मोदी सरकार के विमर्शवादी लोकतंत्र के तौर-तरीके भूलने का परिणाम ये हुआ है कि कृषि कानूनों पर नीतिगत दलीलों को अर्थशास्त्र की बजाय भावनाओं के आधार पर पेश किया जा रहा है.
अहमद पटेल और तरुण गोगोई की मृत्यु ने कांग्रेस और गांधी परिवार के लिए ऐसे काबिल नेताओं को तलाशने की दुष्कर चुनौती पेश कर दी है, इसे सुलझाने के लिए पार्टी में बहुत ही कम उम्मीदवार हैं.
इन चुनावों में भाजपा से सीधे मुक़ाबले में एमवीए ने प्रभावशाली प्रदर्शन किया तो विचारधारा के मामले में समझौता इन तीनों दलों के शंकालुओं और खासकर राहुल गांधी को सचमुच मूल्यवान लगेगा. यह एमवीए सरकार के एक साल के कामकाज पर जनता का फैसला भी सुनाएगा.
आप सड़क पर से गुजर रहे 10 लोगों में सर्वे करा लीजिए और 10 में से 8 लोग उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष का नाम अजय कुमार लल्लू है बता देंगे लेकिन सपा, बसपा व भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष का नाम भी नहीं बता पाएंगे.
मोदी-शाह की भाजपा ने पंजाब और सिखों को सम्मानित साझीदार मानने की जगह उनका कृपालु बड़ा भाई बनने की जो कोशिश की, और कृषि कानूनों के मामले में जो रणनीति अपनाई उस सबने चुनौतियां पसंद करने वाले सिखों को संघर्ष करने का अच्छा बहाना थमा दिया.
ऐसे समय में जब केंद्रीय नेतृत्व बुरी तरह नाकाम साबित हो रहा हो, कांग्रेस के लिए खुद को दोबारा प्रासंगिक बनाने का एकमात्र रास्ता है मज़बूती से जमे अपने क्षेत्रीय नेताओं के सहारे राज्यों में अपनी सक्रियता बढ़ाना.
मोदी के भारत में एक नयी फतह का परचम लहराया जा रहा है, यह हिंदू महिलाओं पर मुस्लिम मर्दों की फतह का परचम है; तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नज़रों से यह कैसे बच सकता है.