अगर कोविड हमारे समय की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदि है, तो पत्रकारों को उसे दिखाना होगा, बताना होगा, लिखना होगा. पत्रकारिता में कोई राष्ट्रवाद शामिल नहीं होता.
मोदी सरकार को, जो लापता जैसी लगती है और जिसकी आवाज़ केवल सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्टों में ही सुनाई देती है, व्यवस्था को अपने नियंत्रण में लेकर ऐसे कदम उठाने चाहिए कि कोविड की तीसरी लहर के रूप में आशंकित जो बड़ी त्रासदी देश को दहशत में डाले हुए है उसे रोका जा सके
आरएसएस प्रमुख सर संघचालक मोहन भागवत मई के दूसरे सप्ताह में राष्ट्र को संबोधित करेंगे. मकसद है देश में फैले भय और अनिश्चितता को दूर एक सकारात्मक माहौल तैयार करना.
भाजपा के विधायकों से जब अपने चुनाव क्षेत्र में मिलने वाली चुनौतियों के बारे में पूछा जाता था तब वे कहा करते थे कि ‘अरे, मोदी जी हैं न!’, लेकिन कोविड ने उनसे उनकी यह निश्चिंतता छीन ली है.
बहुत से समाजविज्ञानी जिन्हें लगता था कि भारत के गांव तो जाति की धुरी पर बने हुए हैं, मंडल की बहस के दौरान पाला बदलकर ये कहने लगे थे कि आरक्षण का आधार जाति नहीं हो सकती. दूसरी तरफ धीरूभाई थे जो दृढ़मत थे कि आरक्षण की नीति जाति के आधार पर तय की जानी चाहिए.
कोर्ट फिल्म में हमने जो देखा है, वो साथीदार की एक वृहत छवि है, उत्पीड़ित समुदायों के लिए असली प्रेरणा लेने का तरीका ये है कि उनकी सूक्ष्म छवि को पढ़ें और समझें, जो उनके काम, उनके आंदोलन, विरोध प्रदर्शन और उनकी कला में है.
पिछले सात वर्षों में मोदी सरकार ने बुनियादी शासन की नींव को मजबूत करने के लिए कुछ नहीं किया जिसका नतीजा यह है कि प्रधानमंत्री अपने कदम पीछे खींचते नज़र आ रहे हैं और उनके मंत्री विफल साबित हो रहे हैं जबकि कोविड का संकट गहराता जा रहा है.
पंच का अपने प्लश टॉय से लगाव उसके देश से नहीं, बल्कि उससे मिलने वाले आराम से है. इसी तरह, ग्राहक जियोपॉलिटिकल लेबल से ज्यादा भरोसे और डिजाइन को प्राथमिकता देते हैं.