरणों को जोड़ने वाला एक साझा सवाल है.
भारतीय संविधान तैयार होने के साथ ही इतिहास के चुनिंदा महात्माओं, गुरुओं, शासकों एवं पौराणिक पात्रों को दर्शाते हुए संविधान के अलग-अलग भागों में सजाया. प्रत्येक चित्र भारत की अनंत विरासत से एक सन्देश और उद्देश्य को व्यक्त करता है .
मोदी कहते हैं कि नेताजी होते तो देश का आज का पराक्रम देखकर खुश होते लेकिन जानकार बताते हैं कि प्रधानमंत्री जिस आरएसएस की विरासत थामे हुए हैं, नेताजी उसे पनपने के पहले उखाड़कर फेंक देना चाहते थे.
परेडों से दुनिया को यही संदेश जाता है कि देश की सुरक्षा क्षमता कितनी मजबूत है और वह विश्व समुदाय में एक भरोसेमंद सदस्य की तरह कितनी बड़ी भूमिका निभा सकता है.
मुनव्वर फारुकी के मामले में जो कुछ भी हो रहा है वह जानबूझकर तंग किए जाने का स्पष्ट मामला है लेकिन यहां उद्देश्य एक समुदाय विशेष को परेशान करना है, न कि किसी व्यक्ति मात्र को.