नये वित्तीय कदमों के साथ मुद्रास्फीति का खतरा जुड़ा है, जो मतदाताओं को सरकार के विरोध में खड़ा कर देता है. और, दांव पर अगर आर्थिक वृद्धि है, तो इसने अगर निराश किया तब क्या होगा? मोदी को इस बारूदी रास्ते पर संभलकर ही चलना होगा.
कृषि कानूनों के साथ, मोदी सरकार ने श्रम सुधारों को पारित किया है और प्रमुख कंपनियों के निजीकरण का वादा किया है. इसने अर्थिक दक्षिण-वाम को विभाजित किया है, और यह एक अच्छी बात है.
किसान आंदोलन ने मोदी सरकार के लिए प्रचार के स्तर पर एक नयी चुनौती खड़ी कर दी है. एक ‘चायवाला’ से लोक कल्याण मार्ग तक मोदी के सफर को लेकर बड़े जतन से जो छवि गढ़ी गई थी वह अब धूमिल होने लगी है.
यह साफ है कि जंग किसी को भी रास नहीं आती है. जून 2020 में गलवान घाटी में झड़प के बाद तैनाती के दौरान दोनों देशों की सेनाएं एकदम आमने-सामने आ जाने के बावजूद फिर कोई हताहत नहीं हुआ.
मोदी सरकार किसान आंदोलन से निबटने के लिए जो कुछ कर रही है उससे उदार लोकतांत्रिक देश वाली हमारी छवि धूमिल हो रही है, सरकार को भूलना नहीं चाहिए कि हर नागरिक को अपनी आवाज़ उठाने का अधिकार है.
जबकि एक साल बाद ही यूपी विधानसभा का चुनाव होने वाला है, सभी विपक्षी दल—सपा, बसपा, कांग्रेस और रालोद भी— जहां के तहां खड़े नज़र आ रहे हैं. वे एक कदम भी आगे बढ़े हों ऐसा नहीं दिखता.
प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने राष्ट्रीय राजधानी में उन्हीं पैंतरों को आजमाया है जो उन्हें भली भांति समझ आते हैं—'सीएम मॉडल ऑफ गवर्नेंस’ की जांची-परखी कार्यशैली.
यह पत्र, जिसे AAIB, DGCA और गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को भी भेजा गया है, में कहा गया है कि अगर डेटा को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता, तो कम से कम उसे पीड़ितों के परिवारों के साथ निजी तौर पर साझा किया जाना चाहिए.